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Asha Hire· 5 साल पहले
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28 सितंबर भारतीय क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्मदिन

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अपडेट किया गया10/26/26

28 सितंबर भारतीय क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्मदिन

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गांव (लायलपुर ज़िला, अब पाकिस्तान) में हुआ था। भारत में उनकी जयंती इसी तारीख को मनाई जाती है। कुछ स्रोत, जैसे अंग्रेज़ी विकिपीडिया, जन्मतिथि 27 सितंबर 1907 बताते हैं। ज़्यादातर भारतीय स्रोत और सरकारी आयोजन 28 सितंबर को ही मानते हैं।

आज 26 अक्टूबर 2026 है। इस साल 28 सितंबर को उनकी 119वीं जयंती थी, यानी जन्म को 119 साल पूरे हुए। उन्हें 23 मार्च 1931 को 23 साल की उम्र में लाहौर जेल में फांसी दी गई।

भगत सिंह की ज़िंदगी, एक नज़र में

साल

घटना

1907

जन्म। पिता किशन सिंह, माता विद्यावती

1919

जलियांवाला बाग हत्याकांड, जिसने कम उम्र में ही उन पर गहरा असर डाला

1926

नौजवान भारत सभा की स्थापना में अहम भूमिका

1928

HSRA से जुड़े। लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की योजना में 17 दिसंबर को पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स मारा गया

1929

8 अप्रैल को केंद्रीय असेंबली में बम फेंका और खुद गिरफ्तारी दी

1929

जून से 5 अक्टूबर तक जेल में भूख हड़ताल

1930

जेल में "मैं नास्तिक क्यों हूं" लिखा

1931

23 मार्च को फांसी, सुखदेव और राजगुरु के साथ

कुछ बातें जो अक्सर गलत बताई जाती हैं

1. भूख हड़ताल 1929 में हुई थी, 1929-30 में नहीं। वह जून 1929 में शुरू हुई। भगत सिंह ने 5 अक्टूबर 1929 को 116 दिन बाद हड़ताल खत्म की। मांग यह थी कि राजनीतिक कैदियों के साथ बेहतर और बराबर व्यवहार हो। उनके साथी जतिंद्रनाथ दास की 63 दिन के उपवास के बाद मौत हो गई। कुछ स्रोत 63 और कुछ 64 दिन बताते हैं।

2. सांडर्स की हत्या गलती से हुई थी। योजना पुलिस अधिकारी स्कॉट को निशाना बनाने की थी, लेकिन पहचान की चूक में सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सांडर्स मारा गया।

3. असेंबली में बम किसी की जान लेने के लिए नहीं था। इसे ऐसी जगह फेंका गया जहां कोई मरे नहीं। मकसद अदालत को मंच बनाकर अपनी बात देश तक पहुंचाना था। वे भागे नहीं और खुद गिरफ्तारी दी।

4. वे पढ़ने-लिखने वाले विचारक थे। उन्होंने समाजवाद, बराबरी, मज़दूरों के हक, अंधविश्वास, जात-पात और सांप्रदायिकता पर खुलकर लिखा।

5. फांसी तय दिन से पहले दी गई। आम तौर पर बताया जाता है कि फांसी 24 मार्च की सुबह होनी थी, पर 23 मार्च की शाम को दे दी गई। इसकी वजह लोगों के भड़कने का डर बताई जाती है।

सुधार किए गए

  • आज की तारीख 24 अक्टूबर की जगह 26 अक्टूबर 2026 की गई। जयंती को 28 दिन हुए हैं, 26 नहीं।

  • भूख हड़ताल का साल "1929-30" की जगह 1929 किया गया और अवधि 116 दिन जोड़ी गई।

  • सांडर्स की हत्या में हुई पहचान की चूक जोड़ी गई।

  • 27 सितंबर की तारीख को स्रोतों के आधार पर साफ किया गया।

अगर आप उनके विचार पढ़ना चाहते हैं, तो जेल में लिखा उनका लेख "मैं नास्तिक क्यों हूं" एक अच्छी शुरुआत है।

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जवाब दिया गया10/24/26

28 सितंबर का दिन भारतीय इतिहास के पन्नों में मात्र एक साधारण तिथि नहीं है, बल्कि यह अदम्य साहस, निस्वार्थ बलिदान और सर्वोच्च वैचारिक क्रांति का एक चिरस्थायी प्रतीक है। इसी दिन वर्ष 1907 में अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर ज़िले (जो अब पाकिस्तान में है) के बंगा गाँव में भगत सिंह का जन्म हुआ था। आज जब हम उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि भगत सिंह का कद केवल एक भावुक स्वतंत्रता सेनानी तक सीमित नहीं था; वे अपने समय के सबसे प्रखर राजनीतिक विचारक और दूरदर्शी रणनीतिकार थे।

भगत सिंह के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी असाधारण वैचारिक परिपक्वता थी। महज़ 20-22 वर्ष की आयु में, जब सामान्य युवा अपने भविष्य के ताने-बाने बुनते हैं, भगत सिंह जेल की कालकोठरी में विश्व इतिहास, समाजवाद, मार्क्सवाद और अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन कर रहे थे। उनका स्पष्ट मानना था कि क्रांति का वास्तविक अर्थ केवल ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना या सत्ता का एक हाथ से दूसरे (भारतीयों के) हाथ में हस्तांतरण नहीं है। उनकी वैचारिक क्रांति का मूल उद्देश्य एक ऐसी समतामूलक व्यवस्था का निर्माण करना था जहाँ पूंजीपतियों या सत्ताधारियों द्वारा किसी भी आम मनुष्य का आर्थिक और सामाजिक शोषण पूर्णतः समाप्त हो जाए। उनका प्रसिद्ध लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' (Why I am an Atheist) उनकी गहरी तार्किक क्षमता और अंधविश्वासों के प्रति उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अकाट्य प्रमाण है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह ने एक नए युग का सूत्रपात किया। 'नौजवान भारत सभा' और 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) की स्थापना के माध्यम से उन्होंने देश के युवाओं में एक नई राजनीतिक और सामाजिक चेतना का प्रसार किया। 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने की उनकी योजना किसी भी व्यक्ति की जान लेने के लिए नहीं थी, बल्कि जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था—"बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवश्यकता होती है।" इस घटना के बाद भागने के बजाय उन्होंने स्वेच्छा से गिरफ़्तारी दी, ताकि वे ब्रिटिश न्यायालयों को अपनी वैचारिक क्रांति के प्रचार का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मंच बना सकें।

23 मार्च 1931 को जब उन्हें फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा था, तब भी वे मृत्यु से पूरी तरह निर्भीक थे क्योंकि वे जानते थे कि उनका बलिदान ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हमेशा के लिए खोखला कर देगा। आज 28 सितंबर को उनकी जयंती मनाने का वास्तविक अर्थ केवल उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करना नहीं है। भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण, बौद्धिक ईमानदारी और शोषण-मुक्त समाज के उस वैचारिक मॉडल को अपने जीवन में उतारना है, जिसके लिए उन्होंने हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी।

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जवाब दिया गया09/28/21

जन्मः

प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर सन् 1907 ईस्वी को पंजाब के लालपुर गांव में हुआ। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। सरदार भगत सिंह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों वाले थे। बड़े होने पर ये ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते थे। चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला खाँ जैसे क्रांतिकारियों की तरह ही भगत सिंह का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है।

भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे। साइमन कमीशन का बहिष्कार करने के सिलसिले में पंजाब केशरी लाला लाजपत राय पर पुलिस ने प्राणघातक प्रहार किया था। पुलिस अधीक्षक सॉडर्स को इसके लिए जिम्मेदार मानते हुए भगत सिंह ने गोलियाँ चलाकर उसकी हत्या कर दी थी। इसी मामले में दूसरा पुलिस अफसर मिस्टफर्म भी मारा गया था। ब्रिटिश सरकार ने अन्यायपूर्ण ढंग से इन्हें 23 मार्च सन् 1931 ईस्वी को फांसी दे दी।

लेख की तस्वीर

भगत समय-समय पर अपने हितेषीयों को पत्र लिखते रहते थे। उन पत्रों से उनकी देशभक्ति, त्याग-भावना और स्वदेश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की दृढ़ कामना का परिचय मिलता है।

पत्रः

अमर शहीद भगत सिंह के लिखे पत्र बलिदान से 1 दिन पहले कैदी साथियों को लिखा गया अंतिम पत्रः-

साथियों ! 22 मार्च, 1931

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझ में भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता,

मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा में हरगिज नहीं हो सकता,

आज मेरी कमजोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं, अगर मैं फांसी से बच गया तो वे जाहिर हो जायेंगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए लेकिन दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों को भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी की क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी

हाँ, एक विचार भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें ए मेरे दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं करा सके, अगर स्वतंत्र जिंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरत पूरी कर सकता। इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचने का नहीं आया, मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है, आब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है, कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।

आपका साथी

भगत सिंह

सेंट्रल जेल, लाहौर

3 मार्च 1931

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