Advertisement

Advertisement banner

Advertisement

Advertisement banner
Current Topicsमिल्खा सिंह 'द फ्लाइंग सिख' का 91 वर्ष क...
T

Trishna .

| Updated on June 19, 2021 | news-current-topics

मिल्खा सिंह 'द फ्लाइंग सिख' का 91 वर्ष की आयु में पोस्ट कोविड जटिलताओं के कारण निधन

1 Answers
V

@viratkumar3750 | Posted on June 19, 2021

  1. कोरोना वायरस से रेस में हार गए मिल्खा सिंह। अपने खेल के द्वारा भारत का नाम विश्व में प्रसिद्ध करने वाले मिल्खा सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे।

    बीते 1 महीने से मिल्खा सिंह की कोरोना वायरस की वजह से तबीयत खराब चल रही थी परंतु वे कोरोना नेगेटिव हो चुके थे, परंतु अचानक तबीयत बिगड़ने से उन्हें तुरंत चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में भर्ती किया गया था। लेकिन वहां उनकी मौत हो गई। 18 जून को मिल्खा सिंह ने चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में अपनी आखिरी सांस ली। 91 साल की उम्र में जिंदगी की जंग हार गए मिल्खा सिंह। मिल्खा सिंह एक महान व्यक्ति थे उन्हें उनके खेल के लिए हमेशा जाना जाएगा। मिल्खा सिंह भारत के उच्च कोटि के धावक थे जिन्होंने अपने खेल के करियर में कई कीर्तिमान हासिल किए थे। और हमारे देश का नाम विदेशों में भी प्रसिद्ध किया था। एक कुशल निडर व साहसी धावक होने की वजह से उन्हें द फ्लाइंग सिख भी कहा जाता है। इसी हफ्ते उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह की मृत्यु भी कोरोना के कारण होकर थी। और उन्होंने 85 वर्ष की आयु में अपनी आखिरी सांसे ली। मिल्खा सिंह की मृत्यु से पहले भारतीय वॉलीबॉल टीम की पूर्व कप्तान निर्मल कौर की भी कोरोनावायरस के संक्रमण के चलते मृत्यु हो गई थी। यदि बात मिल्खा सिंह के परिवार की कि जाय तो उनका एक बेटा गोल्फर जीव मिल्खा सिंह तथा तीन बेटियां हैं । मिल्खा सिंह के परिवार के एक व्यक्ति ने बताया कि मिल्खा सिंह की तबीयत शाम से ही खराब थी उन्हें बुखार आया था साथ ही साथ में ऑक्सीजन की कमी भी हो रही थी। इसलिए उन्हें चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में भर्ती किया गया। और 18 जून कि रात 11:30 बजे उनका देहांत हो गया। यदि बात मिल्खा सिंह के जन्म की करे तो उनका जन्म तब हुआ जब भारत पाकिस्तान एक ही थे। उनका जन्म गोविन्दपुरा (पाकिस्तान) के एक सिख राठौर परिवार में 20 नवम्बर साल 1929 को हुआ था। उनके कुल 15 भाई बहन थे। परंतु उनके कई भाई-बहन बचपन में ही गुजर गए थे। और सबसे बड़ा दुख जो मिल्खा सिंह को मिला वह भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय मिला। जब दंगों में मिल्खा सिंह ने अपने मां बाप और भाई बहनों को खो दिया। इसके बाद वह वो शरणार्थी बनकर ट्रेन के द्वारा पाकिस्तान से दिल्ली आए। दिल्ली में मिल्खा अपनी शादी-शुदा बहन के घर पर कुछ दिन रहे। मिल्खा सिंह के निजी जीवन में अपने भाई मलखान के कहने पर वो सेना में भर्ती होने के लिए तैयार हो गए। और सन 1951 में सेना में भर्ती हो गए। अपने बचपन में मिल्खा अपने घर से स्कूल और स्कूल से घर की 10 किलोमीटर की दूरी दौड़ कर पूरी करते थे। और भर्ती के समय जब क्रॉस-कंट्री की रेस हुई तो। इस रेस में मिल्खा छठे स्थान पर आये थे इस कारण उन्हें सेना मे खेलकूद में स्पेशल ट्रेनिंग के लिए चुना था। भारतीय सेना में मिल्खा के द्वारा कड़ी मेहनत की गयी और उन्होंने स्वयं को 200 मी और 400 मी में स्थापित किया। इसके चलते ही उन्होंने साल 1956 के हो रहे मेर्लबोन्न ओलिंपिक खेलों में चुना गया। जहा 200 और 400 मीटर में भारत का प्रतिनिधित्व किया परन्तु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दौड़ का अनुभव न होने के कारण वो सफल नहीं हो पाए। पर 400 मीटर प्रतियोगिता के विजेता चार्ल्स जेंकिंस के साथ हुए एक रनिंग के मुलाकात ने उन्होंने उनको हरा दिया।ये देख मिल्खा सिंह का सब ने सपोर्ट किया।

    इसके बाद साल 1958 में उन्हें सफलता मिली जब ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों की प्रतियोगिता हुई और 400 मीटर प्रतियोगिता में उनको गोल्ड मेडल मिला। इसके बाद साल 1960 में पाकिस्तान के प्रसिद्ध धावक अब्दुल बासित को पाकिस्तान में जाकर मिल्खा सिंह ले हरा दिया। जिसके बाद वहा के जनरल अयूब खान ने उन्हें ‘उड़न सिख’ के नाम से पुकारा।

    यदि बात मिल्खा सिंह की उपलब्धियों की की जाए तो उन्होंने सन 1958 के कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल जीता और 1962 मे आयोजित एशियन खेलों में भी गोल्ड मेडल जीता।और भी बहुत उपलब्धियां उन्हें प्राप्त है।Article image


0 Comments