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Trishna .· 5 years ago
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क्यों मनाते हैं बुद्ध पूर्णिमा? जानें क्यों है यह खास और क्या है इसका इतिहास?

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हम आपको बताएंगे कि बुद्ध पुर्णिमा क्यों मनाया जाता है? पाया जाता है कि लगभग 35 वर्ष की उम्र मे सिद्धार्थ गौतम को बोधगया मे बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी इसलिए सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बन गए।कहा जाता है कि गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति वैशाख की पूर्णिमा को हुई थी इसलिए बुद्ध पूर्णिमा वैशाख को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। वैशाख पूर्णिमा पर भगवान विष्णु भगवान बुद्ध के साथ भगवान शनिदेव की भी पूजा करनी चाहिए। कहा जाता है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन नदी में स्नान करना चाहिए,गरीबों को दान करना चाहिए इससे भगवान खुश होती है। और भगवान बुद्ध आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।Article image

Answered by
Krishna Patel
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Answered on06/13/22
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बुद्ध पूर्णिमा जिसका संबंध भगवान गौतम बुद्ध से है।माना जाता है कि गौतम बुद्ध के जन्म को ही बुद्ध पूर्णिमा के नाम से मनाया जाती है।बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार वैशाख महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा से जुड़ी हुई कई घटनाएं हैं जिनका संबंध भगवान गौतम बुद्ध से है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन 563 ईसा पूर्व को गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। वैशाख माह की पूर्णिमा का संबंध सीधे-सीधे भगवान बुद्ध से है ऐसी कई घटनाएं जो भगवान बुद्ध से जुड़ी है उनका संबंध भी वैशाख माह की पूर्णिमा से ही है।
भगवान बुद्ध के बचपन की एक ऐसी घटना जिसने गौतम बुद्ध को एक राजकुमार सिद्धार्थ से भगवान गौतम बुद्ध बना दिया, तो चलिए जानते हैं कि वह घटना क्या थीं -गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी नामक स्थान 563 ईसा पूर्व को हुआ था।
राजकुमार सिद्धार्थ को युवावस्था तक उनके पिता द्वारा महल के अंदर ही रखा जाता है उनके पिता का यह मानना था कि मेरे पुत्र को कभी भी मालूम ना पड़े की कष्ट क्या होता है, महल के अंदर ही सिद्धार्थ को वह सारी सुख -सुविधाएं दी गई जो एक राजकुमार को मिलनी चाहिए , यहां तक की सिद्धार्थ महल से बाहर ना देख ले इसलिए महल के चारों ओर ऊंची -ऊंची दीवारें लगा दी गई जिससे कि सिद्धार्थ सांसारिक सत्य से दूर रहे।
16 साल की उम्र में राजकुमार सिद्धार्थ का विवाह एक सुंदर कन्या यशोधरा से हो जाता है। इतने सालों से लगातार महल के अंदर रहनें के कारण अब राजकुमार सिद्धार्थ ऊब गए थे इसीलिए उन्होंने एक दिन चुपचाप अपने एक दास से महल के बाहर जाने को कहा।



उसके बाद राजकुमार सिद्धार्थ अपने दास चाना के साथ रथ पर सवार होकर नगर घूमने चले गए। नगर घूमते- घूमते उन्हें एक व्यक्ति दिखाई दिया जो बूढ़ा हो चला था और वो बूढ़ा व्यक्ति थोड़ा झुककर चल रहा था।उस व्यक्ति को देखते ही सिद्धार्थ ने चाना से पूछा कि यह कौन है!और यह इतने झुककर क्यों चल रहा है?तब चाना नें राजकुमार सिद्धार्थ को बताया -यह एक बूढ़ा व्यक्ति है और बुढ़ापा ही हमारे जीवन का अंतिम पड़ाव होता है। उसके बाद कुछ दूर जाकर राजकुमार सिद्धार्थ को एक बीमार व्यक्ति दिखाई दिया। उस बीमार व्यक्ति को देखकर राजकुमार सिद्धार्थ नें हैरानी से पूछा कि यह कौन है? तब चाना ने कहा -"कि यह आदमी बीमार हो गया है इसीलिए यह इतना परेशान है अमीर हो या गरीब बीमारी से कौन बच पाया है भला।" फिर उसके बाद राजकुमार सिद्धार्थ को एक मृत व्यक्ति का शव दिखाई देता है जिसे कुछ लोग ले जा रहे होते हैं, इसे देखकर राजकुमार हैरान रह गए उन्होंने चाना से पूछा कि यह क्या हो रहा है और यह लोग इसे ऐसे क्यों ले जा रहे हैं? तब चाना ने जवाब दिया कि यह आदमी मर चुका है, और एक ना एक दिन इस दुनिया में सभी को मरना है यह इस दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई है, तब राजकुमार ने चाना से हैरानी भरे स्वर में पूछा- क्या एक दिन मुझे भी मरना होगा? चाना ने जवाब दिया -हां आपको भी एक न एक दिन मरना ही होगा।
उसके बाद राजकुमार को कुछ दूर जाकर एक सन्यासी दिखाई दिया जब राजकुमार ने सन्यासी से बात की तो सन्यासी ने बताया कि "मैं इस दुनिया के मोह माया से मुक्त हो चुका हूं और अब मैं ईश्वर की तलाश में लग गया हूँ, " सन्यासी की बात सुनकर राजकुमार को यहां पर एक सकारात्मक सोच मिली।
उसके बाद राजकुमार वापस महल आ गए लेकिन अभी भी उनके मन में इस सांसारिक सत्य को लेकर कई सवाल उमड़ रहे थे, और एक दिन राजकुमार ने अपने घरवालों, सगे संबंधियों और महल के सुख को त्यागकर संयास लेने का निश्चय कर लिया। 29 वर्ष की आयु में राजकुमार सिद्धार्थ अपना घर -बार सब कुछ छोड़कर परम सत्य की खोज में निकल पड़े। माना जाता है कि कई वर्षों तक भटकते हुए गौतमबुद्ध नें भूख- प्यास,दर्द सब कुछ सहा और कई बार तो सिर्फ दिन में एक अखरोट के दाने का आहार किया।सिद्धार्थ ने बोधगया नामक स्थान पर जो अभी बिहार में है वहाँ एक बड़े पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान करना शुरू किया और लगभग 35 वर्ष की उम्र में उन्हे वहाँ पर परम ज्ञान प्राप्त हुआ। बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान करने के कारण उन्हें लोग गौतम बुद्ध के नाम से जानने लगे और फिर उसके बाद कई वर्षों तक गौतम बुद्ध ने यही परम ज्ञान लोगों तक पहुंचाया। इस प्रकार परम सत्य की तलाश में निकले गौतम बुद्ध की 483 ईसा पूर्व में कुशीनगर नामक स्थान में मृत्यु हो जाती है और यहां भी ऐसा माना जाता है कि जब भगवान बुद्ध की मृत्यु हुई उस दिन भी वैशाख माह की बुद्ध पूर्णिमा ही थी।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का नवॉ अवतार भी माना जाता है इसीलिए बुद्ध पूर्णिमा को हिंदू धर्म में भी महत्व दिया जाता है।

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S
Shayraa .Author
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Answered on05/26/21
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