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स्पर्श

दूर होकर भी वो कितने पास थे, ये इस बात से पता चल जाता है कि बारिश की बूँदे हाथ में वो लेती थी मगर हथेली लड़के की भीग जाती थी। सबकी कुछ ना कुछ मजबूरियाँ होती है आखिर यूँही थोड़ी हर कोई दूर हो जाता हैं। उन दोनो के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। अंश और अंशिका दोनों एक ही कॉलेज में डॉक्टरी पढ़ा करते थे मगर अंश के घर में कुछ ऐसा हुआ कि उसे वापस घर लौट के आना पड़ा। अंश के पिता की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी। अंश को सब कुछ छोड़ गांव जाना पड़ा। अंश के पिता रेलवे में थे तो अंश की नौकरी 2 महीने बाद उसी पोस्ट पर लग गई। अंश लखनऊ में रहने लगा कमरा लेकर क्योंकि उसकी पोस्टिंग चारबाग रेलवे स्टेशन पर हो गयी थी।वही अंशिका अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर रही थी,बैंगलोर के उसी कॉलेज में। अंश को समय ही नही मिल रहा था। कमरे से चारबाग और चारबाग से कमरा, उसकी ज़िन्दगी तो मानो रेल की पटरियों के बीच अपना कमरा बना कर लेट गयी हो जैसे। 6 महीने हो गए थे अंश को अंशिका से बात किये हुए। अंश शायद भूल गया था कि उसके रूह का एक अंश बैंगलोर में है। पिता का जाना कंधों को भारी और दिल को सख्त कर देता है शायद। मगर जहाँ प्रेम होता है वहां उम्मीद की किरण तो होती ही है। अंश ने आज 6 महीने बाद अपना व्हाट्सएप्प खोला था।इन 6 महीनो में काफी कुछ बदल गया था व्हाट्सएप्प पर, लोग इमोजी की जगह स्टिकर्स भेजने लगे थे, व्हाट्सएप्प अब डार्क मोड में ज्यादा अच्छा लगने लगा था और इन सब बदलावो के बीच एक चीज़ बिल्कुल भी ना बदली थी और वो था अंशिका का हर रोज़ गुड नाईट और गुड मॉर्निंग भेजना। इन 182 दिन के वनवास में अंशिका के कुल 400 मैसेज आये थे, जिसमे से 364 केवल गुड नाईट और गुड मॉर्निंग के थे। अंश को भले ही याद ना रहा हो लेकिन अंशिका के दिल में उम्मीद थी, एक दिन तो उसका अंश उसे रिप्लाई करेगा। 6 महीने बाद अंश ने उसकी डीपी देखी थी और मैसेज करने को उसकी उंगलियाँ बेचैन हो गयी। उंगलियाँ कीबोर्ड पर दौड़ने लगी और लिखने लगी 'मस्त डीपी है अंशु' कि तभी अचानक से अंश बैकस्पेस दबा वहाँ लिख देता है 'सॉरी'। रात के ढाई बज रहे थे। ये मैसेज कर अंश सोने की तैयारी करने लगा कि अचानक उसका फ़ोन बजा। उसने सब वही छोड़ छाड़ फ़ोन उठा लिया शायद उसे आवाज़ से ही आभास हो गया था। अंशिका का मैसेज आया था। "सॉरी क्यों?" "अर्रे मैं तुम्हे भूल गया था मैसेज करना इसीलिए" "ऐसा किसने कहाँ? तुम तो मुझे हर रोज़ मैसेज किया करते थे" "वो कैसे?" "अर्रे तुमने ही तो कहा था कि हम एक है तो ऊपर भेजे 364 गुड नाईट और गुड मॉर्निंग में से आधे तुम्हारे भी तो है" "हाहाहा...तुम बिल्कुल भी नही बदली।" "तुम भी नही.." रात ज्यादा हो गई थी तो अंश ने अंशिका को सोने को बोल दिया और वो गुड नाईट बोल सोने चली गई। अंश जागता रहा रात भर। अपनी गैलरी में बैंगलोर की फोटो और अंशिका के साथ वाली फ़ोटो देखता रहा। कभी मुस्कुराता तो कभी रोता रहा। यही करते करते सुबह हो गयी और सुबह होते ही उसका फ़ोन बज गया। इस बार अंशिका का नही बल्कि अंश की मम्मी का मैसेज था। "बेटा, समय से सो जाया कर" "अर्रे माँ मैं तो सो ही रहा था बस आपके मैसेज ने जगा दिया" वो माँ से बात कर ही रहा होता है कि तभी अंशिका का गुडमार्निंग आ जाता है। वो माँ को बाय बोलकर अंशिका को मैसेज करता है। "उठ गयी?" "हाँ, तुम सोये नही थें ना?" "सोया तो था, अभी जस्ट उठा हूँ" "अपनी माँ से झूठ बोल सकता है, मुझसे नही" "अर्रे दादी अम्मा माफ कर दो" "चलो सो जाओ अब" "नौकरी पर जाना है" "आज छुट्टी ले लो.." "नही ले सकता जाना पड़ेगा" "ठीक है जाओ" ये बोलकर अंश नहा धोकर चारबाग निकल लेता है। आज चारबाग जाते हुए उसकी आंखों में अलग सी चमक है। अंश आज पूरा सा लग रहा हैं। आज अंशिका भी है उसके साथ ऐसा लग रहा है। टेम्पो से उतर वो प्लेटफार्म की तरफ जा रहा होता है कि तभी उसे एक जाना पहचाना चेहरा दिखता है, ये कोई और नही अंशिका थी। अंश को विश्वास नही होता हैं तो वो अपनी आंखे मल कर देखता है फिर भी विश्वास नही होता तो वो खम्बे में अपना सर मारता है मगर उस खम्बे की जगह उसका सर अंशिका के हाथों पर लगता है। अंशिका खम्बे की जगह अपना हाथ रख अंश को अपने बाहों में ले लेती है। अंश रोने लगता है मगर अंशिका कहती है अर्रे जनाब 'मुस्कुराईये आप लखनऊ' में है। अंश इस से पहले कि कुछ पूछता,अंशिका बोलती है "हमारी बात हो गई है आज तुम्हारी छुट्टी है" "अर्रे वो कैसे?" "बेटा तुम हमको नही भूले मगर लगता है तुम हमारे बाप को भूल गए हो..DRM है बाप हमारे बनारस में" "हम अभी लखनऊ में है मैडम" "मगर हो तो रेलवे के कर्मचारी ही ना" "हम्म तो?" "वो तो कुछ नही, छुट्टी है आज तुम्हारी बस" "अब क्या करे?" "लखनऊ दिखाओ, अपने कमरे पर ले चलो" "अबे कमरा छोटा है बहुत" "तो का हुआ तुम बाहर सो जाना" "हा हा हा.." यूँही बाते करते करते वो दोनों कमरे की तरफ जाने के लिए टेम्पो पकडने जाते है मगर अंशिका कहती है "पैदल चले?" "चल लोगी? 4 किलोमीटर है" "तुम्हारे साथ तो हम जन्नत तक चल लें, ये 4 किलोमीटर क्या है.." "जैसी आपकी मर्ज़ी मैडम" दोनों पैदल चल रहे होते है, मेट्रो के नीचे नीचे सड़क के एकदम बीचो बीच। ऐसा लग रहा था कि आज मोहब्बत जैसे बहुत सालो बाद गुलामी से आज़ाद हुई हो। चलते चलते अंशिका अंश का हाथ ज़ोर से पकड़ लेती है। अंश उस ज़ोर को अंदर तक महसूस करता है। उसे ऐसा लगता है मानो जैसे किसी ने अंदर समुंदर की लहरे छोड़ दी हो। आज महीनों बाद अंशिका को अंश का हाथ थाम लगा था कि हर गर्म चीज़ जलाती नही कुछ सुकून भी देती है। अंश के हाथो की गर्माहट उसके मन को तृप्त कर गई। अंशिका अब शांत थी और अंश भी। आज शायद दोनों ने समझा था कि स्पर्श करना कितना काव्यात्मक होता है। ज़रूरी नही कि प्रेम है तो सुकून केवल दो होंठो का स्पर्श ही दे।आज उन्होंने समझा था कि प्रेम में तो बस स्पर्श होना ज़रूरी है। वो स्पर्श चाहे हाथों का हो या फिर प्रेम से डूबे ख्यालो का.... Ï

Ritik Jaiswal

@ Student | पोस्ट किया 16 Jun, 2020 | मनोरंजन / जीवन शैली