रहीम के दोहे के बारें में जानने से पहले हम रहीम की ज़िंदगी के बारें में कुछ जान लेते हैं । रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खाने खाना है ।
(Courtesy : traffic-club )रहीम के दोहे के बारें में जानने से पहले हम रहीम की ज़िंदगी के बारें में कुछ जान लेते हैं । रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खाने खाना है ।
(Courtesy : traffic-club )आप छोटे बच्चे से भी यदि रहीम जी के बारे में पूछ लेंगे तो उनके दोहे के बारे में आपको अवश्य बता देंगे रहीम दास जी का जन्म 1556 ईसवी में लाहौर में हुआ था। आज हम आपको यहां पर रहीम दास जी के दोहे और उनके अर्थ सहित के बारे में चर्चा करेंगे।
रहीम दास जी का दोहा
खैर, खून, खांसी, सुखी, बैर, प्रीति, मद्यपान ।
रहिमन दवे ना दबे, जानत सकल जहान।
अर्थ :- रहीम दास जी इस दोहे के माध्यम से कहना चाहते हैं कि शराब, रक्त, खांसी, सुख,शत्रुता, प्रेम, और मद्यपान जैसी चीजों को छुपाने से भी नहीं छुपाया जा सकता है। क्योंकि इन सभी चीजों की नशा तो सारी दुनिया जानती है इसलिए इसे छुपाना व्यर्थ है।
रहीम जी के दोहे - रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े,जुड़े गांठ पड़ जाए।। इसका यार दिया होता है कि अगर व्यक्ति का एक बार भरोसा टूट जाता है तो वह दोबारा नहीं जुड़ पाता है अगर व्यक्ति द्वारा दोबारा भरोसा करना भी चाहता है तो वह पहले जैसा उस व्यक्ति पर भरोसा नहीं कर पाता है। जैसे कि एक धागा टूट जाने पर अगर उसको व्यक्ति जोड़ता है तो उसमें एक गांठ पड़ जाती है।उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में अगर एक बार मतभेद हो जाता है तो पूरी जिंदगी भर उसके बीच एक मतभेद ही बना रहता है। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में हर व्यक्ति से अच्छे संबंध बनाकर रखना चाहिए।
