Official Letsdiskuss Logo
Official Letsdiskuss Logo

भाषा


pravesh chuahan,BA journalism & mass comm | पोस्ट किया |


क्या यही है लिंग और योनि से बनी मूर्ति की सच्चाई

0
0



हम इंसान किसी की कही बात पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेते हैं चाहे वह मूर्ति पूजन हो या भगवान को मानना हो. हम बाकी लोगों को देखो देख उस बात को सत्य समझने लगते हैं. मगर हम उसके पीछे की वास्तविकता को बिल्कुल भी नही जानते. आस्था के डर ने हमें इन सभी बातों को जानने का मौका ही नहीं दिया है.

अगर कोई बच्चा पैदा होता है तो उसको क्या पता भगवान कौन है,शिव कौन है, विष्णु कौन है, ब्रह्मा कौन है, उस बच्चे को हम जैसा ज्ञान देते हैं वह भी उसी तरह होता हैजैसे हमको हमारे पूर्वजों द्वारा भगवान की पूजा करने की बात कही जाती है हम भी उन्हीं की रणनीति को अपनाते आ रहे हैं और अपने आने वाले बच्चों को भी यही समझ देते हैं.

 जिस वजह से सही क्या होता है गलत क्या होता है हमें पता ही नहीं चलता है क्योंकि हम अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि हमारे पास इतना समय नहीं होता है हम इतिहास की बातों को जान पाए..

सवाल अब यह है कि आखिर शिवलिंग है क्या ? क्या शिवलिंग सच में शिव का ही लिंग है. इन सभी बातों को जानने के लिए धार्मिक पुस्तकों की बातें सुनना बंद कीजिए, जरूरी है कि हम केवल तथयों पर बात करें,  तथ्यों के साथ बात को समझने की कोशिश करें,ना की किसी की कही और सुनी बातों पर ध्यान दें..

हिंदू धर्म में शिवलिंग की पूजा बहुत ही बडे पैमाने पर की जाती है करोड़ों लोगों की शिवलिंग की पूजा करने में आस्था भी है. क्या किसी ने इस बात को जानने की कोशिश की आखिर सच में जिस लिंग की पूजा करते हैं वह लिंग शिवजी का ही था..क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की वह योनि किसकी है. अगर हम किसी पंडित से यह बात पूछेंगे तो वह इस बात को पूरा करने के लिए उसे शिव लिंग का नाम दे देंगे. यानी कि वह लिंग शिव का है. और सभी लोग शिव भगवान का लिंग समझकर उसकी पूजा करते हैं.

हां यह बात तो सच है कि आज से 5000 साल पहले हड़प्पा सभ्यता मे योनि और लिंग से बनी मूर्ति मिलने का सबूत मिलता हैं. इसका मतलब यह नहीं कि यह लिंग शिव का है और हड़प्पा के लोग शिव भगवान की पूजा करते थे. योनि और लिंग से बनी मूर्ति मिलने की वजह से आज हमे यह लगता है कि हड़प्पा के समय पहले भी इस लिंग की पूजा होती थी जिसे आज हम शिवलिंग कहते हैं.

मगर ऐसा बिल्कुल नहीं है. हड़प्पा के समय में भगवान शिव की मूर्ति ही नहीं मिली थी और ना ही भगवान शिव की पुजा करने का प्रमाण मिलता हैं.  हम  इस बात को कह नहीं सकते कि  जो लिंग और योनि वाली मूर्ति मिली थी,वास्तव में उसको लोग शिव का लिंग समझकर पूजा करते थे.जब शिव की मूर्ति ही नहीं मिली,शिव का कोई प्रमाण ही नहीं मिला तो फिर कैसे यह कहा जा सकता है कि उस समय के लोग जिस लिंग की पूजा करते थे... उसे शिव का ही लिंग समझते थे. वह लिंग और योनि की पूजा तो करते थे मगर केवल लिंग और योनि को ही समझ कर..ना कि शिव भगवान का प्रतीक समझकर...

अब आप सोच रहे होंगे कि फिर वह लिंग और योनि की भी पूजा क्यों करते थे. इसका बहुत ही सरल सा जवाब है लिंग और योनि की वजह से संतान उत्पन्न होती है. अगर आज दुनिया में अरबों खरबों की संख्या में लोग हैं तो लिंग और योनि को ही वजह कहेंगे. लिंग और योनि की पूजा हड़प्पा के लोगों द्वारा की जाने की वजह यही है. यानी कि लिंग और योनि की पूजा करने का हड़प्पा के लोगों का मुख्य मकसद केवल इसकी वजह से इंसानों की उत्पत्ति होती है. इसलिए वह लिंग और योनि से बनी मूर्ति की पूजा करते थे.
 
अराजक तत्वों द्वारा बहुत ही सोची समझी साजिश रच कर इस बात को दरकिनार कर दिया गया है कि  लिंग और योनि से बनी मूर्ति की पूजा करने का मुख्य मकसद केवल इसकी वजह से होने वाले इंसानों की उत्पत्ति हैं. आस्था के जाल में लोगों को फंसा कर लिंग और योनि को भगवान शिव का लिंग बताकर शिव की पूजा करवाए जाने का खेल रच दिया. तभी से लेकर अभी तक हम सभी लोग लिंग और योनि से बनी मूर्ति को शिव का लिंग समझकर उसकी पूजा करते हैं. मगर इसके पीछे का कारण हम बिल्कुल भी जानने की कोशिश नहीं करते हैं जिस वजह से आस्था का डर दिखाकर शिव का डर दिखाकर भगवान शिव का लिंग बता कर हमें लिंग की पूजा करने के लिए बाध्य होना पड़ा है.

अब हर किसी के मन में यह सवाल होगा कि आखिर इतने सालों से चलती आ रही योनि और लिंग की पूजा जो हमारे पूर्वज करते आ रहे हैं तो क्या यह गलत है. करोड़ों लोग शिव के लिंग की पूजा करते हैं तो क्या वह लोग मूर्ख हैं अगर आप इस बात को कहेंगे कि करोड़ों लोगों की संख्या जब शिव के लिंग की पूजा करते हैं तो हम क्यों ना करें.योनि और लिंग की पूजा करना गलत नहीं है. योनि और लिंग की पूजा क्यों की जाती थी आपको इस बात को बता भी दिया है.मगर गलत यह है कि योनि और लिंग को भगवान शिव का लिंग बताकर आस्था के जाल में फंसा कर पूजा करवाना यह गलत है. लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ करना यह गलत है.
 आखिर क्यो योनि और लिंग के इस सच को नहीं बताया जाता है.


आप इतनी जल्दी इस भ्रम से दूर नहीं होंगे कुछ तथ्यों के साथ आपको इस बात को समझने में आसानी होगी:-

इतिहासकारों का मानना है कि गुप्त काल में इस बात का प्रमाण मिलता है कि शिव और पार्वती दोनों पति-पत्नी हैं. इससे पहले के कालों में कहीं भी इस बात का प्रमाण नहीं मिला है कि शिव और पार्वती दोनों थे भी या नहीं थे. यानी कि हड़प्पा की सभ्यता के 2800 वर्षों के बाद शिव के प्रमाण मिलते हैं. कुमारगुप्त प्रथम के समय में जारी किए गए सिक्कों में हमें पहली बार शिव तथा पार्वती के विवाह का उल्लेख मिलता है. आपको जानकर यह हैरानी होगी कि जिन्हें हम बहुत ही प्राचीन समझते आ रहे हैं. जिन देवी-देवताओं को हम सृष्टि का रचयिता मानते हैं  उनकी खुद की  उत्पत्ति का उल्लेख गुप्त काल में मिलता है.गुप्त काल के ही समय में हमें विष्णु और लक्ष्मी के विवाह का प्रमाण मिलता हैं तथा शैव ओर वैष्णव धर्म इस काल में जाकर बहुत ज्यादा शक्तिशाली बन गए. इतिहासकारों के दिए हुए तथ्यों के अनुसार गुप्त काल से पहले हमें मंदिरों के निर्माण का बिल्कुल भी प्रमाण नहीं मिलता हैं. यानी कि गुप्त काल से 3000 सालो से पहले बिल्कुल भी मंदिर नहीं थे. गुप्त काल ही एेसा काल था जिसमें बहुत सारे मंदिर बनाए गए. गुप्त काल को स्वर्ण युग कहा जाता है. गुप्त काल से पहले अगर उल्लेख मिलता भी है तो महात्मा बुद्ध की मूर्तियों का उल्लेख प्रमाणिक रूप से मिलता है. 

यानी कि हमें आज से 1500 साल पहले ही भगवान शिव 
के होने का उल्लेख मिलता है. उससे पहले कहीं भी भगवान शिव की मूर्ति होने का पता नही मिला है अगर मिलता भी है तो उस काल से 3000 वर्षों पहले केवल योनि और लिंग से बनी मूर्ति का पता मिला है.जिसे हम शिवलिंग समझते हैं. सोचने वाली बात यह है कि जब शिव का नाम ही गुप्त काल के समय में प्रचलन में आया तो उस समय से 3000 साल पहले शिव जैसा कोई नाम ही नहीं था यानी कि शिव शब्द ही नहीं था.

हड़प्पा की सभ्यता से योनि और लिंग से बनी मूर्ति की पूजा का प्रचलन चलता आ रहा था गुप्त काल के समय में योनि और लिंग की बनी मूर्ति को और अधिक प्रमाणित करने के लिए लिंग से बनी मूर्ति को भगवान शिव के नाम से जोड़ दिया गया. इसके पीछे कई मनगढ़ंत कहानियां बनाकर योनि और लिंग से बनी मूर्ति को भगवान शिव का चिह्न मानकर भगवान शिव का लिंग यानी कि शिवलिंग का नाम दे दिया गया जिसे आज हम बहुत ही आस्था के साथ पूजते हैं.

वास्तव में देखा जाए तो यह  लिंग और योनि से बनी मूर्ति हमारे ब्रह्मांड की आकृति है, इसके अलावा वह पुरुष और प्रकृति (स्त्री) के बीच समानता और सामजंस्य का प्रतीक भी माना गया है. साधारण शब्दों में कहा जाए तो लिंग को हम पुरुष का प्रतीक कहेंगे और योनि को स्त्री का प्रतीक मानेंगे. ना कि हम इसे शिवलिंग कह देंगे यह कहना बिल्कुल ही उस अंधकार के समान हैं जहां पर प्रकाश होने की बिल्कुल भी कोई उम्मीद नहीं है. इसलिए आप उस अंधकार से खुद भी बचिए उन करोड़ों लोगों को भी बचाइए.

इस लेख का मकसद किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है. बल्कि उस सच से रूबरू कराना है जो सदियों से छुपाया गया है जिस सच को घुमा फिरा कर आस्था के जाल में उलझा कर हमारे सामने पेश किया गया है. इन सभी अंधविश्वासों से हमें बचना है.लिंग और योनि से बनी मूर्ति की पूजा आप कीजिए. इसमें कोई गलत नहीं है समस्या सिर्फ यही है कि लिंग और योनि को शिव का लिंग बताकर जिस वजह से अंधविश्वास लाया गया है यह बिल्कुल भी सराहनीय योग्य नहीं है.मैं जानता हूं कि इस जीवन में सबसे दुखद पल होता है तो वह यही पल होता है जब हमें सच्चाई का पता चलता है. क्योंकि हमारी बचपन से ही उसके साथ आस्था जुड़ी हुई होती है जिस वजह से मन को बहुत ठेस पहुंचता है. 

मेरा उद्देश्य आप लोगों को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाना है आपको कुछ समय के लिए बुरा लगेगा मगर ज्यादा समय के लिए नहीं. मुझे दुख इस बात का है कि मैं जानता हूं,सबसे दुखद पल तो वह है कि हम बिना सच्चाई जाने अपनी जिंदगी बिता रहे हैं और बिना सच्चाई जाने हम मर भी गए. हमने अपना अनमोल समय  बिना सच जाने ही गंवा दिया.यह जिंदगी तो लौट कर वापस नही आ सकती इसलिए अपनी जिंदगी का अनमोल समय समझदारी के साथ जीना सीखिए. 





pravesh chuahan,BA journalism & mass comm | पोस्ट किया |


क्या यही है लिंग और योनि से बनी मूर्ति की सच्चाई

0
0




हम इंसान किसी की कही बात पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेते हैं चाहे वह मूर्ति पूजन हो या भगवान को मानना हो. हम बाकी लोगों को देखो देख उस बात को सत्य समझने लगते हैं. मगर हम उसके पीछे की वास्तविकता को बिल्कुल भी नही जानते. आस्था के डर ने हमें इन सभी बातों को जानने का मौका ही नहीं दिया है.

अगर कोई बच्चा पैदा होता है तो उसको क्या पता भगवान कौन है,शिव कौन है, विष्णु कौन है, ब्रह्मा कौन है, उस बच्चे को हम जैसा ज्ञान देते हैं वह भी उसी तरह होता है जैसे हमको हमारे पूर्वजों द्वारा भगवान की पूजा करने की बात कही जाती है हम भी उन्हीं की रणनीति को अपनाते आ रहे हैं और अपने आने वाले बच्चों को भी यही समझ देते हैं.

 जिस वजह से सही क्या होता है गलत क्या होता है हमें पता ही नहीं चलता है क्योंकि हम अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि हमारे पास इतना समय नहीं होता है हम इतिहास की बातों को जान पाए..

सवाल अब यह है कि आखिर शिवलिंग है क्या ? क्या शिवलिंग सच में शिव का ही लिंग है. इन सभी बातों को जानने के लिए धार्मिक पुस्तकों की बातें सुनना बंद कीजिए, जरूरी है कि हम केवल तथयों पर बात करें,  तथ्यों के साथ बात को समझने की कोशिश करें,ना की किसी की कही और सुनी बातों पर ध्यान दें..

हिंदू धर्म में शिवलिंग की पूजा बहुत ही बडे पैमाने पर की जाती है करोड़ों लोगों की शिवलिंग की पूजा करने में आस्था भी है. क्या किसी ने इस बात को जानने की कोशिश की आखिर सच में जिस लिंग की पूजा करते हैं वह लिंग शिवजी का ही था..क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की वह योनि किसकी है. अगर हम किसी पंडित से यह बात पूछेंगे तो वह इस बात को पूरा करने के लिए उसे शिव लिंग का नाम दे देंगे. यानी कि वह लिंग शिव का है. और सभी लोग शिव भगवान का लिंग समझकर उसकी पूजा करते हैं.

हां यह बात तो सच है कि आज से 5000 साल पहले हड़प्पा सभ्यता मे योनि और लिंग से बनी मूर्ति मिलने का सबूत मिलता हैं. इसका मतलब यह नहीं कि यह लिंग शिव का है और हड़प्पा के लोग शिव भगवान की पूजा करते थे. योनि और लिंग से बनी मूर्ति मिलने की वजह से आज हमे यह लगता है कि हड़प्पा के समय पहले भी इस लिंग की पूजा होती थी जिसे आज हम शिवलिंग कहते हैं.

मगर ऐसा बिल्कुल नहीं है. हड़प्पा के समय में भगवान शिव की मूर्ति ही नहीं मिली थी और ना ही भगवान शिव की पुजा करने का प्रमाण मिलता हैं.  हम  इस बात को कह नहीं सकते कि  जो लिंग और योनि वाली मूर्ति मिली थी,वास्तव में उसको लोग शिव का लिंग समझकर पूजा करते थे.जब शिव की मूर्ति ही नहीं मिली,शिव का कोई प्रमाण ही नहीं मिला तो फिर कैसे यह कहा जा सकता है कि उस समय के लोग जिस लिंग की पूजा करते थे... उसे शिव का ही लिंग समझते थे. वह लिंग और योनि की पूजा तो करते थे मगर केवल लिंग और योनि को ही समझ कर..ना कि शिव भगवान का प्रतीक समझकर...

अब आप सोच रहे होंगे कि फिर वह लिंग और योनि की भी पूजा क्यों करते थे. इसका बहुत ही सरल सा जवाब है लिंग और योनि की वजह से संतान उत्पन्न होती है. अगर आज दुनिया में अरबों खरबों की संख्या में लोग हैं तो लिंग और योनि को ही वजह कहेंगे. लिंग और योनि की पूजा हड़प्पा के लोगों द्वारा की जाने की वजह यही है. यानी कि लिंग और योनि की पूजा करने का हड़प्पा के लोगों का मुख्य मकसद केवल इसकी वजह से इंसानों की उत्पत्ति होती है. इसलिए वह लिंग और योनि से बनी मूर्ति की पूजा करते थे.
 
अराजक तत्वों द्वारा बहुत ही सोची समझी साजिश रच कर इस बात को दरकिनार कर दिया गया है कि  लिंग और योनि से बनी मूर्ति की पूजा करने का मुख्य मकसद केवल इसकी वजह से होने वाले इंसानों की उत्पत्ति हैं. आस्था के जाल में लोगों को फंसा कर लिंग और योनि को भगवान शिव का लिंग बताकर शिव की पूजा करवाए जाने का खेल रच दिया. तभी से लेकर अभी तक हम सभी लोग लिंग और योनि से बनी मूर्ति को शिव का लिंग समझकर उसकी पूजा करते हैं. मगर इसके पीछे का कारण हम बिल्कुल भी जानने की कोशिश नहीं करते हैं जिस वजह से आस्था का डर दिखाकर शिव का डर दिखाकर भगवान शिव का लिंग बता कर हमें लिंग की पूजा करने के लिए बाध्य होना पड़ा है.

अब हर किसी के मन में यह सवाल होगा कि आखिर इतने सालों से चलती आ रही योनि और लिंग की पूजा जो हमारे पूर्वज करते आ रहे हैं तो क्या यह गलत है. करोड़ों लोग शिव के लिंग की पूजा करते हैं तो क्या वह लोग मूर्ख हैं अगर आप इस बात को कहेंगे कि करोड़ों लोगों की संख्या जब शिव के लिंग की पूजा करते हैं तो हम क्यों ना करें.योनि और लिंग की पूजा करना गलत नहीं है. योनि और लिंग की पूजा क्यों की जाती थी आपको इस बात को बता भी दिया है.मगर गलत यह है कि योनि और लिंग को भगवान शिव का लिंग बताकर आस्था के जाल में फंसा कर पूजा करवाना यह गलत है. लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ करना यह गलत है.
 आखिर क्यो योनि और लिंग के इस सच को नहीं बताया जाता है.

आप इतनी जल्दी इस भ्रम से दूर नहीं होंगे कुछ तथ्यों के साथ आपको इस बात को समझने में आसानी होगी:-

इतिहासकारों का मानना है कि गुप्त काल में इस बात का प्रमाण मिलता है कि शिव और पार्वती दोनों पति-पत्नी हैं. इससे पहले के कालों में कहीं भी इस बात का प्रमाण नहीं मिला है कि शिव और पार्वती दोनों थे भी या नहीं थे. यानी कि हड़प्पा की सभ्यता के 2800 वर्षों के बाद शिव के प्रमाण मिलते हैं. कुमारगुप्त प्रथम के समय में जारी किए गए सिक्कों में हमें पहली बार शिव तथा पार्वती के विवाह का उल्लेख मिलता है. आपको जानकर यह हैरानी होगी कि जिन्हें हम बहुत ही प्राचीन समझते आ रहे हैं. जिन देवी-देवताओं को हम सृष्टि का रचयिता मानते हैं  उनकी खुद की  उत्पत्ति का उल्लेख गुप्त काल में मिलता है.गुप्त काल के ही समय में हमें विष्णु और लक्ष्मी के विवाह का प्रमाण मिलता हैं तथा शैव ओर वैष्णव धर्म इस काल में जाकर बहुत ज्यादा शक्तिशाली बन गए. इतिहासकारों के दिए हुए तथ्यों के अनुसार गुप्त काल से पहले हमें मंदिरों के निर्माण का बिल्कुल भी प्रमाण नहीं मिलता हैं. यानी कि गुप्त काल से 3000 सालो से पहले बिल्कुल भी मंदिर नहीं थे. गुप्त काल ही एेसा काल था जिसमें बहुत सारे मंदिर बनाए गए. गुप्त काल को स्वर्ण युग कहा जाता है. गुप्त काल से पहले अगर उल्लेख मिलता भी है तो महात्मा बुद्ध की मूर्तियों का उल्लेख प्रमाणिक रूप से मिलता है. 

यानी कि हमें आज से 1500 साल पहले ही भगवान शिव 
के होने का उल्लेख मिलता है. उससे पहले कहीं भी भगवान शिव की मूर्ति होने का पता नही मिला है अगर मिलता भी है तो उस काल से 3000 वर्षों पहले केवल योनि और लिंग से बनी मूर्ति का पता मिला है.जिसे हम शिवलिंग समझते हैं. सोचने वाली बात यह है कि जब शिव का नाम ही गुप्त काल के समय में प्रचलन में आया तो उस समय से 3000 साल पहले शिव जैसा कोई नाम ही नहीं था यानी कि शिव शब्द ही नहीं था.

हड़प्पा की सभ्यता से योनि और लिंग से बनी मूर्ति की पूजा का प्रचलन चलता आ रहा था गुप्त काल के समय में योनि और लिंग की बनी मूर्ति को और अधिक प्रमाणित करने के लिए लिंग से बनी मूर्ति को भगवान शिव के नाम से जोड़ दिया गया. इसके पीछे कई मनगढ़ंत कहानियां बनाकर योनि और लिंग से बनी मूर्ति को भगवान शिव का चिह्न मानकर भगवान शिव का लिंग यानी कि शिवलिंग का नाम दे दिया गया जिसे आज हम बहुत ही आस्था के साथ पूजते हैं.

वास्तव में देखा जाए तो शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है, इसके अलावा वह पुरुष और प्रकृति (स्त्री) के बीच समानता और सामजंस्य का प्रतीक भी माना गया है. साधारण शब्दों में कहा जाए तो लिंग को हम पुरुष का प्रतीक कहेंगे और योनि को स्त्री का प्रतीक मानेंगे. ना कि हम इसे शिवलिंग कह देंगे यह कहना बिल्कुल ही उस अंधकार के समान हैं जहां पर प्रकाश होने की बिल्कुल भी कोई उम्मीद नहीं है. इसलिए आप उस अंधकार से खुद भी बचिएउन करोड़ों लोगों को भी बचाइए.

इस लेख का मकसद किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है. बल्कि उस सच से रूबरू कराना है जो सदियों से छुपाया गया है जिस सच को घुमा फिरा कर आस्था के जाल में उलझा कर हमारे सामने पेश किया गया है. इन सभी अंधविश्वासों से हमें बचना है.लिंग और योनि से बनी मूर्ति की पूजा आप कीजिए. इसमें कोई गलत नहीं है समस्या सिर्फ यही है कि लिंग और योनि को शिव का लिंग बताकर जिस वजह से अंधविश्वास लाया गया है यह बिल्कुल भी सराहनीय योग्य नहीं है.मैं जानता हूं कि इस जीवन में सबसे दुखद पल होता है तो वह वही पल होता है जब हमें सच्चाई का पता चलता है. क्योंकि हमारी बचपन से ही उसके साथ आस्था जुड़ी हुई होती है जिस वजह से मन को बहुत ठेस पहुंचता है. 

मेरा उद्देश्य आप लोगों को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाना है आपको कुछ समय के लिए बुरा लगेगा मगर ज्यादा समय के लिए नहीं. मुझे दुख इस बात का है कि मैं जानता हूं,सबसे दुखद पल तो वह है कि हम बिना सच्चाई जाने अपनी जिंदगी बिता रहे हैं और बिना सच्चाई जाने हम मर भी गए. हमने अपना अनमोल समय  बिना सच जाने ही गंवा दिया.यह जिंदगी तो लौट कर वापस नही आ सकती इसलिए अपनी जिंदगी का अनमोल समय समझदारी के साथ जीना सीखिए.
क्या यही है लिंग और योनि से बनी मूर्ति की सच्चाई

pravesh chuahan,BA journalism & mass comm | पोस्ट किया |


विवादों में घिरे जूम ऐप की शुरुआत से लेकर इसके अंत काल तक का सफर

0
0




 इन दिनों कोरोनावायरस  की खबरें हर जगह छाई रहती है  इन्हीं के बीच अब नई खबर जूम ऐप का विवादों में  रहना है. आपको हमेशा सुर्खियों में जूम एेप की खबरें तो जरूर दिखाई देती होंगी.इस ऐप पर यह आरोप लग रहा है कि इससे निजी जानकारियां यूजर्स की चोरी हो रही हैं जिस वजह से इस ऐप को लेकर कई देश चेतावनी दे रहे हैं अब यह एेप विवादों की वजह से वायरस की तरह ही चर्चा में छाया हुआ है आइए जानते हैं इस ऐप के बारे में आखिर कब इस  ऐप की शुरुआत हुई और कैसे कितने बिलियन तक की संपत्ति खड़ी कर दी.

जूम को प्ले स्टोर पर 5 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है.प्ले स्टोर पर इस एप को लोग लगातार डाउनलोड कर रहे हैं.हालांकि व्हाट्सएप 5वें नंबर पर चला गया है. 40 करोड़ डाउनलोड के साथ व्हाट्सएप हमेशा टॉप 2 में बना रहता था. जूम उन कंपनियों में से एक है, जिन्हें कोरोना वायरस के कारण सबसे ज्यादा फायदा हुआ है.

 ज़ूम की किसी भी बैठक में शामिल होने के लिए पासवर्ड की आवश्यकता होती है.सितंबर 2015 में, ज़ूम ने सेल्सफोर्स के कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म के साथ जूम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के एकीकरण की घोषणा की, जिससे सेल्सपर्सन अपनी बिक्री के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंस की सहायता ले सकते हैं.


प्रारंभ में, ज़ूम 15 वीडियो प्रतिभागियों के साथ सम्मेलनों की मेजबानी कर सकता था. जनवरी 2013 में बढ़कर 25 हो गया, अक्टूबर 2015 में संस्करण 2.5 के साथ 100,और बाद में व्यावसायिक ग्राहकों के लिए 1,000 हो गया. 2015 और 2016 के मध्य के बीच, ज़ूम वीडियो कम्युनिकेशंस ने स्क्य्पे फॉर बिजनेस के समर्थन और स्लैक के साथ एकीकरण की घोषणा की.

जूम 40 मिनट की समय सीमा के साथ, 100 प्रतिभागियों के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्रदान करता है.इससे अधिक प्रतिभागियों को अनुमति देने, समय सीमा बढ़ाने, और अधिक उन्नत सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए भुगतान पर सदस्यता उपलब्ध हैंहालाँकि ये दावे दुनिया भर के सुरक्षा शोधकर्ताओं द्वारा सत्यापित नहीं किए है. ज़ूम ने अपने उत्पादों के लिए विभिन्न उद्योग मान्यता प्राप्त की है.

कब हुई जूम एेप की स्थापना कैसे हासिल किया मुकाम:-

ज़ूम एेप की स्थापना 2011 में  सिस्को सिस्टम के  एक प्रमुख इंजीनियर एरिक युआन और इसकी सहयोग व्यवसाय इकाई वेबएक्स द्वारा की गई थी यह सेवा जनवरी 2013 में शुरू हुई, और मई 2013 तक इसने एक मिलियन भाग लेने वालो का दावा किया.

जून 2014 तक, जूम के 10 मिलियन उपयोगकर्ता थे. फरवरी 2015 में, ज़ूम वीडियो कम्युनिकेशन के मुख्य उत्पाद, जूम मीटिंग्स का उपयोग करने वाले प्रतिभागियों की संख्या, 40,000 व्यक्तियों तक पहुँच गई, जिसमें 65,000 संगठनों ने सदस्यता ली.कंपनी की स्थापना के बाद से कुल 1 बिलियन मीटिंग मिनट की मेजबान की थी. कंपनी धीरे-धीरे कामयाबी की सीढ़ी चढ़ती ही जा रही थी

इसी दौरान 4 फरवरी, 2015 को, ज़ूम वीडियो कम्युनिकेशंस को सीरीज़ सी फंडिंग में 30 यूएस डॉलर मिलियन मिले.नवंबर 2015 में, रिंगसेंट्रल के पूर्व अध्यक्ष डेविड बर्मन को ज़ूम वीडियो कम्युनिकेशंस अध्यक्ष पद के लिए नामित किया गया था, और वीवा सिस्टम्स के संस्थापक और  सीईओ पीटर गैस्नर, ज़ूम के निदेशक मंडल में शामिल किये. इससे कंपनी में मजबूती भी आई और जल्द ही ऐप बेहतर सुविधाएं लोगों को देने लगा जिस वजह से इस एप की प्रसिद्ध दिनों दिन और बढ़ने लगी

उपलब्धि हासिल करते हुए जनवरी 2017 में, ज़ूम ने आधिकारिक तौर पर यूनिकॉर्न क्लब 1 बिलियन यूएस डॉलर वैल्यूएशन में प्रवेश किया और सीकोइया कटल से एक बिलियन डॉलर वैल्यूएशन पर सीरीज़ डी फंडिंग में100 मिलियन यूएस डॉलर की फंडिंग ली. और यह कमाई करने वाला ऐप के रूप में उभर कर सामने आया

सितंबर 2017 में, ज़ूम ने "ज़ूमटॉपिया 2017" के नाम से,पहला वार्षिक उपयोगकर्ता सम्मेलन आयोजित किया.मार्च 2019 में, ज़ूम को नैस्डैक पर सार्वजनिक करने के लिए दायर किया गया

ऐप  सबसे ज्यादा बुलंदियों पर तब  पहुंचा जब  वायरस के बढ़ते प्रकोप के बाद सभी लोगों को घर में पैक होना पड़ा बाकी किसी आप में एक साथ बहुत से लोगों का वीडियो कॉलिंग में बात करना बिल्कुल भी मुमकिन नहीं था  केवल इसी ऐप के बदौलत ऐसा करना संभव था पूरी दुनिया जहां पर  घर में ही  बंदी बनी हुई थी  इस ऐप ने सब को एक साथ जोड़ दिया  इसकी वजह से  बहुत कम होने लगे  और ऑनलाइन  कामों का प्रचलन बहुत ज्यादा बढ़ गया  यह वह समय था जब इस ऐप ने जबरदस्त  कमाई में भी उछाल हासिल किया और दुनिया में भी अपनी प्रसिद्धि का परिचय दिया रिपोर्ट के मुताबिक 2020 में, ज़ूम के उपयोग में वर्ष की शुरुआत से मार्च के मध्य तक 67% की वृद्धि की जूम ऐप को 343,000 बार डाउनलोड किया गया, जिसमें से लगभग 18% डाउनलोड संयुक्त राज्य अमेरिका में किये गये 2020 के पहले महीने में ज़ूम के उपयोगकर्ताओं की संख्या 2019 के पूरे वर्ष के उपयोगकर्ताओं से अधिक थी.नतीजन, मार्च 2020 तक, ज़ूम के शेयर बढ़कर 160.98 यूएस डॉलर प्रति शेयर हो गए, जिससे शुरुआती एक शेयर की तुलना में अब एक शेयर कीमत में 263% की वृद्धि हुई.कंपनी ने बताया कि दैनिक औसत उपयोगकर्ता कि संख्या दिसंबर 2019 में 10 मिलियन से बढ़कर मार्च 2020 में लगभग 200 मिलियन हो गए. जिस वजह से सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला ऐप यह बन गया.

उसके बाद समय आया जब यह ऐप विवादों में घिरा

 जैसे-जैसे इस ऐप की प्रस्तुति बढ़ती जा रही थी वैसे मैसेज ऐप विवादों में गिरता जा रहा था मार्च 2020 में, फेसबुक सहित तीसरे पक्ष को व्यक्तिगत डेटा का अवैध रूप से खुलासा करने के लिए ज़ूम इन यूएस फेडरल कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया था.सूट के अनुसार, जूम की गोपनीयता नीति उपयोगकर्ताओं को यह नहीं समझाती है कि इसके ऐप में कोड है जो फेसबुक और संभावित अन्य तीसरे पक्षों को जानकारी का खुलासा करता है.उसी महीने, न्यूयॉर्क स्टेट अटॉर्नी जनरल, लेटिटिया जेम्स ने ज़ूम की गोपनीयता और सुरक्षा प्रथाओं की जांच शुरू की. एफबीआई के अनुसार, छात्रों के आईपी पते, ब्राउज़िंग इतिहास, शैक्षणिक प्रगति, और बायोमेट्रिक डेटा समान शिक्षा सेवाओं के उपयोग के दौरान जोखिम में हो सकते हैं.

इस ऐप पर हमेशा से आरोप लग रहे थे कि  यह निजी जानकारियों  को सुरक्षित करने के लिए बाध्य नहीं है इसकी वजह से लोगो निजी जानकारियां  चोरी हो रही है इसको लेकर गोपनीयता विशेषज्ञ भी चिंतित हैं कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों द्वारा ज़ूम का उपयोग छात्रों की अनधिकृत निगरानी और परिवार शैक्षिक अधिकारों और गोपनीयता अधिनियम के तहत छात्रों के अधिकारों के संभावित उल्लंघन के बारे में मुद्दे उठा सकता है. कंपनी का दावा है कि वीडियो सेवाएं फेरपा के अनुरूप हैं, और यह भी दावा करती है कि यह केवल और परिचालन सहायता प्रदान करने के उपयोगकर्ता डेटा एकत्र करता है और संग्रहीत करता है.

विवादों में घिरते देख अप्रैल 2020 में, ज़ूम ने स्वीकार किया कि चीन में स्थित सर्वर के माध्यम से कुछ जूम कॉल को रूट किया जा रहा था. अप्रैल में, न्यूयॉर्क अटॉर्नी जनरल ने ज़ूम के बारे में कई आधिकारिक और स्पष्ट प्रश्न जारी किए हैं.इसके अलावा, अप्रैल 2020 में, द सिटिजन लैब के सुरक्षा शोधकर्ताओं ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि ज़ूम में महत्वपूर्ण सुरक्षा और एन्क्रिप्शन में कमजोरियाँ हैं. जिस वजह से इसकी प्रसिद्ध दिनोंदिन घटने लगी

जिस वजह से मार्च 2020 में कई गोपनीयता और सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर न्यूयॉर्क स्टेट अटॉर्नी जनरल, लेटिटिया जेम्स ने ज़ूम की गोपनीयता और सुरक्षा के लिए जांच शुरू की इन जांचों के बाद, जूम को न्यूयॉर्क सिटी शिक्षा विभाग के प्लेफ़ॉर्म के साथ सुरक्षा और गोपनीयता के मुद्दों के कारण न्यूयॉर्क सिटी स्कूलों से प्रतिबंधित कर दिया गया था.

भारत में इस ऐप के इस्तेमाल की बात की जाए तो. इस ऐप को इस्तेमाल करते हुए सावधानी बरतनी की चेतावनी दी गई है गृह मंत्रालय ने एक निर्देश जारी कर के सरकारी विभागों को इस ऐप को इस्तेमाल करने के लिए चेतावनी दी है.भारत में इस ऐप का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा था. भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद बहुत अधिक है जिस वजह से भारत में  लॉकडाउन की वजह से इस ऐप को बहुत लोगों ने डाउनलोड किया और इसी के जरिए  अपने काम भी किए, ऑफिस की मीटिंग  और स्कूल कॉलेज ऑनलाइन क्लासेस ले रही थे.मगर अब इस एप पर चेतावनी जारी करने के बाद भारत ने भी इस एप से किनारा कर लिया है.  हाल ही में गृह मंत्रालय ने जूम ऐप को लेकर अलर्ट जारी कर दिया है.

विवादों में घिरे जूम ऐप की शुरुआत से लेकर इसके अंत काल तक का सफर

pravesh chuahan,BA journalism & mass comm | पोस्ट किया |


क्या मोदी जी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा हो जाएगा

0
0



क्या मोदी का जो सपना था  देश को कांग्रेस मुक्त भारत बनाएंगे वह पूरा हो जाएगा इन दिनों सुर्खियों में केवल कांग्रेसी छाए हुए हैं और कांग्रेस पार्टी की  कमर मीडिया वालों ने तोड़ रखी है.इन दिनों सुर्ख़ियों में वायरस का प्रकोप मीडिया वालों को दिखाई नहीं दे रहा है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अधिकतर पालघर में हुई दो संतो की भीड़ द्वारा पीटे जाने और उसके बाद मारे जाने की खबर को ज्यादा तूल दे रहे हैं ऐसा लगता है जैसे मीडिया वालों के पास केवल एक पालघर वाली खबर बची है आप देख रहे होंगे कि इस पूरे मामले में कांग्रेस घसिटी जा रही है. क्योंकि महाराष्ट्र में शिवसेना को कांग्रेस ने समर्थन दिया हुआ है जिस वजह से शिवसेना सरकार बनाने में कामयाब हुई थी यानी कि काग्रेस का भी महाराष्ट्र में वजूद है ऐसा भी कहा ही जा सकता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यह पूरा मामला वास्तव में पहले से ही तय मामला है यह पूरा मामला पहले से ही प्रायोजित है कि कब क्या करना है वह कांग्रेस पार्टी को इस मामले की भनक भी नहीं लगती है.

महाराष्ट्र के पालघर में भीड़ द्वारा दो साधु समेत उनके ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है वहां पर एक पुलिस वाला उन लोगों को बचाने में नाकामयाब होता है उसके बाद मीडिया का अपना काम चालू हो जाता है यानी कि गोदी मीडिया ने कांग्रेसी शासित प्रदेश होने की वजह से पालघर के मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की पर ऐसा कामयाबी मिलती न्यूज़ चैनल को नहीं दिख रही थी इस पूरे मामले को हिंदू और मुस्लिम बनाने की कोशिश की गई मगर फिर भी ऐसा नहीं कर पाए. क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने पहले ही इस बात का खंडन कर दिया था कि यह मामला हिंदू-मुस्लिम का नहीं है यह भीड़ द्वारा अनजाने में पीट-पीटकर हत्या किए जाने वाला मामला है इस को सांप्रदायिक रंग ना दिया जाए बकायदा महाराष्ट्र के मंत्री को 101 लोगो के खिलाफ दर्ज हुई  f.i.r. में नाम भी दिखाना पड़ता है ताकि लोगों को यह पता लग सके कि इस मामले में कोई भी मुस्लिम नहीं है महाराष्ट्र के मंत्री को नहीं पता था कि जहां पर मीडिया अड जाए तो वह कहीं ना कहीं से मामले को घुमा फिरा कर आप पर थोप ही देगी.

इस पर भी मीडिया चुप नहीं रहती है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कोरोना वायरस का पीछा छोड़ कर पालघर मामले के पीछे पड़ जाती है और कांग्रेस को घेरने का मौका नहीं छोड़ती है इसी बीच एक रिपब्लिक भारत चैनल के पत्रकार जिनका नाम है अरनव गोस्वामी वह चर्चा में आ जाते हैं और अभी भी चर्चा में आए हुए हैं. अर्नब गोस्वामी जो खेल रचना चाहते थे उस खेल में कांग्रेसी फस जाती है यानी कि यह पूरा मामला पहले से ही प्रायोजित था बस इस मामले में थोड़ी सी ही गलती करने की देरी थी अर्नब गोस्वामी अपने प्राइम टाइम शो में पूछता है भारत में सोनिया गांधी पर जमकर वार करते हैं गोस्वामी का कहना होता है कि वह पालघर मामले में आखिर चुप क्यों हैं बस यही सवाल वे सोनिया गांधी से लगातार पूछे ही जा रहे थे और कांग्रेस पार्टी पर हमला लगातार करता ही जा रहा था मगर बाद में अपना आपा खो बैठा और गोस्वामी सोनिया के असली नाम एंटोनियो मैनो काफी इस्तेमाल करने लगता है और अपनी भाषा की मर्यादा ना बना पाने में कामयाब कांग्रेस पार्टी कि सोनिया गांधी के खिलाफ अभद्र भाषा का उपयोग करता है ऐसा लगता है जैसे सोनिया गांधी एक साधारण सी व्यक्ति है इसी बीच अन्य गोस्वामी के खिलाफ कांग्रेस पार्टी के सदस्य द्वारा देश के विभिन्न थानों में एफ आई आर दर्ज करवा दी जाती हैं. जोकि अरनव गोस्वामी यही चाहता था.


शो खत्म होने के बाद जब अरनव गोस्वामी घर जाते हैं तो रास्ते में उन पर दो कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा हमला कर दिया जाता है यह मामला पूरा फिल्मी लगने लगता है गोस्वामी 5 मिनट की एक वीडियो जारी करते हैं और इसमें सोनिया गांधी को कहीं का नहीं छोड़ते हैं.

और अगले दिन सभी न्यूज़ चैनल कांग्रेश का बेड़ा गर्क कर देते हैं क्योंकि पहले से ही यह पूरा माजरा प्रायोजित था बस कांग्रेश को जाल में फंसा ना बाकी था और अरनव गोस्वामी ज्योति रिपब्लिक भारत के पत्रकार हैं कांग्रेश को फंसाने में कामयाब हो जाते हैं. अगले दिन के प्राइम टाइम शो में गोस्वामी फिर से सोनिया गांधी खुला चैलेंज करते हैं और उन पर जमकर निशाना साधते हैं शायद आजादी के बाद पहले ऐसा हुआ होगा जब किसी पत्रकार ने वरिष्ठ नेता के साथ इस तरह से अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया हो और पत्रकारिता की मर्यादा को भूल चुका हो.

कांग्रेस को अर्णब गोस्वामी का जवाब देना चाहिए था ना कि कायरों की तरह एफ आई आर दर्ज करवा कर अपना पल्ला झाड़ने का था. कांग्रे सोचती है कि अफेयर दर्ज करवाकर में हैं अपना गोस्वामी को शिकंजे में कस लें कि मगर ऐसा नहीं होता है अरनव गोस्वामी को कोर्ट की तरफ से 3 हफ्ते की राहत प्रदान कर दी जाती है और साथ ही सिक्योरिटी भी दे दी जाती है इस पूरे मामले में कांग्रेसी बैकफुट पर आ चुकी है और कांग्रेस को आरोपी बना दिया गया है वैसे भी पहले से ही कांग्रेस को मीडिया वालों ने अपंग बना ही दिया था और रहती कसर अरनव गोस्वामी ने निकाल दी इस पूरे मामले में कांग्रेस पार्टी अब किसी काम की नहीं रही है लोगों के मन में जो छवि पार्टी के लिए जो बन चुकी है उसको बदला नहीं जा सकता है क्योंकि आने वाले लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ही जीतेगी इस बात का आंकड़ा हम इस पूरी घटना से लगा सकते हैं और गोस्वामी को पता है कि कांग्रेसी कुछ सालों तक सेंट्रल की सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाएगी और मोदी ही आगे भी आएंगे.

इन दिनों कोरोनावायरस की वजह से पूरा देश घर में पैक हो चुका है और जाहिर सी बात है कि टीवी चैनल तो रोज लोग देखते ही होंगे कांग्रेस पार्टी मीडिया वालों का यह खेल नहीं समझ पाए और वह अरनव गोस्वामी के बनाए हुए जाल में फस कर जो थोड़ा बहुत उनका वजूद भारत में बचा होता है उसको भी खत्म करवा लेती हैं. अरनव गोस्वामी में जिस तरह सोनिया गांधी को टारगेट किया है साथ ही पता चलता है कि इसमें घोर राजनीति है इसके पीछे बहुत बड़ा षड्यंत्र रचा गया है अब जाहिर सी बात है कि जो लोग घर पर बैठे हुए हैं वह टीवी तो जरूर देखेंगे ही और वह देख रहे होंगे जिस तरह पूरे कांग्रेश की बदनामी हो रही है उससे लोगों के मन में कांग्रेस के प्रति जो थोड़ा बहुत सनेह होगा भी वह भी खत्म हो जाएगा.

एक पत्रकार ने पूरी कांग्रेस पार्टी को कटघरे में कर खड़ा कर रखा है और कांग्रेसी पार्टी उसके सामने बेबस हो चुकी है पार्टी इस वक्त केवल अरनव गोस्वामी का प्राइम सो ही देख रही होगी क्योंकि जिस तरह अपने शो में गोस्वामी धमकी देते हैं ऐसा लगता है जैसे मैं पार्टी से हाथापाई ही करना चाहते हैं कांग्रेस को इस पूरे मामले में शांत रहना चाहिए था ना कि एफ आई आर दर्ज करवा कर अपना ज्यादा बेड़ा गर्क करवाना था.

हर कोई जानता है कि गोस्वामी के खिलाफ हुई f.i.r. का कोई मतलब नहीं है और वह इस एफ आई आर से कानूनी दांवपेच खेलकर बच जाएंगे. कांग्रेस को इस वक्त चाहिए कि वह जितनी जल्दी हो सके कोई रणनीति तैयार करें नहीं तो लोकसभा चुनाव तो वह पहले से ही हार चुकी है और अब कुछ खास बचा नहीं है बीजेपी का एक सपना था कि भारत कांग्रेस मुक्त हो जाए और यह सपना लगता कि अर्नव गोस्वामी पूरा ही कर देंगे. एक सोची-समझी साजिश के तहत कांग्रेस को फंसा लिया गया मीडिया द्वारा और कांग्रेस समझ भी नहीं पाई. आखिर 70 साल देश में राज की हुई पार्टी इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह पत्रकार के सामने निरस्त हो चुकी है उसको जवाब भी देना वह नहीं जा रही है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस मुक्त भारत का सपना जो मोदी सरकार ने देखा था वह पूरा हो जाएगा क्या कांग्रेश जल्द ही कोई रणनीति तैयार करेगी जिससे वह फिर से देश की नजरों में उचित रूप से आप आए ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं लगता है ऐसा लगता है जैसे 70 साल राज की हुई पार्टी अब पत्रकारों के सामने खिलौना बन चुकी है.



क्या मोदी जी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा हो जाएगा