सोचो एक पल के लिए कि अगर कोई ज़हर हो जो दिखे नहीं, सुनाई न दे, महसूस भी न हो... लेकिन अंदर ही अंदर इंसान को, जानवरों को, पूरी धरती को खोखला करता जाए। तो? यही है रेडियोधर्मी प्रदूषण। और सच कहूँ तो हम में से ज़्यादातर लोग इसके बारे में उतना नहीं जानते जितना जानना चाहिए।
हवा, पानी, मिट्टी इन सबका प्रदूषण तो हम समझते हैं। पर रेडियोधर्मी प्रदूषण थोड़ा अलग है। ये सिर्फ गंदगी नहीं है। ये एक अदृश्य ऊर्जा है जो हर चीज़ में घुस जाती है और नुकसान पहुंचाती रहती है, सालों तक, दशकों तक, कभी कभी सदियों तक।

रेडियोधर्मी प्रदूषण है क्या असल में?
सीधे शब्दों में बोलूं तो जब रेडियोधर्मी पदार्थ अपने आप टूटते हैं, इसे विघटन कहते हैं, तो उनसे कुछ खास किरणें निकलती हैं। ये किरणें यानी अल्फा, बीटा और गामा जब पर्यावरण में फैल जाती हैं तो वही रेडियोधर्मी प्रदूषण बन जाता है। ये किरणें लगातार निकलती रहती हैं, रुकती नहीं। इन आंखों से न देखा जा सकता है, न नाक से सूंघा जा सकता है। लेकिन नुकसान? वो बहुत असली है।
प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और गामा किरणें जो छोटी तरंग वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगें होती हैं, ये सब जब शरीर के अंदर जाती हैं तो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं। DNA टूटता है। जीन्स बदल जाते हैं। और इन बदले हुए जीन्स का असर अगली पीढ़ी तक पहुंचता है। मतलब जो गलती आज हुई, उसकी सज़ा आपके बच्चे भुगतेंगे। ये सोच कर ही रूह कांप जाती है।
इसके स्रोत प्राकृतिक भी हैं और इंसानी भी
ये ज़रूरी नहीं कि रेडियोधर्मी प्रदूषण सिर्फ इंसानों की वजह से हो। कुछ स्रोत तो प्रकृति ने खुद बनाए हैं। ब्रह्मांडीय किरणें अंतरिक्ष से आती हैं और पृथ्वी तक पहुंचती हैं। रेडियम-224 मिट्टी और चट्टानों में पाया जाता है। पोटेशियम-40 जो हमारे खाने में भी होता है उसका एक रेडियोधर्मी रूप होता है। कार्बन-14 वातावरण में स्वाभाविक रूप से मौजूद रहता है।
पर असली समस्या इंसानों ने खड़ी की है। परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण, परमाणु ऊर्जा संयंत्र, थोरियम और यूरेनियम की खनन और शोधन प्रक्रिया, प्लूटोनियम का उत्पादन, परमाणु ईंधन तैयार करने की प्रक्रिया, और अस्पतालों व प्रयोगशालाओं में रेडियोधर्मी सामग्री का गलत उपयोग। इन सबमें से सबसे ज़्यादा खतरनाक परमाणु हथियार हैं। इसमें कोई दो राय नहीं।
परमाणु हथियार और एक काला इतिहास
1945 का साल। द्वितीय विश्व युद्ध अपने आखिरी दौर में था। और तब हुआ वो जो इतिहास में कभी नहीं भुलाया जाएगा। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर और 9 अगस्त को नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए। एक झटके में लाखों लोग मर गए। लेकिन जो बचे, उनकी तकलीफ खत्म नहीं हुई। वो सालों तक रेडिएशन की वजह से कैंसर, अनुवांशिक बीमारियां और न जाने क्या क्या झेलते रहे।
उस दिन के बाद से दुनिया के हर बड़े देश को जैसे परमाणु हथियार रखने का जुनून हो गया। अमेरिका, रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान सब दौड़ में लग गए। और इस दौड़ में पर्यावरण को कितना नुकसान हुआ, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है।
परमाणु विस्फोट में अनियंत्रित श्रृंखला प्रतिक्रियाहोती है। एक परमाणु टूटता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और इस प्रक्रिया में आयोडीन-131, सीज़ियम-137 जैसे खतरनाक रेडियोधर्मी तत्व बनते हैं। ये तत्व गैस बनकर हवा में उड़ते हैं, वो मशरूम जैसा बादल बनता है जो तस्वीरों में दिखता है। और फिर ये सब वाष्प बनकर मिट्टी में, पानी में, फसलों में मिल जाता है। इसके बाद जो होता है वो धीरे धीरे होता है, पर होता ज़रूर है।
शरीर और पर्यावरण पर असर
- रेडियोधर्मी प्रदूषण का असर तुरंत भी होता है और धीरे धीरे भी। अगर अनावरण बहुत ज़्यादा हो तो त्वचा जल जाती है, उल्टी और बुखार होता है, बाल झड़ने लगते हैं और बेहद गंभीर मामलों में तो तुरंत मौत भी हो सकती है।
- लंबे समय में ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर सबसे ज़्यादा देखा जाता है। इसके अलावा त्वचा का कैंसर, थायरॉइड कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, प्रजनन क्षमता पर असर, और बच्चों में जन्म दोष यानी जन्मजात विकृतियां भी होते हैं। DNA में म्युटेशन होता है जो अगली पीढ़ी को मिलता है।
- और सबसे दर्दनाक बात यह है कि उत्परिवर्तित जीन यानी उत्परिवर्तित जीनपीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते हैं। मतलब जो नुकसान आज हुआ उसका असर आपके बच्चों को और उनके बच्चों को भी झेलना पड़ सकता है।
- पर्यावरण पर भी असर कम नहीं है। मिट्टी बंजर हो जाती है। पानी दूषित होता है। जानवरों और पौधों की प्रजातियां खत्म होती हैं। चेरनोबिल और फुकुशिमा के आसपास आज भी कई इलाके रहने के लायक नहीं हैं।
चेरनोबिल जब लापरवाही ने तबाही मचाई
1986 में यूक्रेन में, जो उस समय सोवियत संघ का हिस्सा था, चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र में विस्फोट हुआ। ये इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटनाओं में से एक है। रेडिएशन इतना फैला कि पूरे यूरोप तक इसका असर पहुंचा। हज़ारों लोगों की जानें गईं, तुरंत नहीं पर धीरे धीरे कैंसर और दूसरी बीमारियों से। चेरनोबिल के आसपास का अनन्य क्षेत्र आज भी बंद है। 38 साल बाद भी। सोचो ज़रा।
फुकुशिमा 2011 में जापान में एक और उदाहरण बना। सुनामी के बाद परमाणु संयंत्र में रेडिएशन लीक हुआ। समुद्र का पानी दूषित हुआ, मछलियां प्रभावित हुईं, लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं। ये चेतावनियां हैं जो हम बार बार अनदेखा करते जा रहे हैं।
रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचाव के उपाय
इसका कोई आसान जवाब नहीं है। पर कुछ ज़रूरी कदम हैं जो उठाने ही होंगे। परमाणु संयंत्रों और रेडियोधर्मी स्थलों की हर वक्त निगरानी होनी चाहिए ताकि चेरनोबिल जैसी लापरवाही दोबारा न हो। परमाणु हथियारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध सिर्फ कागज़ों में नहीं बल्कि ज़मीन पर लागू होना चाहिए। NPT यानी Nuclear Non-Proliferation Treaty को और मज़बूत बनाना होगा।
रेडियोधर्मी कचरे को बस कहीं भी नहीं फेंका जा सकता। विशेष कंटेनरों में, ज़मीन की गहराई में, वैज्ञानिक तरीके से इसका निपटान होना चाहिए। परमाणु संयंत्रों में काम करने वाले हर व्यक्ति को सही ट्रेनिंग और सुरक्षा उपकरण मिलने चाहिए। आम जनता को रेडियोधर्मी प्रदूषण के बारे में पता होना चाहिए। स्कूलों में, कॉलेजों में, मीडिया में इस पर बात होनी चाहिए। और जितना ज़्यादा हम सौर और पवन जैसे ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करेंगे, परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता उतनी कम होगी।
ये सिर्फ सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है। सच कहूं तो हम सब ज़िम्मेदार हैं। हर देश जो परमाणु हथियार बनाता है, हर कंपनी जो रेडियोधर्मी कचरे को सही से नहीं संभालती, हर नागरिक जो इन मुद्दों पर चुप रहता है। महाशक्ति बनने की होड़ ने हमें कहां पहुंचाया? हिरोशिमा, नागासाकी, चेरनोबिल, फुकुशिमा ये सब उसी होड़ के नतीजे हैं। हमें यह समझना होगा कि जो धरती हमें मिली है वो सिर्फ हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी है।
अगर आज हम इस खूबसूरत पर्यावरण को रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचाने के लिए कुछ नहीं करते तो कल बहुत देर हो जाएगी। रेडियोधर्मी प्रदूषण कोई दूर की कल्पना नहीं है। ये एक असली, मौजूदा खतरा है जो हर दिन बढ़ता जा रहा है।