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रश्मिरथी: कर्ण की व्यथा और उनके संघर्ष का अद्भुत महाकाव्य

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| Posted on October 27, 2018


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा 1952 में रचित खंड काव्य 'रश्मिरथी' (Rashmirathi) केवल एक कविता नहीं, बल्कि महाभारत के सबसे उपेक्षित, फिर भी सबसे महान पात्र - कर्ण के जीवन का एक जीवंत दस्तावेज़ है। 'रश्मिरथी' का शाब्दिक अर्थ है "वह व्यक्ति जिसका रथ सूर्य की रश्मियों (किरणों) से बना हो" या "सूर्य का रथ हांकने वाला"।

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यह नाम सुनने में जितना सरल प्रतीत होता है, इसके अर्थ में उतनी ही असीम गहराई छिपी है। रश्मिरथी उस पीड़ा को दर्शाती है जिससे होकर कर्ण गुज़रे थे, उस भाव को दर्शाती है जिसने एक भाई को भक्षक और एक शत्रु को रक्षक बना दिया। यदि आप कर्ण के मुख से उनके संघर्ष को जानना चाहते हैं, तो दिनकर जी की यह रचना आपके हृदय को झकझोर कर रख देगी।

रश्मिरथी की पृष्ठभूमि: एक दुर्भाग्यपूर्ण शुरुआत

कर्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं थे, वे सूर्यपुत्र थे। जन्म से ही उनके कानों में कुंडल और छाती पर अभेद्य कवच था। परन्तु विडंबना देखिए, उनको जन्म देने वाली माता कुंती उस समय अविवाहित थीं। लोक-लाज और समाज के भय से कुंती ने अपने नवजात शिशु को एक टोकरी में रखकर अश्व नदी (गंगा) की लहरों के सुपुर्द कर दिया।

जल की लहरों पर तैरते हुए उस तेजस्वी बालक को एक निःसंतान सारथी, अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने अपनाया। कर्ण 'सारथी पुत्र' या 'सूतपुत्र' अवश्य कहलाए, परन्तु उनके भीतर कुरु वंश का राजसी रक्त और सूर्य का तेज उफन रहा था। इसी जन्मजात तेज और उनकी सामाजिक स्थिति के बीच का जो द्वंद्व है, वही कर्ण की व्यथा का मूल कारण बना।

सूतपुत्र होने का दंश और शिक्षा का संघर्ष

दिनकर जी रश्मिरथी में बताते हैं कि कैसे एक सारथी के घर पलने के बावजूद, कर्ण के अंदर जीवन में सर्वोच्च शिखर पाने की ललक थी। वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनना चाहते थे। लेकिन जब वे गुरु द्रोणाचार्य के पास गए, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि वे केवल क्षत्रियों को शिक्षा देते हैं।

यह कर्ण के जीवन का पहला बड़ा आघात था, जहाँ उनकी प्रतिभा को उनकी जाति के तराजू पर तौला गया।

भगवान परशुराम से शिक्षा और वह भयंकर श्राप

शिक्षा पाने की जिद्द में कर्ण ने भगवान परशुराम की शरण ली और खुद को एक ब्राह्मण बताकर दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन जब गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे, तब एक विषैले कीड़े ने कर्ण को काट लिया। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण ने वह भयंकर पीड़ा सह ली और रक्त बहने दिया।

रक्त के स्पर्श से जब परशुराम की नींद खुली, तो वे समझ गए कि इतनी सहनशक्ति किसी ब्राह्मण में नहीं हो सकती, यह कोई क्षत्रिय ही है। क्रोधित होकर उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि "जब तुझे मेरी दी हुई विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, तब तू इसे भूल जाएगा।" यह श्राप कर्ण की मृत्यु का एक बड़ा कारण बना।

रंगभूमि का अपमान और दुर्योधन की मित्रता

रश्मिरथी के सबसे मार्मिक प्रसंगों में से एक है रंगभूमि का दृश्य। जब गुरु द्रोण ने पांडवों और कौरवों के शस्त्र-कौशल का प्रदर्शन रखा, तब अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित किया जा रहा था। तभी कर्ण ने उस सभा में प्रवेश किया और अर्जुन को द्वंद्व के लिए ललकारा।

परंतु वहाँ भी कृपाचार्य ने कर्ण की जाति और कुल पूछ लिया - "राजपुत्र से लड़ेगा, तो पहले अपना गोत्र बता!"

उस पूरी भीड़ में जहाँ हर कोई कर्ण का उपहास कर रहा था, केवल एक हाथ आगे बढ़ा - दुर्योधन का। दुर्योधन ने उसी क्षण कर्ण को 'अंग देश' का राजा घोषित कर दिया। यही वह क्षण था जिसने कर्ण को आजीवन दुर्योधन का ऋणी बना दिया। यह मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि कर्ण ने जानते हुए भी कि दुर्योधन अधर्म के मार्ग पर है, अंत तक उसका साथ नहीं छोड़ा।

दानवीर कर्ण: जो मांगा, सो दे दिया

कर्ण को केवल उनके शौर्य के लिए नहीं, बल्कि उनकी असीम दानवीरता के लिए जाना जाता है। रश्मिरथी में उनके दानवीर स्वरूप का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन है।

देवराज इंद्र जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उनका जन्मजात कवच और कुंडल है, तब तक अर्जुन उन्हें पराजित नहीं कर सकता। इसलिए, इंद्र ने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और सुबह सूर्योपासना के समय कर्ण से भिक्षा में उनके कवच-कुंडल मांग लिए। कर्ण यह भली-भांति जानते थे कि यह एक छल है और कवच-कुंडल के बिना उनकी मृत्यु निश्चित है। फिर भी, बिना एक क्षण गंवाए, उन्होंने अपने शरीर से कवच-कुंडल छीलकर दान कर दिए। ऐसी दानवीरता इतिहास में कहीं और नहीं मिलती।

कुंती और कर्ण का संवाद: एक माँ की ग्लानि

महाभारत के युद्ध से ठीक पहले का वह दृश्य 'रश्मिरथी' के पंचम सर्ग में वर्णित है, जब कुंती कर्ण के पास जाती हैं। कुंती कर्ण को सच्चाई बताती हैं कि वह उनका ज्येष्ठ पुत्र है और उनसे पांडवों के पक्ष में युद्ध करने की विनती करती हैं।

कर्ण की व्यथा यहाँ अपने चरम पर होती है। वह अपनी माँ से पूछते हैं कि "जब मुझे बहा दिया था, तब आपकी ममता कहाँ थी? आज जब अर्जुन की जान खतरे में है, तब आपको अपने इस सूतपुत्र की याद आई?" फिर भी, अपनी दानवीर वृत्ति के कारण कर्ण अपनी माता को वचन देते हैं कि वह अर्जुन के सिवा किसी अन्य पांडव का वध नहीं करेंगे। "तुम्हारे पाँच पुत्र हमेशा जीवित रहेंगे, या तो अर्जुन के साथ, या अर्जुन की जगह मेरे साथ।" यह वचन कर्ण की महानता और उनकी करुणा का सबसे बड़ा प्रमाण है।

कुरुक्षेत्र का युद्ध और महायोध्दा का अंत

महाभारत का युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों का नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म, जाति और प्रतिभा के बीच का युद्ध था। कर्ण की गाथा गंगा की लहरों से शुरू हुई थी और कुरुक्षेत्र के रक्तरंजित मैदान पर आकर खत्म हुई।

युद्ध के दौरान जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वे निहत्थे होकर पहिया निकाल रहे थे, तब भगवान कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने उन पर बाण चला दिया। यह युद्ध के नियमों के विरुद्ध था, लेकिन कर्ण की मृत्यु किसी एक बाण से नहीं हुई थी। उनकी मृत्यु तो समाज के उन सभी भेदभावों, श्रापों और वचनों से हुई थी जो उन्हें जीवन भर छलते रहे।

रश्मिरथी: आज के युग में क्यों प्रासंगिक है?

रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मिरथी' के माध्यम से सदियों पहले की कथा को आधुनिक समाज के सामने एक आईने की तरह रखा है। यह महाकाव्य हमें सिखाता है:

  1. प्रतिभा जन्म की मोहताज नहीं: योग्यता किसी विशेष कुल या जाति में जन्म लेने से नहीं आती, बल्कि व्यक्ति के अपने पुरुषार्थ से तय होती है।

  2. सच्ची मित्रता: दुर्योधन और कर्ण की मित्रता दिखाती है कि जब पूरा संसार आपके खिलाफ हो और कोई एक व्यक्ति आप पर विश्वास जताए, तो उसके प्रति वफादारी क्या होती है।

  3. सामाजिक भेदभाव का परिणाम: जाति-पाति और भेदभाव केवल समाज का विध्वंस करते हैं। कर्ण की प्रतिभा का यदि सही उपयोग होता, तो शायद महाभारत का युद्ध ही न होता।

निष्कर्ष

रश्मिरथी कर्ण की वह गाथा है जिसे कहानी से ज्यादा उनकी 'व्यथा' के रूप में अनुभव किया जाना चाहिए। सूर्यपुत्र होकर भी वे उन सभी सुखों और सम्मान से वंचित रहे जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। रामधारी सिंह दिनकर की लेखनी ने कर्ण के चरित्र की ग्लानि, पीड़ा, शौर्य और करुणा को जिस तरह पिरोया है, वह हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। भाइयों के बीच के द्वेष ने महाभारत को जन्म दिया और कर्ण को उनकी खोयी हुई पहचान तब मिली जब बहुत देर हो चुकी थी।

यदि आप जीवन के संघर्षों, धर्म-अधर्म के द्वंद्व और एक योद्धा के अदम्य साहस को समझना चाहते हैं, तो आपको अपने जीवन में एक बार रामधारी सिंह दिनकर की 'रश्मिरथी' अवश्य पढ़नी चाहिए।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1 'रश्मिरथी' का क्या अर्थ है?
रश्मिरथी का शाब्दिक अर्थ है "सूर्य की किरणों का रथ हांकने वाला"। महाभारत के संदर्भ में यह नाम सूर्यपुत्र कर्ण के लिए प्रयोग किया गया है, जो अत्यंत तेजस्वी और ऊर्जावान थे।
Q2 रश्मिरथी की रचना किसने और कब की थी?
रश्मिरथी की रचना हिंदी साहित्य के महान कवि 'राष्ट्रकवि' रामधारी सिंह दिनकर ने वर्ष 1952 में की थी।
Q3 कर्ण को 'दानवीर' क्यों कहा जाता है?
कर्ण ने अपने जीवन में कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। यहाँ तक कि जब देवराज इंद्र ने छल से उनके प्राणरक्षक कवच और कुंडल मांगे, तब भी अपनी मृत्यु निश्चित जानकर उन्होंने उसे दान कर दिया था।
Q4 कर्ण को किस बात का सबसे अधिक दुख (व्यथा) था?
कर्ण की सबसे बड़ी व्यथा यह थी कि असीम प्रतिभा और सामर्थ्य होने के बावजूद उन्हें जीवन भर 'सूतपुत्र' (सारथी का बेटा) कहकर अपमानित किया गया और समाज ने उन्हें उनके क्षत्रिय अधिकारों से वंचित रखा।
Q5 रश्मिरथी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यह महाकाव्य हमें सिखाता है कि मनुष्य की महानता उसके जन्म या कुल से नहीं, बल्कि उसके कर्म, पुरुषार्थ और गुणों से तय होती है। यह समाज में फैले जातिवाद और भेदभाव पर एक बहुत कड़ा प्रहार है।
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