S
shweta rajput· 5 years ago
Providing reliable, well-researched content across diverse topics to inform, educate, and inspire readers.

क्या महाभारत काल की उन्नति आज से अधिक थी अगर है तो उसका प्रमाण क्या है ?

0
2.7K

Join this conversation

Sort By
महाभारत काल की उन्नति आज से कहीं अधिक - महाभारतकालीन बैटरी के साथ जिंदा प्रमाण ......

20 -30 साल पहले बगदाद में एक बैटरी मिली थी, पूरे विश्व मे उस बैटरी की प्रदर्शनी लगी । बताया गया की यह बैटरी 2000 साल पुरानी है । अब 2000 साल से ज़्यादा पुरानी वह बता नही सकते थे, क्यो की उन लोगो के हिसाब से तो पूरा मानव इतिहास ही मात्र 2000 वर्ष पुराना है ....

वास्तव में यह बैटरी महाभारत काल की ही थी, जो उन्हें 5000 वर्षो बाद मिली, ओर हैरानी की बात यह है, की यह बैटरी एक्टिव थी ..... बगदाद बैटरी या पार्थियन बैटरी तीन कलाकृतियों का एक सेट है, जो एक साथ पाए गए थे: एक सिरेमिक पॉट, तांबे की एक ट्यूब, और लोहा की छड़ - मैं आपसे बगदाद बैटरी का ज़्यादा वर्णन क्या करूँ ?? आप स्वयं गूगल कर लीजिए, गाजे बाजे के साथ अंग्रेजो ने अपनी उन्नति की कथा सुना रखी है .... सर्च कर लीजिए ....

मानव में मात्र #रि- सर्च किया है, कुछ भी सर्च नही किया है । रिसर्च का अर्थ है, वह दुबारा ढूंढना, जो पहले खो चुका हो ।। विज्ञान कभी भी सर्च नही करता, रिसर्च ही करता है ।।

लेकिन क्या मात्र बैटरी के उदाहरण से आप मान जाने वाले है, मैं जानता हूँ, आपको कुछ और ज़्यादा प्रूफ चाहिए.....

सिर्फ बैटरी ही नही, नासा करोड़ो अरबो लगाकर ख़ौज कर पाया कि पृथ्वी गोल है ..... यह बात हिन्दुओ को बिना खर्चा किए ही पता थी, वेदों में वर्णन है :--

पृथ्वी गोल है, विज्ञान 70 साल में यह जान पाया है, हिन्दू करोड़ो वर्षो से यह बात जानते है ।

चक्राणासः
परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुभमानाः ।
न हिन्दानासस्ति तिरुस्त इन्द्र परिस्पशो अदधात् सूर्येण ॥ ऋग्वेद १०/१४६/१

इसका तात्पर्य है कि पृथ्वी गोल है । उसके आधे भाग पर सूर्य चमकता है और दूसरे अर्द्ध पर अंधेरा होता है । पृथ्वी सूर्य से आकर्षित टंगी रहती है ।

सविता यन्त्रः पृथिवीमरम्णान् अस्कंभने सविता द्यामदृहत । सौरयन्त्र पृथ्वी को परिभ्रमण कराता है । अन्य ग्रह भी उसी प्रणाली से घूमते रहते हैं ।

रामायण में लिखा है

गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथादूहिः ।
नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ ते तु ज्योतिषुजाज्वलम् ।। ( बालकाण्ड , सर्ग ६० )

अर्थात् ' आकाश में अपने सूर्यमण्डल के पार अगणित ज्वलन्त नक्षत्र हैं । इस प्रकार प्राचीन संस्कृत पार्ष ग्रन्थों में असीम आकाश में दीखने वाले या केवल बुद्धिगम्य ऐसे अनेकानेक रहस्यों का पूरा विवरण है । वस्तुतः आधुनिक शास्त्रज्ञों ने यदि ध्यानपूर्वक उस साहित्य का अध्ययन किया होता तो उनकी कई वैज्ञानिक उलझनों के उत्तर उन्हें मिल गए होते ।


महाभारतीय युद्धारम्भ के पूर्व अंधे धृतराष्ट्र को युद्धक्षेत्र का प्रति क्षण का जो प्रत्यक्ष आँखों देखा हाल राज प्रासाद में बैठकर संजय ने सुनाया वह दूरदर्शन यन्त्र के बिना शक्य ही नहीं था ।
आजकल हम विदेशों में चले क्रिकेट , फुटबाल , टेनिस आदि खेलों की स्पर्धा घर बैठे प्रत्यक्ष देख सकते हैं और उस खेल का दिया जाने वाला विवरण सुन सकते हैं । वही धृतराष्ट्र ने किया । अतः उस प्राचीन काल में ( यानी ईसापूर्व वर्ष ३१००-3२००में ) भी दूरदर्शन आदि यन्त्र थे

गीता में भगवान कृष्ण ने ' भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ' ऐसा कहा है ।

घूमने वाले यन्त्रों की उपमा तभी दी जा सकती थी जब ऐसे यन्त्र नित्य परिचित होते । अर्जुन को विराट रूप बताने के पूर्व ' दिव्यं ददामि ते चक्षुः ' ऐसा भगवान् कृष्ण ने कहा है । इससे भी यह पता लगता है कि मानवी चक्षु और कर्ण की सीमित क्षमता ध्यान में लेते हुए विविध विशाल या दूरदृश्यों का ज्ञान कराने वाली यन्त्रणा अतिप्राचीन काल में भी होती थी ।


बैटरी है, तो बिजली नही होगी, यह तो सवाल ही नही, फिर भी हम आपकी यह जिज्ञासा भी शांत कर देते है ...

Current विद्युत - प्रवाह के लिए आंग्ल - भाषा में जो current शब्द है , उसका वह मूलतः वर्तमान उच्चार ' करंट ' किया जाता है । तथापि वह उच्चार विकृत है । आंग्ल मूलाक्षरों में ' C ' का उच्चार ' स ' होने के कारण ' current ' शब्द का उच्चार ' सरन्त ' करने पर तुरन्त पता चलता ' सरन्त ' ऐसा संस्कृत शब्द है । विद्युत्प्रवाह सरिता - जैसे बहता रहता है प्रतः उसे #सरन्त कहना अति योग्य है । उस शब्द से पता लगता है कि विद्युत्प्रवाह का निर्मिति - ज्ञान प्राचीन काल में भी था ।

यदि ऐसा नहीं होता तो उसे ' सरन्त ' नाम कैसे दिया जा सकता था । विद्युत्शक्ति ' हॉर्सपॉवर ' यानी ' अश्वशक्नि ' अंकों से नापी जाती है । प्राचीन वैदिक समाज में अश्वशक्ति का विपुल प्रयोग होता था । अतः अश्वशक्ति भी उसी प्राचीन संस्कृत - परिभाषा का ही एक अंग है । आकाश में जो बिजली कड़कती है वह और बादल पृथ्वीस्तर से १२ योजन दूर ऊपर आकाश में होते हैं ऐसा प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का यह उल्लेख है -

बिजली निर्माण पर अगत्स्य संहिता भी है .....



Answered by
S
View Profile
Updated on12/18/20
0