S
shweta rajput· 6 years ago
Providing reliable, well-researched content across diverse topics to inform, educate, and inspire readers.

90 के दशक के बच्चों और आज के बच्चों के बीच भारत में क्या अंतर हैं?

5
1.4K

Join this conversation

Sort By
Replying to the question above
Answered on12/04/21

नब्बे के दशक और आज के लड़कों में समय ने बहुत फ़र्क ला दिया है। और अगर भारत की बात करें तो इसमें फ़र्क का सबसे बड़ा कारक रहा सूचना-क्रांति का वह दौर, जिसने बच्चों ही नहीं प्रत्येक के जीवन में आमूल बदलाव ला दिया। उस दौर में अपना बचपना गुज़ार चुके लोग आज भी उन दिनों के बारे में सोचकर अपनी यादें ताज़ा कर सकते हैं।

यह नब्बे के दशक का ही दौर था, जबकि आज की तरह हर हाथ में मोबाइल नहीं हुआ करती थी, और न ही इंटरनेट सेवा तक सबकी पहुंच होती थी। लोगबाग दूर रहने वाले अपने दोस्तों या परिवार के लोगों से संपर्क करने के लिये बेसिक यानी लैंडलाईन फोन की मदद लेते थे, और वह भी सबके यहां नहीं लगा होता था। सो, हममें से बहुतेरे इसके लिये पड़ोस का नंबर देते थे बात करने के लिये, वो भी हिचकते हुये। हालांकि चिठ्ठी-पत्री का चलन भी ख़त्म नहीं हुआ था। और 'प्रेमी-जोड़ों' के लिये तो यह एक मज़बूरी ही हो गई थी। क्योंकि इसमें रंगे हाथ पकड़ जाने का ख़तरा बहुत होता था, और तब बड़ी फ़जीहत भी होती थी। लोग आज की तरह जब चाहे एकदूसरे से संपर्क नहीं कर सकते थे। 'कंप्यूटर युग' भी अपने शैशवावस्था, यानी शुरुआती दौर में ही था। न तो आम लोगों में उसका सामान्य ज्ञान ही था, और उसके साथ समस्यायें भी बहुत थीं।

Article image

यह नब्बे के दशक की ही बात है जब टीवी पर 'दूरदर्शन' के एकाध चैनल ही दिखते थे, और वो भी चौबीसों घंटे नहीं। जब टीवी के साथ ही छत पर भी एक एंटीना लगाना पड़ता था, और छत पर खड़े होकर शहर का नज़ारा देखने पर सारा शहर एंटीना से भरा हुआ सा नज़र आता था। किसी-किसी के यहां बड़ी छतरी वाला 'डिश-एंटीना' लगा होता था, तो वह कई चैनल का आनंद भी ले सकता था। और आसपास के बाल-गोपाल उस डिश से अपने एंटीना को भी चुपके से 'कैच' कराने के लिये भी तरह-तरह के उपाय आज़माया करते थे।

बच्चों के बीच कॉमिक की किताबों का चलन भी तब काफी था। फिर वो चाचा-चौधरी और साबू की हो या कि नागराज या बांकेलाल, बच्चे इन्हें पढ़ते हुये गर्मी की छुट्टी बिता देते। और कभी-कभी तो स्कूल या घर पर इन्हें अपने पाठ्यक्रम की किताबों में छुपाकर पढ़ते हुये पकड़ भी जाते, तब धुनाई भी खूब होती थी। आजकल की तरह बाल-अधिकारों को लेकर न तो इतनी जागरूकता ही थी, और न वैसा कानून। वे गलतियां करने पर अच्छी तरह पीटे जाते, फिर वो घर हो या स्कूल। हां, तब भी 'मां' ज़ुरूर कभी-कभार उन्हें बचाने को चंडी-रूप धर सामने आ जाया करती थी।

Article image

हालांकि बच्चों को टीवी-फिल्में वगैरह देखने की इतनी आज़ादी भी नहीं थी जैसी कि आज है, क्योंकि यह पढ़ाई-लिखाई में खासतौर पर बाधक माने जाते। फिर भी वे सप्ताह में एक दो फिल्में जो आतीं उसे देखने के लिये येन-केन जतन करके बड़ों को मना लिया करते थे। अक्सर रविवार सुबह को आने वाले टीवी सीरियल जैसे रामायण, महाभारत, चंद्रकांता, मोग्ली, चाणक्य, परमवीरचक्र आदि की लोकप्रियता सर्वाधिक हुआ करती थी। और बीच में आने वाले 'कॉमर्शियल्स' जैसे निरमा, पारले, लाइफ़बॉय, कोलगेट या कम्प्लान के प्रचार भी सबको खूब भाते।

गांवों या दूर-दराज़ के इलाकों में तो उपरोक्त सीरियल लोग झुंडों में बैठकर देखा करते थे, क्योंकि सबके यहां टीवी न थी। गाने सुनने के लिये भी आज की तरह बहुत संसाधन न थे, और अधिकतर 'ऑडियो-कैसेट्स' ही चलन में थे। जिसकी रील बीच में कहीं फंस जाने पर उसमें पेन-पेंसिल डालकर घुमाना होता था। आज की तरह 'ईयरफोन' तो बहुत दूर की बात थी तब। हालांकि तब रेडियो भी खासे चलन में थे। और गांवों में या दूर-दराज़ के इलाकों में कुछ वरिष्ठ लोग समाचार सुनने के लिये एक निश्चित समय पर रेडियो को घेर कर बैठ जाया करते थे। उस समय बच्चों को बीच में बोलने की खास मनाही होती। केवल समाचार-वाचक की एक गंभीर सी आवाज़ ही गूंजती रहती उस दरमियान।

Article image

पर जैसा कि प्रकृति या कहें समय का शाश्वत नियम है, आज वह बदलाव आ चुका है। अब तो रेडियो क्या टीवी भी चलन से बाहर हो रही है। इंटरनेट का युग अपने शबाब पर है। पढ़ाई तक उसी से हो रही है। गूगल-गुरू के आगे सब गुरू जैसे फेल हो गये हैं। बच्चों पर हाथ उठाना भी गैरकानूनी है, फिर वो घर हो या स्कूल। बच्चा-बच्चा मोबाइल से खेल रहा है। उनसे कुछ भी छिपाना आसान नहीं। और अधिकतर तो मोबाइल और इंटरनेट के ऐसे माहिर हैं कि कोई साधारण वयस्क उनका मुकाबला न कर सके। कागजी किताबें 'पीडीएफ' में बदली जा रही हैं।

यानी इन तीन दशकों में वक़्त कई करवट ले चुका है। और सूचना-क्रांति के बाद से वक़्त की रफ़्तार भी बहुत तेज हो चुकी है। विज्ञान ने इस बीच बहुत तरक्की कर ली है। यह बात और है कि हर युग की कुछ खासियतों के साथ ही उसमें कुछ अनिवार्य कमियां भी छिपी होती हैं। पर उम्मीद है कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के वास्ते हम समयानुसार वह संतुलन बनाये रखेंगे जिसकी आज दरकार है।

Ramesh Kumar
View Profile
14
Replying to the question above
Answered on12/03/21

90 के दशक के बच्चो और आज के बच्चो के बीच बहुत अधिक फर्क देखने को मिलता है। क्योंकि 90 दशक के बच्चे ऐसे थे कि एक ही कपडे मे दोनों भाई बहन अर्जेस्ट करके पहन लेते थे,और पहले के समय इतना विकास नहीं हुआ था। पहले समय मे मोबाइल फ़ोन इतने ज्यादा नहीं चलते थे और पहले समय मे अच्छे -अच्छे खिलौनो का भी निर्माण नहीं हुआ था। पहले समय मे बच्चे अपने माता -पिता का कहना मानते थे यदि उनके माता पिता बोल दे कि यही बैठना है,तो बच्चे वही बैठते थे और 90दशक के समय के बच्चे के पास इतने खिलौने नहीं होते थे कि वह घर रह कर अकेले खेल सके ऐसे मे बच्चे बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ फुटबॉल, गुल्ली डंडा, बंटी आदि जैसे खेलो को खेलते थे। 90 दशक के बच्चे किसी चीज को लेकर बिल्कुल जिद नहीं करते थे अपनो से बड़ो की बाते सुनते थे और उनका आदर, सम्मान करते थे।

लेकिन वही बदलते समय के अनुसार आज के बच्चे कहे तो न्यू जनरेशन के बच्चे अपने से बड़े अपने दादा, दादी माता -पिता किसी की इज्जत करना नहीं जानते है। सिर्फ अपनी बात मनवाना जनते है, अपनी जिद के आगे किसी नहीं सुनते है उनको कोई मोबाइल पंसद आ गया तो उनको वो मोबाइल चाहिए ही चाहिए भले ही उनके माँ बाप पास उतने पैसे ना हो मोबाइल खरीदने के लेकिन बच्चो की जिद्द के आगे माँ बाप को झुकना ही पड़ता है। आज के समय के बच्चे ऐसे भी है उनके दोस्त कही बाहर हॉस्टल मे रहकर पढ़ाई कर रहे है तो उनको भी हॉस्टल ही जाना है क्योंकि वह अपनी जिद के आगे किसी की नहीं सुनते है आज कल का समय ही ऐसा है कि जिस उम्र मे बच्चो को पढ़ाई मे ध्यान लगाना चाहिए उस उम्र मे बच्चे दोस्तों साथ घूमना, मोबाइल, लैपटॉप मे अपना समय बर्बाद करते है। वही अपने मन की मनमानी हर एक चीज मे करते है अपने माँ बाप की बात ना मनाने की कसम खा के रखते है आज कल के बच्चे। अब के बच्चे जंक फ़ूड खाना अधिक पसंद करते है रोज -रोज घर खाना बिल्कुल पसंद नहीं आता है।

अत : स्पष्ट है कि हम कह सकते है कि 90 दशक के बच्चे और आज के बच्चो मे सिर्फ इतना फर्क है कि 90 दशक के बच्चे संस्कारी थे क्योंकि वह जो भी फैसला लेते थे अपने माता -पिता के आज्ञा का पालन करते हुए लेकिन आज कल बच्चे जो भी फैसले ले रहे खुद की मर्ज़ी से।

Article image

S
View Profile

Mp

7
Replying to the question above
Answered on12/07/21

90 के दशक और आज के बच्चों मैं अंतर

90 के दशक के बच्चे बहुत ही समझदार होते थे। उन्हें खाना खाने, पढ़ने लिखने, खेलकूद, से मतलब रहता था। पहले ना तो मोबाइल का यूज ज्यादा होता था। ना ही ज्यादा टीवी देखते थे। किसी किसी के घर में टीवी रहती थी। आज पड़ोस में जाकर टीवी देखते थे। साथ मिल बैठकर देखते थे। पहले के बच्चे अपने माता-पिता की हर बात मानते थे। जिस से विवाह करने के लिए कहते बिना लड़की को देखे ही विवाह कर लेते थे। टेलीफोन का यूज़ हुआ करता था। वह भी किसी किसी के घर में होता था। यह बच्चे पढ़ाई में अधिक रूचि रखते थे। खेलकूद में भी, सूर्य उदय होने से पहले ही उठ जाते थे। ज्यादा बाजार का सामान नहीं खाते थे। जिस से कम बीमार पड़ते थे। पहले रेडियो में गाने सुनते थे।

अब के बच्चे ना तो टाइम पर सोना ना खाना, देर रात तक जागना फोन चलाना फिर सुबह 8:00 बजे उठना दिन-रात इंटरनेट में घुसे रहना अब पढ़ाई भी ऐसी होती है कि बच्चे 10वीं 12वीं पास हो जाते हैं पर बनता कुछ नहीं पहले ऐसा नहीं था। अब के बच्चे अपने मनपसंद की शादी करते हैं। मां बाप की इज्जत नहीं करते।Article image

Krishna Patel
View Profile
2
Replying to the question above
Answered on12/03/21

90 वाले दशक पहले तो सिंपल मोबाइल नोकिया के लिए रहते थे आप हर बच्चों को देखो तो एंड्राइड मोबाइल लिए रहते हैं। 90 के दशक पहले लिख लुका छिपाकर गेम खेला करते थे अब तो देखो फ्री फायर के फैन हो गए हैं। 90 के दशक बच्चे पहले दादा दादी नानी आदि से कहानी सुनते सुनते सो जाते थे और अब के बच्चों को देखो तो वेब सीरीज में लगे रहते हैं। 90 के दशक में पहले चूल्हे की रोटी में मैच लेते थे अब और आप के दशक के बच्चों को देखो कि गैस की रोटी खाते हैं.।Article image

Aanchal Singh
View Profile
2
Replying to the question above
Answered on12/03/21

(1) 1990 के बच्चे अपना जीवन यापन बहुत ही साधारण तरीके से बिताते थे, आज के बच्चों का जीवन बहुत ही अच्छे से गुजरता है!

( 2)अगर पहले के बच्चे बीमार हो जाता थे तो उनके लिए डॉक्टर नहीं होते थे उन्हें घरेलू उपचार से ठीक किया जा सकता था!लेकिन आज के समय में छोटी-छोटी बीमारियों के लिए हमें डॉक्टर पर निर्भर रहना पड़ता है!

(3) पहले बच्चों को मक्का की रोटी ,चना आदि खिलाया जाता था!जिससे वह मजबूत रहते थे और वह चूल्हे का बना खाना खाते थे!लेकिन आज हम गैस लाइट के चूल्हे आदि से खाना पकाते हैं,जिसके कारण हमें कई सारी बीमारियों का सामना करना पड़ता है!

(4) पहले के बच्चे साधारण भोजन दाल चावल, रोटी सब्जी खाते थे!लेकिन आजकल के बच्चे पिज़्ज़ा बर्गर,चॉकलेट आदि खाते हैंArticle image

(5) पहले के बच्चों को गाना सुनने के लिए रेडियो का सहारा लेना पड़ता था! लेकिन आज के बच्चों के लिए अनेक प्रकार की न्यू टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाने लगा है जैसे म्यूजिक वीडियो टेलीविजन आदि!Article image

R
Health & nutrition Specialist
View Profile
2
Replying to the question above
Answered on12/03/21

(1) 1990 के दशक में बच्चों को झोपड़ी मैं रहना पड़ता था, लेकिन आज के बच्चों को रहने के लिए अच्छे खासे मकान और घर होते हैं!Article image

(2) पहले के बच्चों के पास गिल्ली डंडा खेलने के अलावा और कोई गेम नहीं होते थे, लेकिन आज की जनरेशन के लिए अनेक प्रकार के खिलौने, वीडियो गेम्स इत्यादि होते हैं.
(3) पहले बच्चों को पढ़ने के लिए पास में स्कूल नहीं होती थी, उन्हें कई किलोमीटर पैदल स्कूल जाना पड़ता था! लेकिन आज के बच्चों के लिए वैन,बस और साइकिल इत्यादि की सुविधा मिलती है.

(4) पहले बच्चों को पढ़ाई करने के लिए स्मार्टफोन आईपैड आदि सुविधा नहीं होती थी!लेकिन आज की जनरेशन के बच्चों के लिए मोबाइल लैपटॉप कंप्यूटर इंटरनेट की सुविधा दी जाती है.

(5) अगर पहले के बच्चे बीमार हो जाता थे तो उनके लिए डॉक्टर नहीं होते थे उन्हें घरेलू उपचार से ठीक किया जा सकता था!लेकिन आज के समय में छोटी-छोटी बीमारियों के लिए हमें डॉक्टर पर निर्भर रहना पड़ता है.

(6) पहले बच्चों को मक्का की रोटी ,चना आदि खिलाया जाता था!जिससे वह मजबूत रहते थे और वह चूल्हे का बना खाना खाते थे!लेकिन आज हम गैस लाइट के चूल्हे आदि से खाना पकाते हैं,जिसके कारण हमें कई सारी बीमारियों का सामना करना पड़ता है.

Article image

preeti  patel
View Profile
2
Replying to the question above
Answered on12/03/21

90 के दशक और आज मे टेकनॉलाजी ने बहोत बड़ी जगह बनाई है । पहले के बच्चों के पास साधन कम थे तो वह खुश भी ज्यदा रहते थे सीमित खिलोने, सीमित जगह, होने की वजह से वह माँ, बाप जो बोलते थे वह उसे आज्ञा मानते थे लेकिन आज के बच्चे माँ बाप की बात नही सुनते वह उनसे बहस करते है। नई चीजों की मांग करते है। अपने खिलोने, और चीजों की तुलना दुसरो के खिलोने से करते है। इसका सबसे बड़ा कारण मोबाइल फोन भी है। 90 के दशक मे केवल सीमित लोगो के पास फोन था काम के हिसाब से मोबाइल का उपयोग होता था और आज हर घर मे हर व्यक्ति के पास खुद का मोबाइल फोन है यहा तक की बच्चों के भी अपने फोन है। ऐसे मे बच्चे मोबाइल मे क्या करते रहते है यह माँ बाप को पता भी नही होता। और बच्चे गलत संगत का शिकार होते रहते है। Article image

komal Solanki
View Profile
2