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Punitti wari

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भारत में मशरुम की खेती के बारे में आपके क्या विचार हैं? क्या यह लाभदायक है?


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pravesh chuahan,BA journalism & mass comm | पोस्ट किया


पिछले कई वर्षों से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दे रहे कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी व मशरूम विशेषज्ञ डॉ. आईके कुशवाहा बताते हैं तीन तरह के मशरूम का उत्पादन होता है. अभी सितम्बर महीने से  नवंबर तक ढ़िगरी मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं| इसके बाद आप फरवरी-मार्च तक श्वेत बटन मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं|इसके बाद जून-जुलाई तक मिल्की मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं.इस तरह आप साल भर मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं|

मुख्यत:तीन तरह के भारत में मशरूम उगाए जाते हैं  
श्वेत बटन मशरूम, ढिंगरी मशरूम (ऑयस्टर मशरुम), दूधिया मशरूम (मिल्की)

तो आइए मिलते हैं उन किसानों से जिन्होंने मशरूम की खेती कर बहुत अधिक मुनाफा कमाया है


सहारनपुर जिले के रामपुर मनिहार ब्लॉक के मदनूकी गाँव में दर्जन से अधिक किसान मशरूम की खेती करने लगे हैं| मदनूकी गाँव के किसान सत्यवीर सिंह ने 2009 में कृषि विज्ञान केंद्र की सहायता से उन्होंने मशरूम की खेती की शुरूआत की| वो बताते हैं साल 2009 में उन्होंने मशरूम की खेती तीस कुंतल कंम्पोस्ट के एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर शूरू की थी| आज मैं साल में लगभग 6000 बैग्स में बटन मशरूम लगाता हूं, और आठ हजार बैग आयस्टर मशरूम के लगाता हूं|

अजरैलपुर गाँव निवासी अजय यादव (28 वर्ष) ने बताया कि  वह  हर वर्ष  करीब 5 क्विंटल कंपोस्ट पर बटन मशरूम की खेती करते हैं| इसकी फसल अक्टूबर-नवंबर में ही लगाई जाती है| प्रति एक क्विंटल कम्पोस्ट पर 40 किलो के औसत उत्पादन के हिसाब से अजय को लगभग 2,000 किलो मशरूम का उत्पादन मिलता है| ‘‘औसतन 150 रुपए प्रति किलो का रेट मिल जाता है और प्रति क्विंटल लागत ₹1000 की आती है और काफी मुनाफा कमाया जाता है|

लखनऊ के उत्तर में 35 किमी दूर स्थित इस क्षेत्र में मशरूम जैसी फसल की खेती करने वाले अर्जुन अकेले किसान हैं| अर्जुन को 2000 किलो मशरूम का बाज़ार भाव तीन लाख रुपए तक मिल जाता है| इसमें से यदि प्रति क्विंटल 1,000 रुपए के हिसाब से 50 क्विंटल की 50,000 रुपए की लागत निकाल दें तो लगभग ढाई लाख रुपए बन जाते हैं|

श्री राम किशोर कहार  के बेतुल डिस्ट्रिक्ट के एक छोटे से गांव सील पट्टी में रहते हैं और पिछले 29 सालों से मशरूम की खेती कर रहे हैं | मन में कुछ अच्छा करने की ललक के कारण शीघ्र अपना स्वरोजगार स्थापित करने हेतु 10000 का लोन लिया जिसमें उन्हें मात्र 3000 रुपयों की सब्सिडी भी मिली, और यहीं से उनका मशरूम की खेती करने का सफर चालू हुआ और आज वह पूरे भारत में मशरूम साइंटिस्ट के नाम से भी जाने जाते हैं जो खुद का “विक्रम मशरूम” का उत्पादन करते हैं और उसी का बीज भी सप्लाई करते हैं|

बाराबंकी के मनरखा गाँव में करीब 200 घर बने हुए है इनमें से 100 घरों में पारंपरिेक खेती गेहूं धान के साथ-साथ मशरूम की खेती कर रहे है| बाजार में अधिक मांग के चलते मशरूम की खेती भारत में तेजी से बढ़ी है| 

बाराबंकी मनरखा गाँव के शिवा दिवेद्धी (23वर्ष) ने गाँव के लोगों से ही प्रेरित होकर मशरूम की खेती शुरू की। आज वो इससे अच्छा लाभ कमा रहे है. शिवा बताते हैं,धान की खेती में पांच हजार से ज्यादा की लागत लग जाती है.और लाभ भी उतना ही होता है.लेकिन मशरूम में अगर ढ़ेड लाख रूपए की लागत आई तो छह महीने में पांच लाख रुपए तक कमाई हो जाती है

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