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Updated on Mar 20, 2026entertainment

जिहाले मस्ती मुकुंद बरंदीश का क्या मतलब है?

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Covering the culture, trends, and everyday choices that define how modern India...
Answered on Mar 19, 2026

जिहाले मस्ती मुकुंद बरंदीश

यह एक प्रसिद्ध पंक्ति है जो फारसी और ब्रज भाषा के मिश्रण से बनी है और काफी भावनात्मक अर्थ रखती है। इसका संबंध आमतौर पर अमीर खुसरो की रचना से माना जाता है, जिसमें प्रेम और विरह की भावना व्यक्त की गई है।

इस पंक्ति का सरल अर्थ है कि प्रेम में डूबा हुआ व्यक्ति अपने प्रिय के बिना बेचैन और दुखी है। इसमें प्रेमी की हालत बताई गई है कि वह अपने साथी की जुदाई में तड़प रहा है और उसकी याद में परेशान है। यह पंक्ति गहरे प्रेम, दर्द और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती है।

आज भी यह लाइन गानों और शायरी में इस्तेमाल होती है, जिससे इसकी लोकप्रियता बनी हुई है। इसका अर्थ प्रेम में डूबे व्यक्ति की बेचैनी और विरह की भावना को व्यक्त करना है।

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ABOUT THE AUTHORKavya Sharma

Kavya Sharma is a lifestyle expert and content writer with over 4 years of experience covering entertainment and lifestyle across digital platforms in India. She holds a Bachelor's degree in Media Studies from Mumbai University, which shaped her understanding of audience behaviour, cultural trends, and how content connects with readers at a personal level. Her writing spans Bollywood and OTT entertainment, fashion, wellness, travel, relationships, and modern living — topics she approaches with both cultural awareness and editorial discipline. Her work has appeared on platforms including Femina.in, Pinkvilla, and Lifestyle Asia India, where she has developed a consistent voice that resonates with urban Indian readers navigating contemporary life. Over four years, Kavya has published 250+ articles covering trend-driven and evergreen lifestyle content. She understands what audiences in this space actually want — content that is relatable, well-researched, and reflective of the way people in India are living, consuming, and making choices today. Across all her work, she maintains a standard of accuracy and cultural sensitivity — ensuring that entertainment and lifestyle conte

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Updated on Dec 23, 2025

वाक्यांश "जिहाले मस्ती मुकुंद बरंदिश" 13वीं शताब्दी के प्रतिष्ठित कवि, संगीतकार और विद्वान अमीर खुसरो की प्रसिद्ध सूफी कविता की एक पंक्ति है। यह विशेष कविता फ़ारसी में है, जिसमें फ़ारसी और हिंदवी (हिंदी का प्रारंभिक रूप) दोनों भाषाओं का मिश्रण है। यह एक वाक्यांश है जो आध्यात्मिक और रहस्यमय गहराई को व्यक्त करते हुए अर्थ और प्रतीकवाद से समृद्ध है।

"जिहाले मस्ती मुकुंद बरंदिश" का सीधा और सरल अनुवाद नहीं है; इसकी व्याख्या की गहराई संदर्भ, साहित्यिक प्रशंसा और सूफी विचार की समझ पर आधारित है।

आइए इसके संभावित अर्थों का पता लगाने के लिए वाक्यांश को तोड़ें:

जिहाल-ए-मस्ती: "जिहाल" का अर्थ है 'स्थिति' या 'स्थिति', और "मस्ती" का अर्थ है 'नशा' या 'परमानंद'। तो, "जिहाल-ए-मस्ती" को किसी चीज़ के नशे में होने या बेहोश होने की स्थिति के रूप में समझा जा सकता है। सूफी कविता में, 'नशा' अक्सर दिव्य प्रेम या आध्यात्मिक परमानंद से अभिभूत होने का प्रतीक है।

मुकुंद: "मुकुंद" एक पुराना फ़ारसी शब्द है और इसका अर्थ 'मुक्ति देने वाला' या 'मुक्तिदाता' हो सकता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ है और यह एक दिव्य आकृति या शक्ति का प्रतिनिधित्व कर सकता है जो आध्यात्मिक स्वतंत्रता या मुक्ति लाता है।

बारांडिश: इस शब्द का सीधे अनुवाद करना अधिक जटिल हो सकता है। इस संदर्भ में, "बारांडिश" का अर्थ 'प्रदान करना', 'अनुदान देना', 'सृजन करना' या 'अभिव्यक्ति' हो सकता है। यह अक्सर दैवीय या आध्यात्मिक अर्थ में, कुछ प्रदान करने या बनाने के कार्य को संदर्भित करता है।

इन व्याख्याओं को एक साथ रखने पर, "जिहाले मस्ती मुकुंद बरंदिश" का अर्थ आध्यात्मिक परमानंद या दैवीय नशा की स्थिति हो सकता है जो मुक्ति की ओर ले जाता है या कुछ आध्यात्मिक प्रदान किया जाता है।

अमीर खुसरो की कविता अक्सर दिव्य प्रेम, प्रेमी और प्रेमिका के मिलन (अक्सर साधक और परमात्मा का प्रतिनिधित्व करती है), और आध्यात्मिक यात्रा के विषय पर केंद्रित होती है। इस संदर्भ में, इस वाक्यांश को गहन आध्यात्मिक आनंद या परमानंद समाधि के रूप में समझा जा सकता है जो अंततः आध्यात्मिक मुक्ति या परमात्मा के साथ मिलन की स्थिति की ओर ले जाता है।

सूफी कविता अक्सर रूपकों, प्रतीकवाद और स्तरित अर्थों का उपयोग करती है। यह बारीकियों और कई व्याख्याओं से समृद्ध है, जो पाठकों को जीवन के गहरे आध्यात्मिक और रहस्यमय पहलुओं विचार करने के लिए आमंत्रित करता है।

कुल मिलाकर, "जिहाले मस्ती मुकुंद बरंदिश" सूफी साहित्य की एक गहरी और खूबसूरती से तैयार की गई पंक्ति है, जो आध्यात्मिक नशा और परिणामी दिव्य उपहार या मुक्ति का सार दर्शाती है। इसकी गहराई और समृद्धि चिंतन को आमंत्रित करती है, जिससे व्यक्तियों को इसकी व्याख्या इस तरीके से करने की अनुमति मिलती है जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा और समझ से मेल खाती है।

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Veer Pal
Updated on Dec 23, 2025
 
जिहाल-ए -मिस्कीन मकुन बरंजिश , बेहाल-ए -हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन , तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
 
( मुझे रंजिश से भरी इन निगाहों से ना देखो क्योकि मेरा बेचारा दिल जुदाई के मारे यूँही बेहाल है। जिस दिल कि धड़कन तुम सुन रहे हो वो तुम्हारा या मेरा ही दिल है )
 
कुछ ऐसी कशिश थी 'गुलामी ' के इस गाने में कि दिल और दिमाग में उतर गया। बाद में जब समझ और शौक आया तो जाना कि ये गाना लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार ने गाया था। लेकिन गाने कि पहली लाइन क्या है ये कभी समझ नहीं आया। इसके बाद की लाइन हिंदी में थी सो समझ आ जाती थी। कई साल तक इस गाने को मै " जिहाले मस्ती मुकुंद रंजिश" सुनतीरही !
,गुगल की कृपा से मैंने एक साल पहले इस गाने की पहली लाइन समझी और ये जाना कि गुलज़ार ने ये गाना अमीर खुसरो कि एक बेहतरीन सूफियाना कविता से प्रेरित होकर बनाया था
इस गाने की सबसे बेहतरीन लाईने जो मेरी पसंदीदा है ......
" वो आ के पहलु में ऐसे बैठे ,की शाम रंगीन हो गई है ,
जरा जरा सी खिली तबियत , जरा सी ग़मगीन हो गई है "
 
 .....वीरपाल
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ABOUT THE AUTHORVeer Pal

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