Avinash Kumar
Avinash Kumar· 5 years ago
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गुरु व्यास पौर्णिमा क्या है| गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा कैसे शुरू हुई?

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Answered on07/24/21

गुरु / व्यास पौर्णिमा की पूर्ण जानकारी

गुरु / व्यास पौर्णिमा क्या हैः

एक मात्र व्यास महर्षिजी ने चार वेद, अठारह पुराण, छह शास्त्र, महाभारत आदि प्रचंड साहित्य का कैसे निर्माण किया? उस पर अंतर्मुख होकर सोचेंगे तो एक ही व्यक्ति में एक ही जन्म में निर्माण करना संभव है, यह स्पष्ट है। अपने पूर्वजों के, अपना नाम अमर होने के बजाय अपने किए कार्य अजरामर हो, ऐसी सदीच्छा थी। “मैं चिंतन परक आत्म साक्षात्कार से व्यक्त साहित्य लिख कर रखूं तो वह जनमानस को मार्गदर्शक होगा। वे उसका अभ्यास करेंगे”। इसी आकांक्षा से, उसका श्रेय, अपने को न लेते हुए, वह लिखकर रखें।

मैं ही सियार हूं। यह अभिमान अपने में जागृत हुआ तो भविष्यत् कार्य कुंठित होगा। अहंकार इह पर दोनों को हानि पहुँचाता है। वह रमानंद प्राप्ति में रुकावट डालता है। अपना पूरा जीवन ही व्यर्थ हो जाता है। ऐसे सूझ विचारों से - उन्होंने अपने अनुभवों को लिखकर रखा।

चार वेद निर्माण किएः

ऐसे अनेक साक्षात्कारी महान पुरुषों ने लिखकर रखा साहित्य व्यास महर्षि जी ने इकट्ठित करके चार भागों में विभाजित करके चार वेद, निर्माण किए। अतः उन्हें ‘वेद – व्यास’ कहते हैं। उसी महापुरुष का नाम ‘व्यास’ है। ऐसे कुल 27 महान व्यास हो गए। देवी भागवत् और विष्णु पुराण में इसका उल्लेख है। आगे चलकर उनके दिए ज्ञान का अध्ययन करने की प्रथा की रुढ़िगत हुई।

आषाढ़ से कार्तिक तक के चार माह वर्षा ऋतु के, इन चार मासों में बाहर जाना तीर्थ यात्रा करना दुस्तर था। अतएव ये महात्मा एक ही गांव में निवास कर के अध्ययन - अध्यापन करते थे। कवि कालिदास ने ‘आषाढ़ मासे प्रथम दिवसे’ है अर्थात आषाढ़ का एक दिन का सुंदर वर्णन मेघदूत में किया है। यह ज्ञानी लोग आषाढ़ माह के पूर्णिमा को अपने कार्यों का संकल्प करते थे और वह कार्य इन्हीं चार माहें में पूर्ण करते थे।

गुरु व्यास पौर्णिमा क्या है| गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा कैसे शुरू हुई?

व्यास महर्षि के काल से शुरू हुई थीः

यह प्रथा व्यास महर्षि के काल से शुरू हुई थी। उनका आदर्श भविष्य में रखें इसी उद्देश्य से हर साल व्यास - पूर्णिमा मनाने की परंपरा शुरू हुई। आगे चलकर ज्ञानी पुरुषों का ज्ञान आत्मसात् करके आत्म साक्षात्कार प्राप्त किए - आत्मसाक्षात्कारी गुरु शिष्यों को इस ज्ञान का बोध कराने लगे और यह गुरु परंपरा शुरू हो गई। इसी दिन गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का शिष्यों का कर्तव्य है। शिष्य गुरु पूजा करके उनके चरणों पर अपनी अनन्य भक्ति श्रद्धा रखकर नत मस्तक होते हैं। प्रणाम करते हैं। इसीलिए इस पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” भी कहते हैं। यह त्यौहार सब वृद्धजन बड़े उत्साह से मनाते हैं।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव।।

अर्थात - आप ही माता है। आप ही पिता है। आप ही बंधु है, मित्र है, विद्या है, धन है। हे देवाधिदेव। सद्गुरु आप ही मेरे सब कुछ है।

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