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Current Topicsपैरोल-व-फरलो मे क्या अंतर है
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| Updated on March 1, 2022 | news-current-topics

पैरोल-व-फरलो मे क्या अंतर है

2 Answers
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@krishnapatel8792 | Posted on February 23, 2022

पैरोल और फैरलो के बीच अंतर :-

फरलो जेल के एक निश्चित समय अवधि के लिए दी गई छुट्टी होती है और वही पैरलो शर्तों पर जेल की सजा का निलंबन है। फरलो एक कैदी का अधिकार होता है इसलिए उसे समय-समय पर इस अधिकार को दिया जाता है और कभी-कभी यह बिना किसी कारण के भी उसे अपने परिवार के साथ संबंध बनाए रखने के लिए प्रदान किया जाता है। और पैरलो कैदी का अधिकार नहीं होता है। पैरलो की समय अवधि अधिकतम 1 महीने की होती है लेकिन फैरलो का समय 14 दिन के लिए होता है।Article image

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@shersingh5259 | Posted on March 1, 2022

हमारे कानून में कुछ मानवीय वज़हों से कैदियों को कुछ समय के लिये कैद से छूट देने का प्रावधान भी है। ऐसा पैरोल और फरलो के नियमों के अंतर्गत किया जाता है। पर अक्सर हम पैरोल और फरलो को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन पैरोल और फरलो दोनों अलग-अलग चीजें हैं।

दरअसल पैरोल और फरलो दोनों ही प्रावधान जेल से किसी बंदी या दोषी व्यक्ति को मिलने वाली अनुपस्थिति की छूट से संबंधित हैं। देखें तो दोनों एक ही प्रकृति का कानून संप्रेषित करते हैं; हालांकि प्रतिक्रियात्मक तौर पर एक दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं।

फरलो का अवकाश एक सजायाफ़्ता कैदी का अधिकार है जो अकारण भी मिल सकता है। जबकि पैरोल सजायाफ़्ता अथवा विचाराधीन किसी भी तरह के बंदी को किसी जरूरी कारण से कुछ समय के लिये कैद से मिलने वाली छूट है। पैरोल और फरलो चूंकि कारागार यानी जेल प्रशासन को संदर्भित कानून हैं, जो राज्य सरकार के अधीन है। इसलिये पैरोल और फरलो से संबंधित हर सूबे के अपने-अपने नियम भी हैं। हालांकि इसकी व्यापक अवधारणा हर जगह समान है।

Letsdiskuss

पैरोल और फरलो में मुख्य अंतर इस प्रकार हैं --

  • सबसे प्रमुख तो पैरोल और फरलो के बीच का सैद्धांतिक फ़र्क है। पैरोल कुछ शर्तें पर कैदी की सजा का एक निश्चित समय के लिये निलंबन है। जबकि फरलो कुछ निश्चित समय के लिये जेल से औपचारिक तौर पर मिली छुट्टी है|
  • फरलो किसी कैदी का अपना अधिकार होता है। जो उसे बिना किसी वज़ह के अपने परिवार और परिजनों से मिलने के लिये भी दिया जा सकता है। फरलो के तहत कैदियों को समय-समय पर छोड़ दिया जाता है। पर पैरोल बिना किसी ठोस कारण के नहीं मिलता। यह कैदी का अपना अधिकार नहीं होता। और कभी-कभी तो सभी तार्किक आधार मौज़ूद होते हुये भी सक्षम प्राधिकरण किसी को पैरोल देने से मना कर सकता है। अगर उससे सामाजिक शांति और समरसता भंग होने की आशंका है तो।
  • फरलो के तहत अवकाश सजायाफ़्ता अपराधी को ही मिलता है, जबकि पैरोल सजायाफ़्ता अथवा विचाराधीन किसी भी तरह के कैदी को मिल सकता है।
  • एक अपराधी को कितनी बार पैरोल मिल सकता है इसकी कोई सीमा नहीं है। पर फरलो के मामले में हर राज्य में इसके लिये अलग-अलग सीमा निश्चित की गई है।
  • पैरोल अमूमन छोटी अवधि के कारावास से संबंधित मामलों में मिलता है, जबकि फरलो लंबी अवधि के कारावास में।
  • फरलो अकारण भी दिया जा सकता है, जबकि पैरोल के लिये कोई ठोस कारण मौज़ूद होना जरूरी होता है।
  • पैरोल एक माह तक का हो सकता है, जबकि फरलो ज्यादा से ज्यादा चौदह दिनों का
  • फरलो के तहत अपराधियों को कैद से मिले अवकाश की अवधि उनकी सजा की अवधि में ही शामिल रहती है। अर्थात् फरलो के दिन भी सजा में ही गिने जाते हैं। पर पैरोल में ऐसा नहीं होता। जितना वक़्त कैदी पैरोल के तौर पर गुजारता है वह उसकी सजा की अवधि में से कम हो जाता है। इसलिये फिर उसे इतनी ही अवधि सजा में और बितानी पड़ती है।
  • फरलो कारागार के उपमहानिरीक्षक के स्तर से प्रदान कर दिया जाता है, जबकि पैरोल डिवीज़नल कमिश्नर द्वारा।
  • पैरोल के मामलों में सक्षम प्राधिकरण संभागीय आयुक्त होता है, जबकि फरलो के लिये जेलों का उपमहानिरीक्षक।

उम्मीद है कि अब तक अपराधियों को मानवीय आधार पर कैद से मिलने वाली छुट्टियों के संबंध में पैरोल और फरलो का फ़र्क हमारे सामने काफी-कुछ साफ हो गया होगा।

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