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shweta rajput· 6 years ago
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राष्ट्रवाढ और राष्ट्रद्रोह में अंतर क्या है

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राष्ट्रवाद लंबे समय से राजनीतिक दर्शन में एक विषय के रूप में नजरअंदाज कर दिया गया है, जो कि बीते समय के अवशेष के रूप में लिखा गया है। यह नब्बे के दशक में, दार्शनिक बहस के ध्यान में आया, आंशिक रूप से बल्कि शानदार और परेशान राष्ट्रवादी झड़पों के परिणामस्वरूप, जैसे रवांडा, पूर्व यूगोस्लाविया और पूर्व सोवियत गणराज्यों में। राष्ट्रवाद के परिवर्तन एक नैतिक रूप से अस्पष्ट प्रस्तुत करते हैं, और इस कारण से अक्सर आकर्षक, चित्र। "राष्ट्रीय जागृति" और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष अक्सर वीर और क्रूर दोनों होते हैं; एक पहचानने योग्य राष्ट्रीय राज्य का गठन अक्सर गहरी लोकप्रिय भावना का जवाब देता है, लेकिन कभी-कभी हिंसक निष्कासन और गैर-नागरिकों की "सफाई" से सामूहिक हत्या के लिए अमानवीय परिणाम देता है। राष्ट्रवाद पर नैतिक बहस एक तरफ उत्पीड़ित राष्ट्रीय समूहों के साथ एकजुटता के बीच एक गहरी नैतिक तनाव को दर्शाती है और दूसरी ओर राष्ट्रवाद के नाम पर अपराधों के प्रति प्रतिकार। इसके अलावा, राष्ट्रवाद का मुद्दा लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर जातीय और सांस्कृतिक मतभेदों के उपचार से संबंधित समस्याओं के एक व्यापक डोमेन की ओर इशारा करता है, जो समकालीन राजनीतिक सिद्धांत की सबसे अधिक दबाव वाली समस्याओं में से है।
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R
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Answered on07/16/20
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"राष्ट्रवाद" शब्द का उपयोग आम तौर पर दो घटनाओं का वर्णन करने के लिए किया जाता है:

किसी राष्ट्र के सदस्यों की उनके राष्ट्रीय पहचान के बारे में ध्यान रखने का रवैया, और
किसी राष्ट्र के सदस्यों को प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले कार्य (या निरंतर) आत्मनिर्णय।
एक राष्ट्र (या राष्ट्रीय पहचान) की अवधारणा के बारे में सवाल उठाता है, जिसे अक्सर सामान्य उत्पत्ति, जातीयता या सांस्कृतिक संबंधों के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है, और विशेष रूप से इस बारे में कि क्या किसी व्यक्ति की राष्ट्र में सदस्यता को गैर-स्वैच्छिक माना जाना चाहिए या स्वैच्छिक। इस बारे में सवाल उठाता है कि क्या आत्मनिर्णय को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर पूर्ण अधिकार के साथ पूर्ण राज्यत्व को शामिल करने के रूप में समझा जाना चाहिए, या क्या कुछ कम करने की आवश्यकता है।
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subham singhModern Day Philosopher
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Answered on07/16/20
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राष्ट्रवाद , विचारधारा इस आधार पर कि व्यक्ति की राष्ट्र-राज्य के प्रति निष्ठा और भक्ति अन्य व्यक्तिगत या सामूहिक हितों से परे है। राष्ट्रवाद त्वरित तथ्य मुख्य लोग एडॉल्फ हिटलर खालिद मशाल जायर बोल्सनारो बेनिटो मुसोलिनी ग्यूसेप गैरीबाल्डी कैमिलो बेन्सो, काउंट डि कैवूर यासर अराफात सन यात - सेन ग्यूसेप माज़िनी गैब्रियल ड्यूमॉन्ट संबंधित विषय विचारधारा राष्ट्र राज्य देश प्रेम अरब एकीकरण नागरिक धर्म Slavophile पान Arabism अंधराष्ट्रीयता काला राष्ट्रवाद अंधराष्ट्रीयता यह लेख 1980 के दशक में राष्ट्रवाद की उत्पत्ति और इतिहास पर चर्चा करता है। राष्ट्रवाद के इतिहास में बाद के विकासों के लिए, 20 वीं सदी के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को देखें; यूरोपीय संघ; और यूरोसकेप्टिज्म। शीर्ष प्रश्न राष्ट्रवाद क्या है? एक राष्ट्र और एक राज्य के बीच अंतर क्या है? राष्ट्रवादी आंदोलन क्या है? राष्ट्रवादी आंदोलन पहली बार कब उठे? कुछ समकालीन राष्ट्रवादी आंदोलन क्या हैं? राष्ट्रवाद का आधुनिक स्वरूप राष्ट्रवाद एक आधुनिक आंदोलन है। पूरे इतिहास में लोग अपनी मूल धरती से, अपने माता-पिता की परंपराओं से, और प्रादेशिक अधिकारियों से जुड़े हुए हैं, लेकिन यह 18 वीं शताब्दी के अंत तक नहीं था कि राष्ट्रवाद आम तौर पर मान्यता प्राप्त जन और निजी जीवन को ढालने वाला था। महान में से एक, यदि आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े, एकल निर्धारण कारक नहीं हैं। इसकी गतिशील जीवन शक्ति और इसके सर्वव्यापी चरित्र के कारण, राष्ट्रवाद को अक्सर बहुत पुराना माना जाता है; कभी-कभी इसे गलती से राजनीतिक व्यवहार का स्थायी कारक माना जाता है। दरअसल, अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियों को इसकी पहली शक्तिशाली अभिव्यक्ति माना जा सकता है। लैटिन अमेरिका के नए देशों को भेदने के बाद, यह 19 वीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में फैल गया और वहां से यह सदी के मध्य की ओर, पूर्वी और दक्षिणपूर्वी यूरोप तक फैल गया। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में, एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रवाद फूल गया। इस प्रकार, 19 वीं शताब्दी को यूरोप में राष्ट्रवाद का युग कहा जाता है, जबकि 20 वीं शताब्दी में पूरे एशिया और अफ्रीका में शक्तिशाली राष्ट्रीय आंदोलनों का उदय और संघर्ष देखा गया।
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K
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Answered on07/15/20
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राष्ट्रवाद एक विचार और आंदोलन है जो किसी विशेष राष्ट्र के हितों को बढ़ावा देता है विशेष रूप से अपनी मातृभूमि पर राष्ट्र की संप्रभुता हासिल करने और बनाए रखने के उद्देश्य से।
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abhi singhSociety & Culture Writer
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Answered on07/15/20
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राष्ट्रवाद वो होता है जो हमेशा देश का भलाई चाहता है और देश के विकास पर ध्यान देता है और राष्ट्रद्रोह वो होता है जिसमें देश को कमजोर करने का काम किया जाता है
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Answered on07/15/20
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जब कोई हर बात मे और दिल से देश के बारे मे सोचता है तो वो होता है राष्ट्रवाद और जो देश के विरोध मे होता है वो देश द्रोही
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Awni rai Author
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Answered on07/14/20
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1991 में भारत की अर्थव्यवस्था कंगाल हो गई थी तब प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जी से बुलाकर पूछा खजाने में कितने पैसे है,मनमोहन जी का उत्तर था सिर्फ 9 दिन देश चला सकते है इतना सा पैसा बचा है।

इस पर नरसिंहराव जी बोले इस स्थिति से कैसे निपटा जाए तो मनमोहन सिंह बोले देश के रुपये की कीमत 20% गिरानी पड़ेगी,नरसिंहराव जी बोले ठीक है केबिनेट की बैठक बुलाओ मनमोहन जी उठे और अपने कक्ष की ओर जाने लगे कुछ कदम दूर जाने के बाद वापिस पलट कर आए और नरसिंहराव जी से बोले कि अगर केबिनेट बैठक बुलाई तो हम ये कठोर निर्णय नही कर पाएंगे। सभी मंत्री वोट बैंक एड्रेस करेंगे।

नरसिंहराव जी ने मनमोहन जी से कहा कि ठीक है, अभी आप अपने कक्ष में जाइये ,20 मिनिट बाद मनमोहन जी को उनके कमरे में, सचिव एक चिट्ठी देकर गए ओर उस चिट्ठी में नरसिंहराव जी ने लिखा था DONE

बाद में जब पूछा गया कि 20 मिनिट में ऎसा क्या हो गया था जो आपने केबिनेट मीटिंग, मनमोहन सिंह सहित सबको आश्चर्य में डालकर हाँ कर दी, तब नरसिंहराव जी ने कहा था कि मेने अटल जी से बात कर ली थी और DONE कर दिया

*मतलब आप अटल जी पर भरोसा देखो अपनी केबिनेट से भी ज्यादा था, उन्हें पता था, अटल जो देश हित मे होगा वही बोलेंगे,* ऐसा होता है राष्ट्रवादी विपक्ष ओर उस कठोर निर्णय की घोषणा के बाद बीजेपी ने विरोध आंदोलन नही किया बल्कि देश की अर्थ व्यवस्था पटरी पर लाने के लिए तात्कालिक कोंग्रेस सरकार को साथ दिया ओर वहीं आज कोंग्रेस ने नोट बंदी, GST, CAA पर कैसा नंगा नाच किया सबने देखा है।

*यही कारण है कि मैं बीजेपी को राष्ट्रवादी दल कहता हूं, जो दल से पहले देश को रखता है। "विनाश काले विपरीत बुद्धि" जब बुद्धियुक्त मनुष्य के मन से दया, करुणा, प्रेम और सहानुभूति आदि गुण लुप्त हो जाते हैं और वह अपने को सुखी बनाने के लिये क्रूरता के साथ दूसरों को दु:ख पहुँचाने लगता है तब उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि वह दूसरों के दुःख में ही अपने को सुखी मानता है,दूसरों के विपत्ति के आँसू देखकर ही उसका चित्त प्रफुल्लित होता है,यहाँ तक कि वह अपनी हानि करके भी दूसरों को दु:खी करता है।जिस प्रकार कांग्रेस इस समय चीन के तथा भूतकाल में पाकिस्तान के पक्ष में खड़ी होती रही है उससे देश की इतनी बड़ी पार्टी तथा उसके कार्यकर्ताओं की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गयी है।*

एक मनुष्य ने भगवान् शिव की आराधना की, शिवजी प्रसन्न हुए, उसका पड़ोसी भी बड़े भक्ति भाव से शिवजी के लिये तप कर रहा था। शिवजी ने दोनों के भक्ति का विचार कर आकाशवाणी में उससे कहा कि 'मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, इच्छित वर माँग, पर तुझे जो मिलेगा उससे दूना तेरे पड़ोसी को मिलेगा, क्योंकि उसके तप का महत्त्व तेरे तप से दूना है।' यह सुनते ही वह बड़ा दुःखी हो गया। उसने सोचा 'क्या माँगूं ? पुत्र, धन और कीर्ति की बड़ी इच्छा थी; परंतु अब यह सब कैसे माँगू ? जो एक पुत्र माँगता हूँ तो उसके दो होते हैं, लाख रुपये माँगता हूँ। तो उस नालायक को दो लाख मिलते हैं, कीर्ति चाहता हूँ तो उसकी मुझसे दूनी होती है।' अन्त में उसने खूब सोच-विचारकर शिवजी से कहा, 'प्रभो ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी एक आँख फोड़ डालिये।' उसने सोचा, 'मेरा तो काम एक आँख से भी चल जायगा। वह तो दोनों फूटने से बिलकुल निकम्मा हो जायेगा। इससे अधिक सुख की बात मेरे लिये और क्या होगी ?'

मोदी विरोध करते करते कब हम राष्ट्र विरोध करने लगे हमको पता ही नही चला, इसका कारण यही है कि हम लोगों ने देहात्मबोध के कारण अपनी ममता की सीमा बहुत ही संकुचित कर ली है, छोटे गड़हे का पानी गंदला हुआ ही करता है। इसी प्रकार संकुचित ममता भी बड़ी गंदी हो जाती है तभी यह दशा है!

घर पर रहिए,दूरी बनाये रखिये,कोरोना से बचे रहिए,अभी लड़ाई बाकी है, अपनी जीत निश्चित है।

भारत माता की जय।




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Updated on07/15/20
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