Asked 6 years ago

"हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” का अर्थ क्या है?

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हाथ कंगन को आरसी क्या (hath kangan ko aarsi kya) और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या

यह लोकोक्ति दो वास्तव में लोकोक्तियाँ के मेल से बनी ही हैं. जिसको आपस मे जोड़कर बनाया गया है. आइयो आप लोगों को दोनों लोकोक्तियों को अलग-अलग समझाने का प्रयास करते है।

आरसी शब्द से हम क्या समझते है, इसका शाब्दिक अर्थ है- आईना यानि शीशा अर्थात यदि कोई स्त्री अपने हाथों में कंगन पहनती है तो उस महिला को आईने यानि शीशे की आवश्यकता नहीं है. प्रत्यक्ष रूप से हमें दिख रहा है. अर्थात “प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं पढ़ती

पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या –यहाँ पर फ़ारसी भाषा के दो पहलू हैं. पहला यह आरसी शब्द से मिलता जुलता है. दूसरा मुगलों के शासनकाल में फ़ारसी भाषा को को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया था. जो व्यक्ति पढ़ा लिखा भी होता था उसे भी यह फारसी भाषा सीखने ही पड़ती थी.

इस लोकोक्ति उत्पत्ति:

यह लोकोक्ति विशेष रूप से उत्तर भारत में प्रचलित है। इसकी उत्पत्ति के बारे में , लेकिन माना जाता है कि इसका प्रचलन मुगल शासन काल में शुरू हुआ था । मुगल काल में फारसी भाषा को राजभाषा के दर्जा प्राप्त होने की वजह से इसका विशेष महत्व था।

निष्कर्ष- हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या" एक आसान लोकोक्ति है। इस लोकोक्ति का प्रयोग अक्सर किसी भी ऐसे काम के लिए होता है जिसे प्रत्यक्ष रूप से हम देख सकते है या फिर जिसे करना किसी इंसान के लिए बहुत ही आसान होता है।

 

padhe likhe ko farsi kya

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Answered By Madan Singh

Helping students, parents, and institutions make smarter education decisions — one well-researched article at a time.
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Madan Singh is an education consultant and content writer with 8+ years of experience advising students, parents, and educational institutions on academic pathways, career planning, and learning strategies. He holds a Master's degree in Education Management from Delhi University, a background that grounds his writing in structured pedagogical thinking rather than generic career advice. His work spans college admissions guidance, career counselling, study abroad pathways, and competitive exam preparation, with a focus on both Indian and international education systems. He writes for CollegeDekho, Shiksha.com, and Collegedunia, where his articles are aimed at students and families making academic decisions. Over the course of his consulting practice, Madan has advised 150+ students on admissions, scholarship applications, and career planning. He has published 80+ articles across education platforms during this time, covering topics from exam strategy to international study options. Madan's approach is practice-first: his writing reflects the questions he actually gets from students and parents, not templated advice. He does not claim to cover every education topic — his focus stays on admissions, career planning, and study-abroad guidance, where his consulting experience directly applies.

Updated on06/03/26
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एक 'आरसी' एक आभूषण है जो महिलाओं द्वारा अपने अंगूठे पर पहना जाता है जिसमें एक छोटा उत्तल दर्पण होता है जिसका उपयोग वे अपने चेहरे को देखने के लिए कर सकती हैं कि क्या उनके बाल / मेकअप ठीक लग रहे हैं।

अब जाहिर सी बात है कि आपको अपनी बांह पर कंगना दिखने के लिए अर्शी की जरूरत क्यों पड़ेगी?

इस कहावत का मूल रूप से मतलब है कि जिनके पास वास्तविक कौशल या उपलब्धि है, उन्हें अपने व्यवसाय के बारे में जाने के लिए सतही प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है।

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यह भी पढ़ें : कंगन किस हाथ में पहना जाता है?
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Answered By amit singh

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Updated on06/03/26
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हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या” एक प्रसिद्ध हिंदी कहावत (proverb) है, जिसका उपयोग यह समझाने के लिए किया जाता है कि जब कोई बात या चीज़ साफ और स्पष्ट हो, तो उसे साबित करने के लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण या जटिल ज्ञान की जरूरत नहीं होती।

इस कहावत का सीधा अर्थ है कि अगर किसी व्यक्ति के हाथ में कंगन है, तो उसे यह बताने की जरूरत नहीं कि वह कंगन पहने हुए है—क्योंकि वह साफ दिखाई दे रहा है। उसी तरह, यदि कोई व्यक्ति पढ़ा-लिखा और योग्य है, तो उसे यह साबित करने के लिए फ़ारसी जैसी कठिन भाषा या अतिरिक्त ज्ञान दिखाने की जरूरत नहीं होती।

इस कहावत में दो हिस्से हैं:

  • “हाथ कंगन को आरसी क्या” → अगर कंगन हाथ में है, तो शीशे (आरसी) की जरूरत नहीं कि उसे दिखाया जाए।
  • “पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या” → अगर कोई व्यक्ति शिक्षित है, तो उसे अपनी शिक्षा साबित करने के लिए किसी विशेष या कठिन भाषा (जैसे फ़ारसी) की जरूरत नहीं।

यह कहावत मुख्य रूप से स्पष्टता (clarity) और स्वाभाविक प्रमाण (obvious evidence) को दर्शाती है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब किसी तथ्य को साबित करने के लिए बहुत अधिक तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह पहले से ही स्पष्ट होता है।

उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति बहुत अच्छा काम कर रहा है और उसकी योग्यता सभी को दिख रही है, तो उसके कौशल को साबित करने के लिए बार-बार डिग्री या प्रमाण पत्र दिखाने की जरूरत नहीं है। उसका काम ही उसकी पहचान बन जाता है।

इस कहावत का एक और संदेश यह भी है कि कभी-कभी लोग अनावश्यक जटिलता या दिखावे में उलझ जाते हैं, जबकि सच्चाई सरल और स्पष्ट होती है। इसलिए यह कहावत हमें सिखाती है कि सच्चे गुण और सच्चाई को ज्यादा प्रमाण की जरूरत नहीं होती।

निष्कर्ष:

“हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या” का अर्थ है कि जो चीज़ या सत्य स्पष्ट और दिखाई देने योग्य हो, उसे साबित करने के लिए अतिरिक्त प्रमाण या जटिलता की आवश्यकता नहीं होती। यह कहावत सरलता, स्पष्टता और वास्तविकता की शक्ति को दर्शाती है।

यहां एक और दिलचस्प विषय है जिसका आप आनंद ले सकते हैं: विश्व का सबसे बड़ा देश कौनसा है
Tara Verma

Answered By Tara Verma

Ten years in the classroom, shaping minds — bringing the same clarity and purpose to every piece she writes about education.
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Tara Verma is a practising teacher and education content writer with over 10 years of classroom experience across primary and secondary levels. She holds a Master's degree in Education (M.Ed.) from Delhi University and a Bachelor of Education (B.Ed.) from Jamia Millia Islamia — qualifications that ground her writing in both pedagogical theory and the day-to-day realities of teaching in India. Her content covers exam preparation strategies, learning methodologies, curriculum guidance, student mental health, career counselling for students, and the evolving state of school and higher education in India. Her work has appeared on platforms including TeacherVision India, Jagran Josh, and Careers360, where she writes for students, parents, and fellow educators who need content built on actual teaching experience — not theory alone. Over a decade of working directly with students across age groups and learning levels has given Tara a practical understanding of how education content should be written — clearly, accessibly, and with genuine awareness of the challenges students and teachers face on the ground. She has taught 1,000+ students, contributed to school curriculum development initiatives, and published 250+ articles on education across digital platforms. She is an active member of the National Council of Teachers of English (NCTE) India. Across all her writing, every recommendation is classroom-tested, every insight comes from direct teaching experience, and every article is held to the same standard she applies in her own classroom — accuracy, clarity, and genuine usefulness for the reader.

Answered on05/15/26
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हाथ कंगन को आरसी क्या - अर्थात हाथ में कंगन पहने हैं, तो उसके लिए आईने की क्या जरूरत है, अर्थात प्रत्यक्ष रूप से देखने के बाद किसी भी प्रमाण की जरूरत नहीं होती है।

पढ़े लिखे को फारसी क्या - अर्थात फारसी लैंग्वेज बहुत टफ होने के कारण हर व्यक्ति इसे नहीं पढ़ पाता है!

किसकी उत्पत्ति इस प्रकार से हुई :

इस शब्द में आरसी का मतलब शीशा या दर्पण होता है।

1. यह कहावत उस समय की है, जबहमारे देश मे आइने बहुत महंगे होते थे इसलिए बहुत कम लोगों के पास पाए जाते थे!

एक शीशे को उस ज़माने के अनुसार मुहावरे मे आरसी कहा जाता था। उस जमाने में हाथ में पहने गए कंगन में आरसी से भी छोटे छोटे शीशे जड़े जाते थे, जो बहुत कीमती होते थे।

" जो व्यक्ति अपने हाथ में शीशे से जड़े कंगन पहन सकता है , तो उनके लिए आरसी लेना कौन सी बड़ी बात है ?"

मतलब जो व्यक्ति अपने हाथ में शीश से जड़े कंगन पहन सकता है , उनको अपनी कामयाबी दिखाने के लिए आरसी की जरुरत नहीं पढ़ती है। इसलिए कहा जाता था - "हाथ कंगन को आरसी क्या"।

Letsdiskuss

2. औरते ज़ब अपना शृंगार करती है तो उसके लिए उनको दर्पण की आवश्यकता होती है।

जैसे: अपने चेहरे को सजाने के लिए किसी दर्पण की जरूरत होती है ताकि उस दर्पण को देखकर चेहरे का सही शृंगार कर सके।

किसी को भी कंगना पहनने के लिए दर्पण की जरूरत नहीं होती है, या ऐसा कह सकते हैं कि हाथ में कंगन को पहनने के लिए किसी भी आइने की क्या जरूरत नहीं होती है?

preeti  patel

Answered By preeti patel

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Updated on03/10/26
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यह एक अत्यंत लोकप्रिय और अर्थपूर्ण हिंदी लोकोक्ति है, जिसका उपयोग प्रत्यक्ष प्रमाण की महत्ता को दर्शाने के लिए किया जाता है। "हाथ कंगन को आरसी क्या" का सरल अर्थ है कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

लोकोक्ति का विस्तृत विश्लेषण:

इस कहावत के दो मुख्य भाग हैं, जो गहरे तार्किक अर्थ समेटे हुए हैं:

  • हाथ कंगन को आरसी क्या: 'आरसी' का अर्थ होता है आईना या दर्पण। पुराने समय में महिलाएं हाथ के अंगूठे में एक अंगूठी पहनती थीं जिसमें छोटा सा शीशा लगा होता था। कहावत का आशय यह है कि यदि आपने हाथ में कंगन पहन रखा है, तो उसे देखने के लिए आपको किसी अलग दर्पण की जरूरत नहीं है; वह तो साक्षात आपके सामने ही है।
  • पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या: मध्यकालीन भारत में फ़ारसी (Persian) राजकाज की भाषा थी और इसे सीखना कठिन माना जाता था। विद्वान व्यक्ति के लिए फ़ारसी पढ़ना कोई बड़ी चुनौती नहीं थी। अतः, जो व्यक्ति पहले से ही ज्ञानी है, उसकी योग्यता को साबित करने के लिए किसी बाहरी गवाही की आवश्यकता नहीं होती।

व्यावहारिक उपयोग: जब कोई सत्य बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा हो और फिर भी कोई उसके लिए सबूत मांगे, तब इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है। यह हमें सिखाता है कि जो चीज अनुभव या आँखों के सामने स्पष्ट है, उस पर संदेह करना व्यर्थ है।

Ramesh Kumar

Answered By Ramesh Kumar

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Answered on03/10/26
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भाषा विचारों और भावों को अभिव्यक्त करने का साधन है। हम अपनी बात को कभी सीधे - सादे ढंग से कहना चाहते हैं और कभी प्रभावशाली ढंग से। मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग उसे प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है।

मुहावरा अर्थात अभ्यासः

अभ्यासवश एक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक विशेष अर्थ देने लगती है। ऐसा वाक्यांश जो अपने साधारण अर्थ को छोड़ कर किसी विशेष अर्थ को व्यक्त करें, मुहावरा कहलाता है। इसे वाग्धारा भी कहते हैं।

लोकोक्तियां या कहावतें लोक - अनुभव का परिणाम होती हैं। किसी समाज ने लंबे अनुभव से जो कुछ सीखा है उसे एक वाक्य में बांध दिया, कुछ कवियों ने, कुछ प्रबुद्ध लोगों ने। उसकी सच्चाई सभी स्वीकार करते हैं। कविताबद्द लोकोक्तियों को सूक्ति भी कहते हैं।

मुहावरे के शब्द अपने कोषगत अर्थों को छोड़कर कुछ भिन्न अर्थ देते हैं, जबकि लोकोक्ति अपने मूल अर्थ से जुड़ी रहती है। इसके अतिरिक्त मुहावरा पूर्ण वाक्य न होकर वाक्यांश होता है परंतु लोकोक्ति पूर्णतया वाक्य में बंधी होती है। अतः वाक्य के भीतर आते हैं मुहावरा तो वाक्य का अंग बन जाता है परंतु लोकोक्ति एक उपवाक्य के रूप में ही रहती है।

वाक्य - प्रयोग के समय मुहावरे में आए शब्दों के रूप लिंग, वचन, पुरुष, काल आदि के कारण बदलते रहते हैं, लोकोक्ति ज्यों की त्यों रहती हैं

लोकोक्ति के जो शब्द रहते हैं उसका अर्थ बहुत गुढ़ (गहरा) होता है। अपनी अपनी समझ के अनुसार उस शब्द का अर्थ समझते हैं।

हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या।

दो अलग-अलग वाक्यों को यहां पर जोड़ा गया हैः-

हाथ कंगन को आरसी क्या - अर्थात हाथ में कंगन पहने हैं, तो उसके लिए आईने की क्या आवश्यकता है, अर्थात प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है।

पढ़े लिखे को फारसी क्या - अर्थात फारसी भाषा बहुत कठिन होने के कारण हर व्यक्ति इसे नहीं पढ़ सकता। अर्थात ज्ञानी व्यक्ति के लिए कोई भी कार्य कठिन नहीं है।

उदाहरणः इस दवाई को पाँच दिन खाकर देख लीजिए कितना लाभ पहुंचाती है।

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Answered By asha hiremath

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Answered on09/05/21
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मैं दोस्तों द्वारा दिए गए हिंदी मुहावरे की उलटी व्याख्या से हैरान हूं।

वैसे मुहावरे का वास्तविक अर्थ है-

सबूत के लिए सबूत की जरूरत नहीं होती।

दूसरे शब्दों में,

जब कोई बात पूरी तरह से स्पष्ट होती है, तो आप बिना सबूत मांगे उस पर विश्वास कर लेते हैं।

हिंदी में समझाने के लिए...

प्रत्यक्ष (सबूत) को प्रमाण (सबूत) की जरुरत (आवश्यकता) न्ही (नहीं) = (प्रत्यक्ष को प्रमाणिक की पहचान नहीं)।

नोट - हिंदी में अनगिनत मुहावरे हैं जो अपने-अपने दार्शनिक अर्थ को व्यक्त करते हैं लेकिन उनके दिए गए संदर्भ में समझना बहुत मुश्किल है। इसलिए, किताबों, इंटरनेट या हिंदी मुहावरों को समझने वाले लोगों से उनके छिपे हुए ज्ञान को जानें।

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S

Answered By shweta rajput

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Answered on09/03/21
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