भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप पुरुष और प्रकृति (स्त्री) के अविभाज्य मिलन का प्रतीक है। इसके पीछे की सबसे प्रचलित कहानी सृष्टि के विस्तार से जुड़ी है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरू की, तो वह केवल मानसिक थी और प्रजा का विस्तार नहीं हो पा रहा था। तब ब्रह्मा जी ने कठिन तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव आधे पुरुष और आधी स्त्री (शक्ति) के रूप में प्रकट हुए।
शिव के इस रूप ने ब्रह्मा जी को बताया कि सृष्टि के निरंतर विकास के लिए पुरुष और स्त्री दोनों का समान अस्तित्व अनिवार्य है। शिव के बाएं अंग से 'शक्ति' अलग हुईं, जिन्होंने आगे चलकर नारी जाति और प्रजनन के माध्यम से सृष्टि को गति प्रदान की। यह स्वरूप सिखाता है कि शिव के बिना शक्ति और शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं।

