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Othersगुरु नानक देव जी किस भगवान की भक्ति करते...
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| Updated on March 7, 2026 | others

गुरु नानक देव जी किस भगवान की भक्ति करते थे ?

2 Answers
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@abhishekgaur6728 | Posted on March 7, 2026

गुरु नानक देव जी किसी एक विशेष भगवान की भक्ति नहीं करते थे। वे एकेश्वरवादी थे और उनका मानना ​​था कि केवल एक ही ईश्वर है, जिसे वे "वाहेगुरु" या "एक ओंकार" कहते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में लिखा है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है। वे निर्गुण और निराकार हैं, और उनका कोई रूप या रंग नहीं हैे।

गुरु नानक देव जी ने मूर्तिपूजा और कर्मकांडों का विरोध किया। उनका मानना ​​था कि ईश्वर को भक्ति और प्रेम से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने लोगों को सिखाया कि ईश्वर की भक्ति करने के लिए, हमें सदाचारी जीवन जीना चाहिए, दूसरों की सेवा करनी चाहिए, और लोभ, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, और अहंकार जैसे नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।

गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना की, जो आज दुनिया के प्रमुख धर्मों में से एक है। सिख धर्म का आधार गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं पर है, जो सत्य, प्रेम, और न्याय पर आधारित हैं।

गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के कुछ प्रमुख बिंदु:

  • ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है।
  • ईश्वर निर्गुण और निराकार हैं, और उनका कोई रूप या रंग नहीं है।
  • ईश्वर को भक्ति और प्रेम से प्राप्त किया जा सकता है।
  • हमें सदाचारी जीवन जीना चाहिए, दूसरों की सेवा करनी चाहिए, और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।
  • सभी मनुष्य समान हैं, और जाति, धर्म, लिंग, या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

गुरु नानक देव जी का जीवन और शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि कैसे एक अच्छा जीवन जीना है और कैसे ईश्वर को प्राप्त करना है। 

गुरु नानक देव जी किस भगवान की भक्ति करते थे

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@rameshkumar7346 | Posted on March 7, 2026

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी किसी विशेष मूर्ति या साकार देवता की पूजा नहीं करते थे, बल्कि वे 'एक ओंकार' (ईश्वर एक है) के सिद्धांत में विश्वास रखते थे।

उनकी भक्ति का स्वरूप:

  • निराकार ईश्वर: वे 'अकाल पुरख' की भक्ति करते थे, जो अजन्मा, निराकार (बिना किसी आकार के) और सर्वव्यापी है।
  • नाम सिमरन: उनके अनुसार ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग 'नाम सिमरन' (परमात्मा का ध्यान) और कीर्तन है।
  • मानवता की सेवा: वे मानते थे कि ईश्वर की सच्ची भक्ति दीन-दुखियों की सेवा और ईमानदारी की कमाई (किरत करो) में निहित है।

गुरु नानक देव जी ने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की कुरीतियों को त्यागकर प्रेम, समानता और एक ही परमेश्वर की भक्ति का संदेश दिया।

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