डर अथवा भय का महत्वः
डर का महत्व विभिन्न संवेगों में डर एक महत्वपूर्ण संवेग है। अपने स्वाभाविक रूप में यह एक लाभप्रद संवेग है। यह हमें खतरों से बचने के लिए तैयार करता है। परंतु मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से डर सबसे अधिक विनाशकारी संवेग है। इससे शरीर के अंग ऐंठ जाते हैं और रुधिर का प्रवाह रुक जाता है। इस प्रकार मनुष्य की जीवनी शक्ति कम हो जाती है। अमेरिका के प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध डॉक्टर लिन्हडर का कथन है कि -- जो व्यक्ति भय की अनुभूति बार-बार करता है उसकी पाचन शक्ति भी नष्ट हो जाती है। गले में कुछ गिल्टियाँ होती है,
जिनसे एक प्रकार का रस स्त्रवित होता है जो शरीर की वृद्धि करता है और उसे पुष्ट बनाता है। जब इस रस की कमी होने लगती है, तो शरीर में इतनी क्षमता नहीं रहती कि वह बाहरी बीमारियों के कीटाणुओं का सामना कर सके। भय की अवस्था में ये गिल्टियाँ रस का उत्पादन बंद कर देती है।

डर अथवा भय का विकासः
जन्म के समय यह संवेग अपनी सुप्त अवस्था में होता है। एक छोटा सा शिशु किसी बात से भयभीत नहीं होता। विषैले सांप तथा बिच्छू भी उसमें किसी प्रकार के भय का संचार नहीं करते, इसके विपरीत वह उन्हें पकड़कर खेलना चाहता है। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है उसमें भय की मात्रा बढ़ती जाती है। बड़े व्यक्ति छोटे बालकों की अपेक्षा अधिक भयभीत होते हैं।