Paris Agreement एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन को रोकना और कार्बन उत्सर्जन को कम करना है। इस समझौते में लगभग सभी देशों ने हिस्सा लिया था, लेकिन United States ने दो बार इसमें से अलग होने या हटने का फैसला लिया, जो काफी चर्चा में रहा।
सबसे पहले 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति Donald Trump ने घोषणा की कि अमेरिका पेरिस समझौते से बाहर होगा। उनका तर्क था कि यह समझौता अमेरिका की अर्थव्यवस्था और उद्योगों पर नकारात्मक असर डालता है। उनका मानना था कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए लगाए गए नियमों से कोयला, तेल और गैस जैसे उद्योगों पर भारी दबाव पड़ेगा, जिससे नौकरियों में कमी आ सकती है।
इसके अलावा ट्रंप प्रशासन का यह भी कहना था कि चीन और भारत जैसे बड़े विकासशील देशों पर उतना सख्त दबाव नहीं है जितना अमेरिका पर है, इसलिए यह समझौता अमेरिका के लिए “असंतुलित” है।
हालांकि 2021 में नए राष्ट्रपति Joe Biden ने अमेरिका को फिर से इस समझौते में शामिल कर लिया, क्योंकि उनका मानना था कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर वैश्विक संकट है और इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।
इसके बावजूद, 2025 के आसपास फिर से राजनीतिक बहस तेज हुई और कुछ नीतिगत बदलावों के कारण अमेरिका की भागीदारी को लेकर सवाल उठते रहे। यह दिखाता है कि पेरिस समझौता सिर्फ पर्यावरण नहीं बल्कि राजनीति और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
अगर आसान भाषा में समझें तो अमेरिका के पेरिस समझौते से हटने की मुख्य वजहें थीं—आर्थिक दबाव, उद्योगों की चिंता, नौकरियों पर असर और अंतरराष्ट्रीय नियमों में असमानता की धारणा।
आज भी यह विषय दुनिया भर में ट्रेंडिंग रहता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन एक बड़ी समस्या है और हर देश अपनी आर्थिक स्थिति और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।