Ramesh Kumar
Ramesh Kumar· 4 years ago
Covering important news, trending stories, and global events with balanced insights and reliable information.

आपको क्या लगता है कि मोदी सरकार ने कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा क्यों की है?

0
385

Join this conversation

Sort By

पिछले चौदह महीने से चल रहे किसान-आंदोलन के आगे नतमस्तक होते हुये केंद्र सरकार ने तीनों विवादित कृषि-कानूनों को वापस लेने का फैसला किया है। शुक्रवार, 19 नवंबर को राष्ट्र के नाम अपने 18 मिनट के संबोधन में पीएम मोदी जी ने यह ऐलान करते हुये कहा कि ये कानून सरकार किसानों के हित में नेकनीयती से लाई, पर हम कुछ किसानों को समझा पाने में नाकाम रहे।

Article image

गौरतलब है कि ये तीनों कृषि-कानून 17 सितंबर, 2020 को लोकसभा से पारित हुये, और आगामी 27 सितंबर को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अस्तित्व में आ गये। पर उसके बाद से ही तमाम कृषि-संगठन इन कानूनों के विरोध में आंदोलित हो उठे। एक साल से अधिक चले इस विरोध-प्रदर्शन में तरह-तरह के रंग दिखे। किसानों और सुरक्षा बलों में अनगिनत झड़पें इस दौरान हुईं। सरकार और किसान-संगठनों के बीच वार्ता के कई दौर आयोजित हुये, जो असफल रहे। जबकि एक-दूसरे पक्ष पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चलता रहा। इस बीच कुछेक अराजक तत्वों के चलते इस किसान-आंदोलन को कमजोर भी करने का प्रयत्न हुआ। आंदोलनरत किसानों की तुलना आतंकवादियों से भी की गई। ख़बर है कि इस आंदोलन के दौरान सैकड़ों किसानों की जान चली गई। लेकिन अब, जब केंद्र सरकार ने अप्रत्याशित रूप से कृषि-कानूनों के मुद्दे पर 'यू-टर्न' ले लिया है, और उनकी वापसी पर राजी हो गई है, तो इसे लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

तीनों कृषि-कानून वापस लेने के सरकार के इस फैसले की 'टाइमिंग' को लेकर इसे पूरी तरह से एक 'राजनीति से प्रभावित फ़ैसला' माना जा रहा है। क्योंकि इस समय यूपी और पंजाब जैसे दो महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव आसन्न हैं। भूलना न होगा कि कृषि-कानूनों पर अंतर्विरोधों के चलते ही केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा से उसकी पुरानी सहयोगी पार्टी 'अकाली-दल' को अलग होना पड़ा था। हालांकि यह ज़वाब अभी वक़्त के गर्भ में है, कि क्या बदलते परिदृश्य में अब भाजपा और अकाली दल फिर एक बार साथ आयेंगे!

इसी तरह इधर उत्तर-प्रदेश में भी, खासकर पश्चिमी यूपी में इन विवादित कृषि-कानूनों की वज़ह से सरकार की छवि काफ़ी बिगड़ रही थी। उल्लेखनीय है कि पश्चिमी यूपी की चुनावी कमान हाल ही गृहमंत्री अमित शाह के हाथों सौंपी गई है।

इसके अतिरिक्त, किसान-संगठनों द्वारा आगामी 26 नवंबर को आंदोलन के एक साल पूरे होने के साथ ही इसे और तेज करने की योजना चर्चा में थी। इसके अलावा, विगत कुछ समय से महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल आदि सूबों में फ़जीहत होने, और विभिन्न उपचुनावों में खराब प्रदर्शन से भी केंद्र में सत्तारूढ़ दल ने यकीनन सबक लिया होगा। सो, इन सब बातों के मद्देनज़र सरकार द्वारा ऐसे ही कोई महत्वपूर्ण फ़ैसला लिया जाना स्वाभाविक ही था।

Article image

यही कारण है कि सरकार द्वारा कृषि-कानूनों को वापस लिया जाना पूरी तरह एक सियासी कदम माना जा रहा है। हालांकि सरकार का कहना है कि कृषि-कानूनों के फ़ायदे लोगों को न समझा पाने के चलते उनकी वापसी का यह कदम उठाया गया है। जिसकी घोषणा के लिये सिखों के प्रथम-पूज्य गुरुनानक देव के प्रकाशपर्व जैसे महत्वपूर्ण दिन का चुनाव भी एक संदेश देता है। पर असल सवाल तो यह है कि यदि कृषि-कानूनों पर सरकार का पीछे हटना एक शुद्ध राजनैतिक कदम है, फिर तो देश में राजनीति जनहित को पूरी तरह से दरकिनार कर चुकी है..

Answered by
Avinash Kumar
Powered by Curiosity & Caffeine
View Profile

Ice in my veins. 🧊

Answered on11/20/21
0