
गणेश चतुर्थी का त्यौहार मनाने के पीछे कई परंपराएं हैं वैसे भारतीय संस्कृति और धर्म में गणेश जी को बहुत महत्व दिया गया है उन्हें शुभारंभ के देवता कहा जाता है .
गणेश चतुर्थी का त्योहार क्यों मनाया जाता है, इसके बारे में आपको बता दें कि गणेश चतुर्थी का त्योहार भारत में धार्मिक उल्लास के साथ तो मनाया ही जाता है, इसके साथ ही इसे मनाने की परंपरा भी कहीं न कहीं देश की स्वतंत्रता से जुड़ी थी। पहले हम आपको जानकारी दे दें कि भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में भाद्रपद (भादों) महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। दरअसल, 10 दिनों तक चलने वाला यह त्योहार श्री गणेश के विसर्जन यानी चतुर्दशी (चौदहवें दिन) को समाप्त होता है।
गणेश जी के जन्म की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए, जिससे गणेश जी का जन्म हुआ। एक कथा यह भी है कि माता पार्वती ने उन्हें अपने द्वार की रक्षा करने का दायित्व सौंपा था, लेकिन जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो बाल गणेश उन्हें पहचान नहीं पाए। इस पर क्रोधित होकर भगवान शिव ने उनके मस्तक को धड़ से अलग कर दिया, जिससे माता पार्वती अत्यंत दुखी हो गईं। इसके बाद भगवान शिव ने एक गज (हाथी) के बच्चे का सिर उस बालक के धड़ से जोड़ दिया और उनका नाम गणपति/गजानन पड़ा।
स्वतंत्रता संग्राम और गणेश उत्सव की शुरुआत
भारत की आजादी में सामाजिक चेतना के रूप में भी यह त्योहार मनाना शुरू हुआ। दरअसल, छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से भी यह त्योहार मनाया जाता रहा है। बाद में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में इसे सार्वजनिक रूप से एक बड़े उत्सव के रूप में मनाना शुरू किया। दरअसल, अंग्रेजों के अत्याचार से भारतीय परेशान थे और वे एकजुट होकर राष्ट्रीय चेतना तथा अपनी धार्मिक जागरूकता दिखाना चाहते थे। इस तरह गणेश उत्सव त्योहार की शुरुआत पूरे मुंबई और महाराष्ट्र में हुई, और आज यह त्योहार पूरे भारत में मनाया जाता है। इसी तरीके से दुर्गा पूजा का त्योहार भी मनाया जाता है।
प्रथम पूज्य और 'विघ्नहर्ता' भगवान गणेश
सभी देवों ने मिलकर भगवान गणेश को यह वरदान दिया कि किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले उनकी पूजा होगी। दरअसल, भगवान गणेश बुद्धि, सिद्धि, रिद्धि और विवेक के देवता कहे जाते हैं। अपने भक्तों के जीवन की सभी बाधाओं को हरने वाले गणेश जी की पूजा प्रथम पूज्य के रूप में होती है; इन्हें 'विघ्नहर्ता' यानी बाधाओं को हरने वाला कहा जाता है। नया घर खरीदने या व्यापार शुरू करने जैसे कार्यों में पहले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में गणेश जी की ही पूजा होती है।
महर्षि वेदव्यास, महाभारत और विसर्जन की परंपरा
महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी। वेदव्यास जैसे-जैसे बोलते गए, गणेश जी उसे लिखते गए; इस तरीके से महाभारत की रचना हुई। 1 लाख से अधिक श्लोक बिना रुके लगातार वेदव्यास बोलते रहे और गणेश जी लिखते रहे। आपको बता दें कि गणेश चतुर्थी के दिन ही श्री गणेश ने महाभारत को लिखना शुरू किया था। निरंतर 10 दिनों तक लिखने के कारण उनके शरीर का तापमान बढ़ गया था, जिसे शांत करने के लिए महर्षि वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप लगाया और दसवें दिन (अनंत चतुर्दशी) उन्हें शीतल जल से स्नान कराया। इसी परंपरा के आधार पर 10 दिनों तक श्री गणेश उत्सव मनाया जाता है और अंतिम दिन मूर्ति का विसर्जन किया जाता है।
हमारी संस्कृति में गणेश पूजन का स्थान
गणेश जी का पूजन हमारी संस्कृति और धर्म का बहुत बड़ा आधार है। दरअसल, श्री गणेश विघ्न हरने वाले देवता हैं और किसी भी कार्य की शुरुआत करने पर भगवान श्री गणेश का नाम लिया जाता है, इसीलिए श्री गणेश उत्सव बहुत ही धूमधाम से पूरे भारत में मनाया जाता है।
गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक त्योहार ही नहीं, बल्कि भगवान श्री गणेश को बाधाओं को दूर करने वाले, बुद्धि देने वाले और सामाजिक सौहार्द तथा एकता के महापर्व के रूप में मनाया जाता है।




