Ramesh Kumar
Ramesh Kumar· 6 years ago
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सावित्रीबाई फुले को क्यों याद किया जाता है और महिलाओ के लिए उन्होंने क्या किया ?

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Updated on10/18/26

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सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षक कहा जाता है। उन्होंने 19वीं सदी के समाज में महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया, उसी की बदौलत आज भारत में महिलाओं के लिए शिक्षा और प्रगति के द्वार खुले हैं।

सावित्रीबाई फुले के जीवन और महिलाओं के लिए उन्होंने जो योगदान दिया उसके बारे में हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं।

1. भारत में बालिकाओं के लिए पहला स्कूल खोला था

जब महिलाओं का पढ़ना-लिखना अपराध माना जाता था, तब सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला था।

कठिन संघर्ष: जब वह पढ़ाने स्कूल जाती थीं, तो विरोधी उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर फेंकते थे। सावित्रीबाई अपने थैले में एक दूसरी साड़ी लेकर जाती थीं और स्कूल पहुँचकर गंदी साड़ी बदलकर बच्चों को पढ़ाती थीं। उन्होंने महिलाओं और बालिकाओं को पढ़ना नहीं छोड़ा। उन्होंने महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए कुल 18 स्कूल खोले।

2. बाल विवाह का विरोध और विधवा पुनर्विवाह (रीमैरिज) का समर्थन किया

  • 19वीं शताब्दी के दौर में बाल विवाह जैसी कुप्रथा फैली हुई थी। बालिकाओं और बालकों की शादी कम उम्र में कर दिया जाता था।

  • इसलिए समाज में विधवा महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति बहुत दयनीय थी। उनके साथ अत्याचार किया जाता था।

  • सावित्रीबाई फुले ने बाल विवाह का डटकर विरोध किया।

विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह का समर्थन भी किया इसलिए उन्हें महिलाएं याद करती है। क्योंकि महिलाओं को उन्होंने सम्मान जीवन जीने का अधिकार दिलाया इसलिए आज की महिलाएं और आज का समाज उन्हें उनके अच्छे कामों के लिए याद करता है।

3. 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' की स्थापना किया

जिन विधवा महिलाओं के साथ अत्याचार होता था। समाज के डर से इन महिलाओं की कोई भी मदद नहीं करता था। सावित्रीबाई ने 1863 में अपने घर में ही 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' खोला। इन महिलाओं को सम्मान दिया और उनके बच्चों के लालन पालन पर ध्यान दिया जाता था। समाज से बेसहारा महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा दी जाती थी।

4. सामाजिक समानता और 'सत्यशोधक समाज'

सावित्रीबाई ने महिलाओं को किताबी ज्ञान ही नहीं दिया बल्कि उनके जीवन को सुधारने के लिए कई कार्य किए । 1873 में समाज सुधारक ज्योतिबा फुले द्वारा सत्य समाज की स्थापना की गई है। आपको बता दे कि ज्योतिबा फुले उनके पति थे। उन्होंने सावित्रीबाई फुले को पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

  • उन्होंने बिना पुरोहित और बिना दहेज के विवाह कराने की परंपरा शुरू की, जिसे 'सत्यशोधक विवाह' कहा गया।

5. मानवता और निस्वार्थ सेवा का कार्य किया

1897 में जब पुणे में 'प्लेग' की महामारी फैली गई थी तो सावित्रीबाई ने अपने बेटे के साथ मिलकर अस्पताल खोला और मरीज का इलाज करवाया। वह खुद बीमार मरीजों को अपनी पीठ पर उठाकर अस्पताल लाती थीं। मरीजों की सेवा करते-करते वह स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।

बात का सारांश

सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि वह लाखों महिलाओं की प्रेरणा का स्रोत थीं। आज भारत की महिलाएँ जिस भी क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, उसकी नींव सावित्रीबाई फुले के त्याग और संघर्ष पर ही रखी गई है।

Abhishek kant
knowledge education is most important for our life.
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Abhishek Kant Educator | Journalist | Writer About Me / परिचय Master of Journalism & Mass Communication (MJMC) degree holder with extensive experience in journalism, teaching, and content writing. Passionate about sharing knowledge, telling impactful stories, and inspiring others through meaningful content. मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री के साथ पत्रकारिता, अध्यापन और कंटेंट राइटिंग का समृद्ध अनुभव। अपने लेखन और शिक्षण के माध्यम से लोगों तक सही जानकारी और विचार साझा करना ही मेरी प्रेरणा है।

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Updated on05/30/26

सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका, समाज सुधारक और नारी शिक्षा की अग्रदूत के रूप में याद किया जाता है। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था। उन्होंने उस समय समाज में फैली कुरीतियों, जातिवाद और महिलाओं की अशिक्षा के खिलाफ बड़ा संघर्ष किया। उनके कार्यों ने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

सावित्रीबाई फुले का सबसे बड़ा योगदान महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में था। जब उस समय लड़कियों को पढ़ाना समाज में गलत माना जाता था, तब उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। यह भारत में महिला शिक्षा की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। स्वयं सावित्रीबाई फुले ने पढ़ना-लिखना सीखा और भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।

स्कूल जाते समय उन्हें समाज से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लोग उन पर कीचड़, पत्थर और अपशब्द तक फेंकते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे हमेशा एक अतिरिक्त साड़ी साथ लेकर चलती थीं ताकि स्कूल पहुंचकर साफ कपड़े पहनकर बच्चों को पढ़ा सकें। उनका यह साहस आज भी प्रेरणा देता है।

महिलाओं के अधिकारों के लिए सावित्रीबाई फुले ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने विधवा महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए एक आश्रम भी स्थापित किया, जहां उन्हें आश्रय और सम्मानपूर्ण जीवन मिल सके।

इसके अलावा, 1897 में पुणे में फैली प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने निस्वार्थ भाव से मरीजों की सेवा की और स्वयं भी इस बीमारी की शिकार होकर 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उनका जीवन समाज सेवा और त्याग का प्रतीक है।

सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और समान अधिकार दिलाने की दिशा में जो काम किया, वह भारतीय इतिहास में अमूल्य है। उन्होंने यह साबित किया कि शिक्षा ही समाज में बदलाव का सबसे बड़ा साधन है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सावित्रीबाई फुले को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने महिलाओं को शिक्षा दिलाने, सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने और समानता की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन आज भी हर व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है।

 
 
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Reporting what matters — with 12 years of ground-level journalism behind every story.
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Pari Deshmukh is a journalist with over 12 years of experience covering current affairs across print and digital media in India. She holds a Master's degree in Journalism and Mass Communication from Pune University, bringing both academic grounding and extensive field experience to her reporting. Over her career, Pari has reported on national politics, policy developments, social issues, and breaking news events across India. Her work has appeared on platforms including The Print, Scroll.in, and Hindustan Times Digital, where she has built a reputation for factual, balanced, and timely reporting on stories that shape public discourse. With 12+ years in the field, she has covered major national events, conducted ground-level investigations, and interviewed policymakers, civil society leaders, and public figures. Her journalism is driven by one standard — verified facts reported without distortion, regardless of the pressure or pace of the news cycle. She has participated in press panels at the Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards and is a member of the Press Club of India. Her reporting continues to serve readers who need current affairs coverage they can trust.

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Answered on01/23/20
पिछले ही हफ्ते देश ने सावित्रीबाई फुले की 188वीं जयंती मनाई. सावित्रीबाई फुले की जयंती यानी 3 जनवरी को देश के कई प्रमुख नेताओं ने देश को बधाई दी. पिछले साल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से बधाई संदेश आया था और गूगल ने सावित्रीबाई पर डूडल भी बनाया था. सावित्रीबाई फुले हैशटैग ट्विटर पर ट्रैंड भी कर रहा था. धुर विरोधी विचार के बावजूद, आरएसएस ने सावित्रीबाई फुले को सम्मान के साथ याद किया. सावित्रीबाई फुले के नाम पर देश में डाक टिकट है, यूनिवर्सिटी का नाम है, सरकारी पुरस्कार हैं. इस तरह, देर से ही सही, लेकिन सावित्रीबाई फुले का नाम अब लोक विमर्श में स्थापित हो चुका है. सावित्रीबाई ने महिलाओं और जाति उन्मूलन के लिए कई काम किए. लेकिन जिस एक काम के लिए उनकी ख्याति सबसे ज्यादा है, वह काम है 1848 में पुणे के भिडेवाड़ा में लड़कियों के लिए एक स्कूल खोलना और फिर वहां पढ़ाना.

लेकिन पुणे का वो स्कूल सावित्रीबाई ने अकेले नहीं खोला था, न ही वो वहां की एकमात्र महिला शिक्षिका थीं. कोई और भी था, जो इस प्रोजेक्ट में उनके साथ जुटा था. कोई था, जिसने बालिका सावित्रीबाई के साथ शिक्षा ग्रहण की थी, उनके साथ पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण विद्यालय में ट्रेनिंग ली थी. कोई था, जिसने सावित्रीबाई और उनके पति को अपना घर रहने और स्कूल खोलने के लिए दिया था. कोई था, जो इस स्कूल में सावित्रीबाई के साथ पढ़ाता था.


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Modern India Observer
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Updated on05/27/26

सावित्रीबाई ज्‍योतिराव फुले देश की पहली महिला शिक्षक और सामाजिक क्रांतिकारी थी | वह 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका थी | जिन्होनें महिलाओं का मान बढ़ाया और एक महिला अकेले कितनी स्ट्रांग और महान है इस बात को बाकी महिलाओं को समझाया | उन्होंने अंधविश्वास और रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ने के लिए लंबा संघर्ष किया और उनका जीवन सबके लिए प्रेरणा लेने वाला था |

महाराष्ट्र में जन्मीं महान सावित्री बाई फुले जिन्होंने अपने पति दलित चिंतक समाज सुधारक ज्योति राव फुले से पढ़कर सामाजिक चेतना फैलाई और आपको जान कर हैरानी होगी की
 
विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं, तो वहीं उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे | जिस दौर में वो पढ़ने का सपना देख रही थीं, तब दलितों के साथ बहुत भेदभाव होता था और उस वक्त की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया और तुरंत वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी | इसके पीछे ये वजह बताई कि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप था | बस उसी दिन वो किताब वापस लाकर प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वो एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी |
 
तबसे सावित्रीबाई ने 19वीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियों के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया और सावित्रीबाई ने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया | दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया, और हमेशा से महिलाओं के हित में काम किया |
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