सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षक कहा जाता है। उन्होंने 19वीं सदी के समाज में महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया, उसी की बदौलत आज भारत में महिलाओं के लिए शिक्षा और प्रगति के द्वार खुले हैं।
सावित्रीबाई फुले के जीवन और महिलाओं के लिए उन्होंने जो योगदान दिया उसके बारे में हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं।
1. भारत में बालिकाओं के लिए पहला स्कूल खोला था
जब महिलाओं का पढ़ना-लिखना अपराध माना जाता था, तब सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला था।
कठिन संघर्ष: जब वह पढ़ाने स्कूल जाती थीं, तो विरोधी उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर फेंकते थे। सावित्रीबाई अपने थैले में एक दूसरी साड़ी लेकर जाती थीं और स्कूल पहुँचकर गंदी साड़ी बदलकर बच्चों को पढ़ाती थीं। उन्होंने महिलाओं और बालिकाओं को पढ़ना नहीं छोड़ा। उन्होंने महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए कुल 18 स्कूल खोले।
2. बाल विवाह का विरोध और विधवा पुनर्विवाह (रीमैरिज) का समर्थन किया
19वीं शताब्दी के दौर में बाल विवाह जैसी कुप्रथा फैली हुई थी। बालिकाओं और बालकों की शादी कम उम्र में कर दिया जाता था।
इसलिए समाज में विधवा महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति बहुत दयनीय थी। उनके साथ अत्याचार किया जाता था।
सावित्रीबाई फुले ने बाल विवाह का डटकर विरोध किया।
विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह का समर्थन भी किया इसलिए उन्हें महिलाएं याद करती है। क्योंकि महिलाओं को उन्होंने सम्मान जीवन जीने का अधिकार दिलाया इसलिए आज की महिलाएं और आज का समाज उन्हें उनके अच्छे कामों के लिए याद करता है।
3. 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' की स्थापना किया
जिन विधवा महिलाओं के साथ अत्याचार होता था। समाज के डर से इन महिलाओं की कोई भी मदद नहीं करता था। सावित्रीबाई ने 1863 में अपने घर में ही 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' खोला। इन महिलाओं को सम्मान दिया और उनके बच्चों के लालन पालन पर ध्यान दिया जाता था। समाज से बेसहारा महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा दी जाती थी।
4. सामाजिक समानता और 'सत्यशोधक समाज'
सावित्रीबाई ने महिलाओं को किताबी ज्ञान ही नहीं दिया बल्कि उनके जीवन को सुधारने के लिए कई कार्य किए । 1873 में समाज सुधारक ज्योतिबा फुले द्वारा सत्य समाज की स्थापना की गई है। आपको बता दे कि ज्योतिबा फुले उनके पति थे। उन्होंने सावित्रीबाई फुले को पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने बिना पुरोहित और बिना दहेज के विवाह कराने की परंपरा शुरू की, जिसे 'सत्यशोधक विवाह' कहा गया।
5. मानवता और निस्वार्थ सेवा का कार्य किया
1897 में जब पुणे में 'प्लेग' की महामारी फैली गई थी तो सावित्रीबाई ने अपने बेटे के साथ मिलकर अस्पताल खोला और मरीज का इलाज करवाया। वह खुद बीमार मरीजों को अपनी पीठ पर उठाकर अस्पताल लाती थीं। मरीजों की सेवा करते-करते वह स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।
बात का सारांश
सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि वह लाखों महिलाओं की प्रेरणा का स्रोत थीं। आज भारत की महिलाएँ जिस भी क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, उसकी नींव सावित्रीबाई फुले के त्याग और संघर्ष पर ही रखी गई है।


