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shweta rajput· 6 years ago
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भारत को सोने की चिड़िया क्यों कहा जाता था ?

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हम सभी भारतीय बचपन से सुनते आ रहे हैं l कि भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था l इसी के कारण विदेशियों और अंग्रेजों ने इस देश को अपना गुलाम बनाया था l और अपार संपत्ति इस देश से लूट कर ले गए थे l प्राचीन भारत वैश्विक व्यापार का केंद्र था l प्राचीन काल में भारत खाद्य पदार्थ, कपास और रतन , हीरे इत्यादि के निर्यात में विश्व में सबसे आगे था l भारत मसाले और अन्य उत्पादन के निर्यात में अग्रणी देश था l

भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुएं - भोजन, कपास , चावल, गेहूं , हल्दी, काली मिर्च, दालचीनी,

नीलमणि, रेशम, धातु उत्पाद ज्वेलरी, चांदी के बनी पदार्थ आदि निर्यात किए जाते थे l

भारत में पर्याप्त सोना था जिसके कारण इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था l

Letsdiskuss

Answered by
K
kajal YadavWellness remedy Advisor
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Answered on11/05/23
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पहले हमारा भारत देश काफी अमीर था इसीलिए उसे सोने का चिड़िया कहा जाता है ! क्योंकि,उस समय में भारत के राजाओं के पास अधिक धन-संपत्ति हुआ करती थी !भारत में पहले कई तरह के मसाले,कपास, लोहा आदि एक अच्छी मात्रा में पाया जाता था और भारत देश कई सारे देशों में इन चीजों को बेचता था!हमारे भारत में एक मोर सिहासन था और यह इतना महंगा था कि जितने में इस सिंहासन को बनाया गया है उतने में दो ताजमहल का निर्माण किया जा सकता था! लेकिन सन 1739 में फारसी शासक के द्वारा नादिर शाह ने युद्ध जीतकर इस सिंहासन को अपने नाम कर लिया था। लेकिन समय के साथ-साथ हमारा भारत पिछड़ ता गया और इसका स्थान दुनिया में कम हो गया और यही कारण है कि कभी भारत को सोने की चिड़िया के नाम से जना जाता था ।Article image

Answered by
preeti  patel
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Answered on01/06/22
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भारत को सोने की चिड़िया इसलिए कहा जाता था कि पहले प्राचीन काल में भारत, खाद्य पदार्थ, कपास, रत्न और हीरे इत्यादि। के निर्यात में विश्व में सबसे आगे भारत था और भारत को सोने की चिड़िया कहने के पीछे एक बड़ा यही कारण था वह मयूर सिंहासन था इसकी एक अलग ही पहचान हुआ करती थी और इस सिंहासन को बनाने के लिए जितना धन लगाया गया था उतने में लगभग 2 ताजमहल का निर्माण हो जाता.। और भारत में काफी धनसंपदा मौजूद थी 16 ईसवी के आसपास भारत के प्रति व्यक्ति जीडीपी 1305 अमेरिकी डॉलर थी क्योंकि उस समय चीन, ब्रिटिश अमेरिकी, और जापान से भी सबसे अधिक थी। लेकिन भारत की यह संपत्ति ही विदेशी आक्रमणों का कारण भी बनी थी और अंग्रेजो ने हमारे भारत देश में लोगों के बीच से फूट पैदा करके सोने की चिड़िया को लूट ले गया था। Article image

Answered by
Aanchal Singh
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Answered on01/06/22
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एक समय था जब हमारा भारत देश अमीर देशों में शामिल हुआ करता था जिसके चलते हमारे देश में सभी शासन करने का सपना देखते थे भारत पर शासन करने के मकसद से यहां पर कई लोगों के द्वारा आक्रमण और कई राजाओं द्वारा राज भी किया गया था भारत को सोने की चिड़िया का नाम का दर्जा कई कारणों से दिया गया था उस दौर में भारत के राजाओं के पास बहुत धन-संपत्ति हुआ करती थी वहीं भारत में मसाले कपास लोहा काफी अच्छी मात्रा में पाया जाता करता था और इन चीजों को अन्य देश के लोगों द्वारा खरीदा जाया करता था इसके अलावा भारत में उस समय जीडीपी भी अच्छी हुआ करती थी। और भारत को सोने की चिड़िया कहने का सबसे बड़ा कारण हुआ करता था, वह मोर सिहासन था इस सिहासन की अपनी एक अलग पहचान हुआ करती थी कहा जाया करता था उसकी इस सिंहासन को बनाने के लिए जितना धन लगाया गया था उतना धन से दो ताजमहल का निर्माण किया जा सकता था लेकिन सन 1739 में फारसी शासक नादिर शाह ने एक युद्ध जीतकर इस सिंहासन को हासिल कर लिया था। लेकिन समय के साथ-साथ भारत का स्थान दुनिया में कम होता चला गया और यह सवाल पीछे छोड़ गया कि भारत को कभी सोने की चिड़िया के नाम से भी जाना जाता था।Article image

Answered by
Krishna Patel
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Answered on01/06/22
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सोने की चिड़िया कहे जाने वाले “ #अखंड #भारत ” की कहानी।

भारत अजूबों का देश है।
हमारी संस्कृति दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा है।

दुनिया की सारी पुरानी सभ्यता एवं संस्कृतिया मिट चुकी हैं सिर्फ़ भारतीय सभ्यता को छोड़कर।
बहुत कोशिश कर ली विदेशियों और जयचंदों ने मिलकर इसकी विशालता को धूमिल करने की परंतु अब और नहीं।
अपने सनातनी होने पर हमें गर्व है और ज़रूरत है इसकी ख्याति को फिर से जीवंत करने की।
अपने घर के, समाज के हर छोटे-बड़े सदस्य के साथ इस “अखण्ड भारत” की गाथा को साझा करें, मेरी छोटी सी कोशिश में सभी साथ दें।

“अखण्ड भारत”

अखण्ड भारत : केसरिया रंग से प्रकशित अखण्ड भारत का एक मानचित्र जिसमें आधुनिक राष्ट्र भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं। वृहद भारत : केसरिया - भारतीय उपमहाद्वीप ; हल्का केसरिया : वे क्षेत्र जहाँ हिन्दू धर्म फैला; पीला - वे क्षेत्र जिनमें बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ

अखण्ड भारत भारत के प्राचीन समय के अविभाजित स्वरूप को कहा जाता है। प्राचीन काल में भारत बहुत विस्तृत था जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, बर्मा, थाइलैंड शामिल थे।कुछ देश जहाँ बहुत पहले के समय में अलग हो चुके थे वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि अंग्रेजों से स्वतन्त्रता के काल में अलग हुये।

अखंड भारत में आज के अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका आते है केवल इतना ही नहीं कालांतर में भारत का साम्राज्य में आज के मलेशिया, फिलीपीन्स, थाईलैंड, दक्षिण वियतनाम, कंबोडिया, इंडोनेशिया आदि में सम्मिलित थे। सन् 1875 तक (अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका) भारत का ही हिस्सा थे लेकिन 1857 की क्रांति के पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी उन्हें लगा की इतने बड़े भू-भाग का दोहन एक केंद्र से करना संभव नहीं है एवं फुट डालो एवं शासन करो की नीति अपनायी एवं भारत को अनेकानेक छोटे-छोटे हिस्सो में बाँट दिया केवल इतना ही नहीं यह भी सुनिश्चित किया की कालांतर में भारतवर्ष पुनः अखंड न बन सके।

1. अफ़ग़ानिस्तान (1876) : आज का अफगानिस्तान उस समय गंधार और कंबोज के कुछ हिस्सों को मिलाकर अफगानिस्तान बना। उक्त संपूर्ण क्षेत्र में हिन्दूशाही और पारसी राजवंशों का शासन रहा। बाद में यहां बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ और यहां के राजा बौद्ध हो गए। सिकंदर के आक्रमण के समय यहां पर फारसी और यूनानियों का शासन हो चला। फिर 7वीं सदी के बाद यहां पर अरब और तुर्क के मुसलमानों ने आक्रमण करना शुरू किए और 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस ने अफगानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया था। हालांकि इसके खिलाफ लड़ाई चलती रही। बाद में यह दिल्ली के मुस्लिम शासकों के कब्जे में रहा और फिर ब्रिटिश इंडिया के अंतर्गत आ गया। 1834 में एक प्रकिया के तहत 26 मई 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात राजनीतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। इससे अफगानिस्तान अर्थात पठान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से अलग हो गए। 18 अगस्त 1919 को अफगानिस्तान को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली। विघटन की इस शृंखला का प्रारम्भ अफ़ग़ानिस्तान से हुआ जब सन् 1876 में रूस एवं ब्रिटैन के बीच हुई गंडामक संधि के बाद अफ़ग़ानिस्तान बना।

2. भूटान (1906) : भूटान भी कभी भारतीय महाजनपदों के अंतर्गत एक जनपद था। संभवत: या विदेही जनपद का हिस्सा था। यहां वैदिक और बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज हैं। यह सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर तिब्बत से ज्यादा जुड़ा हुआ है, क्योंकि यहां का राजधर्म बौद्ध है। तिब्बत कभी जम्बूद्वीप खंड का त्रिविष्‍टप क्षेत्र हुआ करता था, जो किंपुरुष का एक जनपद था। किंपुरुष भारतवर्ष के अंतर्गत नहीं आता है। जहां तक सवाल भूटान का है तो यह तिब्बत के अंतर्गत नहीं आता है तथा यह भौगोलिक रूप से भारत से जुड़ा हुआ है। भूटान संस्कृत के भू-उत्थान से बना शब्द है। सिक्किम और भूटान को भी अंग्रेजों ने 1906 में स्वतंत्रता संग्राम से लगकर दिया और वहां पर अपनी एक प्रत्यक्ष नियंत्रण से रेजीडेंट स्थापित कर दी थी। ब्रिटिश प्रभाव के तहत 1907 में वहां राजशाही की स्थापना हुई। 3 साल बाद एक और समझौता हुआ जिसके तहत ब्रिटिश इस बात पर राजी हुए कि वे भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे लेकिन भूटान की विदेश नीति इंग्लैंड द्वारा तय की जाएगी। 1947 में भारत आजाद हुआ और 1949 में भारत-भूटान समझौते के तहत भारत ने भूटान की वो सारी जमीन उसे लौटा दी, जो अंग्रेजों के अधीन थी। इस समझौते के तहत भारत ने भूटान को हर तरह की रक्षा और सामाजिक सुरक्षा का वचन भी दिया।

3. तिब्बत (1914) तिब्बत को त्रिविष्टप कहा जाता था जहां रिशिका (Rishika) और तुशारा (East Tushara) नामक राज्य थे। त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से वैवस्वत मनु के नेतृत्व में प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। वे देव स्वर्ग से अथवा अम्बर (आकाश) से पवित्र वेद पुस्तक भी साथ लाए थे। इसी से श्रुति और स्मृति की परंपरा चलती रही। वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ। तिब्बत में पहले हिन्दू फिर बाद में बौद्ध धर्म प्रचारित हुआ और यह बौद्धों का प्रमुख केंद्र बन गया। शाक्यवंशियों का शासनकाल 1207 ईस्वी में प्रांरभ हुआ। बाद में चीन के राजा का शासन रहा। फिर 19वीं शताब्दी तक तिब्बत ने अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखी। इस बीच लद्दाख पर कश्मीर के शासक ने तथा सिक्किम पर अंग्रेंजों ने आधिपत्य जमा लिया। फिर चीन और ब्रिटिश इंडिया के बीच 1907 के लगभग बैठक हुई और इसे दो भागों में विभाजित कर दिया। पूर्वी भाग चीन के पास और दक्षिणी भाग लामा के पास रहा। 1951 की संधि के अनुसार यह साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। इस दौरान स्वतंत्र भारत के राजनेताओं ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी।

4. श्रीलंका (1935) 'श्रीलंका' भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित एक बड़ा द्वीप है। यह भारत के चोल और पांडय जनपद के अंतर्गत आता था। 2,350 वर्ष पूर्व तक श्रीलंका की संपूर्ण आबादी वैदिक धर्म का पालन करती थी। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा और वहां के सिंहल राजा ने बौद्ध धर्म अपनाकर इसे राजधर्म घोषित कर दिया। बौद्ध और हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार यहां पर प्राचीनकाल में शैव, यक्ष और नागवंशियों का राज था। श्रीलंका के प्राचीन इतिहास के बारे में जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण लिखित स्रोत सुप्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ 'महावंस' है। श्रीलंका के आदिम निवासी और दक्षिण भारत के आदिमानव एक ही थे। एक खुदाई से पता चला है कि श्रीलंका के शुरुआती मानव का संबंध उत्तर भारत के लोगों से था। भाषिक विश्लेषणों से पता चलता है कि सिंहली भाषा गुजराती और सिन्धी भाषा से जुड़ी है। ऐसी मान्यता है कि श्रीलंका को भगवान शिव ने बसाया था। बाद में उन्होंने इसे कुबेर को दे दिया था। कुबेर से रावण ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था। ईसा पूर्व 5076 साल पहले भगवान राम ने रावण का संहार कर श्रीलंका को भारतवर्ष का एक जनपद बना दिया था। श्रीलंका पर पहले पुर्तगालियों, फिर डच लोगों ने अधिकार कर शासन किया 1800 ईस्वी के प्रारंभ में अंग्रेजों ने इस पर आधिपत्य जमाना शुरू किया और 1818 में इसे अपने पूर्ण अधिकार में ले लिया। अंग्रेज काल में अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत तमिल और सिंहलियों के बीच सांप्रदायिक एकता को बिगाड़ा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को पूर्ण स्वतंत्रता मिली।

5. म्यनमार (1937) म्यांमार कभी ब्रह्मदेश हुआ करता था। इसे बर्मा भी कहते हैं, जो कि ब्रह्मा का अपभ्रंश है। म्यांमार प्राचीनकाल से ही भारत का ही एक उपनिवेश रहा है। अशोक के काल में म्यांमार बौद्ध धर्म और संस्कृति का पूर्वी केंद्र बन गया था। यहां के बहुसंख्यक बौद्ध मतावलंबी ही हैं। मुस्लिम काल में म्यांमार शेष भारत से कटा रहा और यहां पर स्वतंत्र राजसत्ताएं कायम हो गईं। 1886 ई. में पूरा देश ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत आ गया किंतु ब्रिटिशों ने 1935 ई. के भारतीय शासन विधान के अंतर्गत म्यांमार को भारत से अलग कर दिया। 1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से जाना पड़ सकता है। समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतंत्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन् 1935 में श्रीलंका व सन् 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दे दी।

6. पाकिस्तान(1947) सिन्ध, पंजाब, मुल्तान और बलूचिस्तान सभी हिन्दू राजाओं के अन्तर्गत आते थे।

7. बंग्लादेश (1971) आज के बंगाल का हिस्सा हुआ करता था।

8. नेपाल( 1923): आज के नेपाल को देवघर कहा जाता था। यह भी कभी अखंड भारत का हिस्सा हुआ करता था। भगवान श्रीराम की पत्नी सीता का जन्म स्थल मिथिला नेपाल में है। नेपाल के जनकपुर में सीता जन्म स्थल पर सीता माता का विशाल मंदिर भी बना हुआ है। भगवान बुद्ध का जन्म भी नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। यहां पर 1500 ईसा पूर्व से ही हिन्दू आर्य लोगों का शासन रहा है। 250 ईसा पूर्व यह मौर्यों के साम्राज्य का एक हिस्सा था। फिर चौथी शताब्दी में गुप्त वंश का एक जनपद रहा। 7वीं शताब्दी में इस पर तिब्बत का आधिपत्य हो गया था। 11वीं शताब्दी में नेपाल में ठाकुरी वंश के राजा राज्य करते थे। उनके बाद यहां पर मल्ल वंश का शासन रहा, फिर गोरखाओं ने राज किया। मध्यकाल के रजवाड़ों की सदियों से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करने का श्रेय जाता है गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह को। राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1765 में नेपाल की एकता की मुहिम शुरू की और मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बड़े राज्यों को संगठित कर 1768 तक इसमें सफल हो गए। यहीं से आधुनिक नेपाल का जन्म होता है। 1923 में ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक संधि हुई जिसके अधीन नेपाल की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया। 1940 के दशक में नेपाल में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन की शुरुआत हुई। 1991 में पहली बहुदलीय संसद का गठन हुआ और इस तरह राजशाही शासन के अंत की शुरुआत हुई। यह दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था लेकिन वर्तमान में वामपंथी वर्चस्व के कारण अब यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है। नेपाल के राजवंश और भारत के राजवंशों का गहरा आपसी रिश्ता है।

मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम : वर्तमान के मुख्‍य 4 देश मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और कंबोडिया प्राचीन भारत के मलय प्रायद्वीप के जनपद हुआ करते थे।

1. मलेशिया: मलय प्रायद्वीप का दक्षिणी भाग मलेशिया देश के नाम से जाना जाता है। इसके उत्तर में थाईलैंड, पूर्व में चीन का सागर तथा दक्षिण और पश्चिम में मलक्का का जलडमरूमध्य है। उत्तर मलेशिया में बुजांग घाटी तथा मरबाक के समुद्री किनारे के पास पुराने समय के अनेक हिन्दू तथा बौद्ध मंदिर आज भी हैं। मलेशिया अंग्रेजों की गुलामी से 1957 में मुक्त हुआ। वहां पहाड़ी पर बटुकेश्वर का मंदिर है जिसे बातू गुफा मंदिर कहते हैं। पहाड़ी पर कुछ प्राचीन गुफाएं भी हैं। पहाड़ी के पास स्थित एक बड़े मंदिर में हनुमानजी की भी एक भीमकाय मूर्ति लगी है। मलेशिया वर्तमान में एक मुस्लिम राष्ट्र है।

2. सिंगापुर : सिंगापुर मलय महाद्वीप के दक्षिण सिरे के पास छोटा-सा द्वीप है। हालांकि यह मलेशिया का ही हिस्सा था। कहते हैं कि श्रीविजय के एक राजकुमार, श्री त्रिभुवन (जिसे संगनीला भी कहा जाता है) ने यहां एक सिंह को देखा तो उन्होंने इसे एक शुभ संकेत मानकर यहां सिंगपुरा नामक एक बस्ती का निर्माण कर दिया जिसका संस्कृत में अर्थ होता है 'सिंह का शहर'। बाद में यह सिंहपुर हो गया।



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S
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Answered on05/08/20
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