भारत का खर्चाः
भारत का खर्चा बहुत ज्यादा और कमाई कम. आपको ज्ञात होगा कि खर्च और कमाई में 6.45 लाख करोड़ का अंतर है। इसलिए सरकार अपनी कंपनियों का निजीकरण और निर्णय विनिवेश करके पैसे इकट्ठा करती है तो 20 21 के बजट को लेकर कई सवाल हो रहे हैं। विपक्ष ने इसे देश की संपत्ति बेचने वाला कह रहे हैं।
महामारी के आर्थिक स्थिति से झेल रहे भारत सरकार कंपनियों को बेचकर संसाधन जुटाना चाहती है। भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी के पहले से कमजोर स्थिति में थी। इस वजह से सरकार सबसे बड़ी सोच विचार में है कि आवश्यक सरकारी खर्च के लिए और आर्थिक गतिविधि के लिए पैसे कहां से लाएंगे। सरकार तेल, गैस, बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में ये संपत्तियों को बेचना चाह रही है।
चार श्रेणियां कौन सी हैः चार श्रेणियों के बात करें तो वह है एटॉमिक ऊर्जा, अंतरिक्ष और डिफेंस यातायात और टेलीकॉम, बीमा और वित्तीय सेवाएं, बजट की जानकारी देते समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषित किया था कि इस वर्ष सरकारी कंपनियों में विनिवेश के जरिए 1.75 लाख करोड रुपए का लक्ष्य रखा है। पर होता नहीं है हर साल एक नया लक्ष्य बनाते हैं, और उसे पूरा नहीं कर पाते है। इस बार 2.10 लाख करोड रुपए के लक्ष्य को सिर्फ 19,499 करोड रुपए ही कर पाए।
एयर इंडिया और एमटीएनएल जैसी कंपनी नहीं बिकने में नाकाम रही।
अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैः अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते है कि इस मंदी में कौन खरीददार मिलेगा। कंपनियों के आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। सरकारी संपत्ति को ऐसे ही कोई भी दाम में नहीं बेच सकते, उससे याराना पूंजीवाद या क्रोनी ने कैपिटलिजम को बढ़ावा मिलेगा।
आगे अरुण कुमार कहते हैं- इस महामारी की वजह से बड़ी संख्या में गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को इस नुकसान की वजह से, वे अस्पतालों के खर्चे एवं स्कूलों की महंगी फीस तक नहीं उठा पा रहे हैं। सभी को सरकार से ही उम्मीदें हैं। सरकारी कंपनियों के निजीकरण से देश की आर्थिक परिस्थिति बिगड़ जाएगी। कर्मचारी या तो बेरोजगार होंगे यहां उन्हें सहूलियतें कम मिलेंगी।


