वायरलेस चार्जिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें मोबाइल फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को बिना केबल लगाए चार्ज किया जाता है। इसमें बिजली को हवा (air) के माध्यम से एक चार्जिंग पैड से डिवाइस तक पहुँचाया जाता है। यह तकनीक मुख्य रूप से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर काम करती है।
इस तकनीक में दो मुख्य हिस्से होते हैं—ट्रांसमीटर (चार्जिंग पैड) और रिसीवर (मोबाइल या डिवाइस के अंदर का हिस्सा)।
जब आप अपने फोन को वायरलेस चार्जिंग पैड पर रखते हैं, तो पैड के अंदर मौजूद कॉइल (coil) में बिजली प्रवाहित की जाती है। इससे एक चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) बनता है। यह चुंबकीय क्षेत्र हवा के माध्यम से फोन के अंदर मौजूद दूसरी कॉइल तक पहुँचता है।
फोन के अंदर की कॉइल इस चुंबकीय ऊर्जा को वापस बिजली (electrical energy) में बदल देती है। यही बिजली बैटरी को चार्ज करती है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी तार की जरूरत नहीं होती।
यह प्रक्रिया बहुत हद तक ट्रांसफॉर्मर की तरह काम करती है, लेकिन इसमें दोनों कॉइल अलग-अलग डिवाइस में होते हैं और बीच में कोई सीधा संपर्क नहीं होता।
आजकल कुछ नए वायरलेस चार्जर रेज़ोनेंट इंडक्शन (Resonant Induction) तकनीक का भी उपयोग करते हैं, जिससे थोड़ा दूर रखकर भी चार्जिंग संभव हो जाती है। हालांकि अधिकतर मोबाइल चार्जर अभी भी कम दूरी (कुछ मिलीमीटर) पर ही काम करते हैं।
इसके फायदे:
- केबल लगाने की जरूरत नहीं होती
- पोर्ट खराब होने का खतरा कम होता है
- उपयोग करना आसान और सुविधाजनक होता है
इसके नुकसान:
- वायर्ड चार्जिंग की तुलना में धीमी हो सकती है
- फोन गर्म हो सकता है
- सही पोजीशन में रखना जरूरी होता है
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