खास रिपोर्ट: आपने अब तक हवा, पानी और शोर के प्रदूषण के बारे में पढ़ा और सुना होगा। लेकिन अब एक नया और खामोश चोर हमारी रातों का अंधेरा चुरा रहा है—इसे 'प्रकाश प्रदूषण' (Light Pollution) कहते हैं। यह संकट बहुत तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है।

हाल ही में आई वैज्ञानिक रिसर्च 'वर्ल्ड एटलस ऑफ आर्टिफिशियल नाइट स्काई ब्राइटनेस' ने पूरी दुनिया में खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट का साफ इशारा है कि हमारी रातें अब पहले जैसी काली और अंधेरी नहीं रहीं। शहरों की बेतहाशा कृत्रिम रोशनी (बिजली की चकाचौंध) की वजह से आसमान का संतुलन बिगड़ चुका है, जिसका सीधा और घातक असर हमारे जनजीवन और जीव-जगत पर पड़ रहा है।
क्या है यह 'प्रकाश प्रदूषण'?
जैसे-जैसे तरक्की की रफ्तार तेज़ हो रही है और शहरों का दायरा बढ़ रहा है, सूरज ढलने के बाद भी अंधेरे का नामो-निशान नज़र नहीं आता है। इसका कारण सड़कों की स्ट्रीट लाइट्स, बड़े-बड़े नियॉन चमक वाले विज्ञापन के होर्डिंग और इमारतों पर लगे बल्ब रातों को दिन में बदल रहे हैं।
रोशनी की इसी तरह की अनावश्यक इस्तेमाल को वैज्ञानिक भाषा में 'प्रकाश प्रदूषण' कहा जाता है। नेचर ने इंसान और माहौल की भलाई के लिए दिन की रोशनी और रात के अंधेरे का एक बराबर बैलेंस बनाया था। इस बैलेंस के बिगड़ने के कारण बीमारियां जन्म लेती है और पर्यावरण में असंतुलन हो जाता है।
प्रकाश प्रदूषण की चार मुख्य किस्में (Types)
वैज्ञानिकों की ताज़ा रिसर्च के मुताबिक, प्रकाश प्रदूषण को चार अलग-अलग प्रकारों में बताया गया है:
स्काईग्लो (Skyglow): घनी आबादी वाले बड़े शहरों के ऊपर रात में जो एक चमकदार गुंबद या छतरी-सी दिखाई देती है, उसे 'स्काईग्लो' कहते हैं। पूरी रात जलने वाली लाइटों की रोशनी जब हवा में मौजूद कणों से टकराती है, तो पूरा आसमान धुंधला हो जाता है। इसी वजह से शहरों के आसमान से चाँद, तारे और ग्रह-नक्षत्र दिखाई नहीं देते हैं।
ग्लेयर (Glare): यह आँखों में चुभने वाली वह खतरनाक चकाचौंध है, जो कुछ पलों के लिए इंसान को अंधा कर देती है। हाईवे पर सामने से आती गाड़ियों की हाई-बीम लाइट या तेज़ फ्लैशलाइट सीधे आँखों पर पड़ती है, इस वजह से दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
लाइट ट्रेसपास (Light Trespass):
जब दूर से आई हुई प्रकाश से के जलते हुए बल्ब जब दूर से जलते हुए प्रकाश के बल्ब किसी के हवादार कमरे या खिड़कियों से उसके बेडरूम तक पहुंचता है तो इसे 'लाइट ट्रेसपास' कहा जाता है। इंसान चाहकर भी अपने निजी कमरे में अंधेरा नहीं कर पाता, जिससे उसकी नींद में डिस्टरबेंस होता है।
क्लटर (Clutter): हाईवे या बाज़ारों में जब अनगिनत लाइटें एक साथचमकती हैं, तो उसे क्लटर कहते हैं। रोशनी का यह जमघट ड्राइवरों का ध्यान भटकाता है और जानलेवा हादसों की वजह बनता है।
खौफनाक आंकड़े: वैज्ञानिक रिपोर्ट का बड़ा खुलासा
अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट और सैटेलाइट डेटा से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं:
'मिल्की वे' का गायब होना: दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी अब रोशनी के इस धुंधले होने के कारण हमारी आकाशगंगा यानी 'मिल्की वे' (Milky Way) को खुली आँखों से नहीं देख पाती।
2% सालाना की रफ्तार: उपग्रह (सैटेलाइट) के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में कृत्रिम रोशनी का दायरा हर साल 2% की दर से बढ़ रहा है, जो इंसानी आबादी की विकास दर से भी ज्यादा तेज़ है।
🔗 शोध रिपोर्ट का संदर्भ (Link): इस विस्तृत अंतरराष्ट्रीय अध्ययन को पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ: Science Advances - The New World Atlas of Artificial Night Sky Brightness
इंसानी सेहत पर प्रभाव
हमारा बाडी और दिमाग कुदरत के 24 घंटे वाले जैविक चक्र (Circadian Rhythm) पर काम करते हैं। हमारे दिमाग के अंदर एक कुदरती घड़ी है, जो लाखों साल के विकास के बाद रात में आराम करने और दिन में काम करने के हिसाब से ढली है।
मेलाटोनिन हार्मोन की कमी: रात के वक्त स्मार्टफोन, टीवी स्क्रीन या एलईडी बल्ब से निकलने वाली 'ब्लू लाइट' (नीली रोशनी) हमारे दिमाग में 'मेलाटोनिन' नाम के ज़रूरी हार्मोन को बनने से रोक देती है। यह हार्मोन बेहतर नींद और बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यूनिटी) के लिए बेहद ज़रूरी है। इसकी कमी से अनिद्रा (Insomnia) और डिप्रेशन जैसी बीमारियाँ पनपती हैं।
कैंसर और गंभीर बीमारियों का अंदेशा: वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) की कैंसर रिसर्च एजेंसी (IARC) का कहना है कि हमारी कुदरती जैविक घड़ी का लगातार बाधित होना कैंसर का कारण बन सकता है। नाइट शिफ्ट में काम करने वालों या तेज़ रोशनी में रहने वाले लोगों में ब्रेस्ट कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा शुगर (डायबिटीज), मोटापा और दिल की बीमारियाँ भी तेज़ी से पैर पसारती हैं।

पर्यावरण और बेज़ुबान जीवों पर आफत
ज़मीन पर मौजूद लगभग 50 फीसदी जीव-जंतु और कीट-पतंगे रात्रिचर (Nocturnal) हैं, यानी वे रात के अंधेरे में ही शिकार करते हैं, भोजन तलाशते हैं और अपना वंश बढ़ाते हैं। बेतहाशा रोशनी उनके रहने की जगह को खत्म कर रही है।
दिशा भटकते प्रवासी पक्षी: लाखों प्रवासी पक्षी रात के वक्त तारों और चाँद की सीध देखकर हज़ारों किलोमीटर का सफर तय करते हैं। लेकिन शहरों के चमकदार माहौल से भ्रमित होकर वे रास्ता भटक जाते हैं या ऊँची इमारतों से टकराकर दम तोड़ देते हैं।
समुद्री कछुओं पर मंडराता संकट: कछुए रात के अंधेरे में ही समुद्र के किनारों पर अंडे देते हैं। अंडों से निकलने के बाद छोटे बच्चे चाँद की रोशनी का पीछा करते हुए समंदर की तरफ जाते हैं। लेकिन तटीय शहरों की तेज़ लाइटों के भ्रम में वे उल्टी दिशा यानी सड़कों की तरफ चले आते हैं और गाड़ियों के नीचे कुचल जाते हैं।
ऊर्जा और बर्बादी का आर्थिक नुकसान
बिजली की बेजा बर्बादी: ज़्यादातर स्ट्रीट लाइटों पर कोई ढक्कन या कैप (Shield) नहीं होता, जिससे लगभग 30% से 50% रोशनी सीधे आसमान की तरफ बेकार चली जाती है।
कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग: इस फालतू बिजली को बनाने के लिए कोयला और ईंधन जलाया जाता है, जिससे हर साल ज़हरीली कार्बन डाइऑक्साइड हवा में घुलती है और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देती है।
फसल उत्पादन और फूलों के परागण में भी हो रही कमी
https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/28783730/
रात के समय बढ़ता आर्टिफिशियल लाइट के कारण दुनिया भर में फसलों के उत्पादन और कृषि पारिस्थितिकी (Ecosystem) के लिए एक गंभीर खतरा बन गया रूप से। प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका 'Nature' में पब्लिश एक शोध (Knop et al.) में प्रकाश प्रदूषण के कारण फसलों के परागण (Pollination) और फल बनने की प्रक्रिया में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसकी वजह से फसल उत्पादन में भी कमी आई है।
राहत की बात: इस प्रदूषण से निपटना आसान है
अच्छी खबर यह है कि प्लास्टिक या वायु प्रदूषण के मुकाबले प्रकाश प्रदूषण पर काबू पाना बहुत आसान है। एक बटन बंद करते ही यह प्रदूषण पल भर में खत्म हो जाता है।
शिल्डेड लाइटिंग (Shielded Fixtures): स्ट्रीट लाइटों पर ऐसे शेड लगाए जाएँ, ताकि रोशनी सिर्फ ज़मीन की तरफ रहे, ऊपर आसमान की ओर बेकार न बहे।
सॉफ्ट और वार्म लाइट का इस्तेमाल: चुभने वाली नीली रोशनी के बजाय हल्की पीली रोशनी (Warm/Amber Light - 3000K या उससे कम) इस्तेमाल की जाए।
स्मार्ट सेंसर और टाइमर: पार्कों और दफ़्तरों में मोशन सेंसर लगाए जाएँ ताकि ज़रूरत न होने पर लाइटें खुद-ब-खुद बंद या धीमी हो जाएँ।
'डार्क स्काई' कानून: सरकारों को शहरों के लिए सख्त नियम बनाने चाहिए और राष्ट्रीय उद्यानों को 'डार्क स्काई ज़ोन' घोषित करके संरक्षित करना चाहिए।
आर्टिकल का सारांश
अंधेरा कोई डरने की चीज़ नहीं, बल्कि यह कुदरत की एक अनमोल देन है। जिस तरह जागने और काम करने के लिए दिन का उजाला ज़रूरी है, ठीक उसी तरह हमारी सेहत, ज़ेहनी सुकून और पर्यावरण की सलामती के लिए रात का अंधेरा भी उतना ही लाज़िमी है।
प्रकाश प्रदूषण को रोकने का मतलब शहरों को अंधेरे में डुबोना नहीं है, बल्कि "स्मार्ट और ज़िम्मेदार लाइटिंग" को अपनाना है। अगर हमने आज अपनी रातों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली नस्लें तारों भरे सुंदर आसमान को देखने से हमेशा के लिए महरूम (वंचित) रह जाएँगी।
IARC Monographs Volume 124: Night Shift Work - IARC Monographs (रात में काम करने और कैंसर के जोखिम पर विस्तृत मूल्यांकन और निष्कर्ष)
रिसर्च रिपोर्ट लिंक
https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC6882045/
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