कानून की बात आते ही बहुत से लोग घबरा जाते हैं। लगता है यह बहुत पेचीदा चीज़ है, आम आदमी के बस की नहीं। लेकिन सच यह है कि कानून को समझना उतना मुश्किल नहीं है जितना दिखता है। बस किसी ने सही तरीके से समझाया नहीं।
आज हम बात करेंगे भारतीय दंड संहिता यानी जिसे पहले लोग आईपीसी कहते थे और अब इसे भारतीय न्याय संहिता के नाम से जाना जाता है। इस संहिता की धारा 18 से लेकर 28 तक में कुछ बहुत ज़रूरी परिभाषाएँ दी गई हैं। यह परिभाषाएँ पूरे कानून की नींव हैं।
सन 1860 में जब अंग्रेज़ों ने इस संहिता को बनाया था, तो उन्होंने शुरुआती धाराओं में कुछ बुनियादी शब्दों और अवधारणाओं को परिभाषित किया। इन्हें समझे बिना आगे की धाराएँ समझ में नहीं आतीं।
चलिए एक-एक करके सब समझते हैं। आसान भाषा में, उदाहरण के साथ।
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भारतीय दंड संहिता क्या है और यह कब से लागू है
पहले यह जान लेते हैं कि यह संहिता है क्या। भारत में जब कोई अपराध होता है तो उसे किस तरह परिभाषित किया जाए और अपराधी को क्या सज़ा दी जाए, यह सब भारतीय दंड संहिता तय करती है। यह संहिता सन 1860 से चली आ रही है। अंग्रेज़ी शासन के समय बनी यह संहिता आज़ादी के बाद भी लागू रही।
हाँ, सन 2023 में इसे नए नाम से जाना जाने लगा है पर अभी भी लोग इसे पुराने नाम से ही पहचानते हैं।
इस संहिता में शुरुआती धाराएँ परिभाषाओं से भरी हैं। यही परिभाषाएँ पूरे कानूनी तंत्र की भाषा तय करती हैं। आइए देखते हैं धारा 18 से 28 तक।

धारा 18 क्या है
यह धारा बताती है कि भारतीय दंड संहिता का दायरा कहाँ तक है।
सरल शब्दों में, इस धारा के अनुसार यह संहिता पूरे भारत पर लागू होती है। पहले जम्मू और कश्मीर को इससे अलग रखा गया था क्योंकि वहाँ संविधान का अनुच्छेद 370 लागू था। लेकिन सन 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू और कश्मीर पर भी यह संहिता पूरी तरह लागू हो गई।
यानी अब देश के किसी भी कोने में कोई अपराध हो, उसे इसी संहिता के अनुसार देखा जाएगा।
For Example - इस धारा को समझने के लिए आप ऐसे समझ सकते हैं कि पहले भारत में जम्मू एवं कश्मीर राज्य को छोड़कर किसी भी कार्रवाई को भारतीय दंड संहिता के अनुसार किया जा सकता था। लेकिन अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से जम्मू कश्मीर में भी करवाई इस भारतीय दंड संहिता के अनुसार ही की जाती है।
धारा 19 क्या है
यह धारा न्यायाधीश शब्द को परिभाषित करती है।
बहुत से लोग सोचते हैं कि न्यायाधीश वही होता है जो किसी बड़े न्यायालय में बैठा हो। लेकिन इस धारा के अनुसार न्यायाधीश वह व्यक्ति होता है जो किसी न्यायिक पद पर हो और जो सभी नियमों का पालन करते हुए निर्णय ले।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी नगर का न्यायदंडाधिकारी किसी मामले में निष्पक्ष और नियमानुसार फैसला सुनाता है और उच्च न्यायालय उस फैसले को सही मानता है, तो वह व्यक्ति न्यायाधीश की परिभाषा में आता है।
For Example - मान लीजिए आपके नगर का मजिस्ट्रेट किसी केस पर सभी नियमों का पालन करते हुए कार्रवाई करता है और एक सही और निष्पक्ष निर्णय निकालता है और हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट इस फैसले को सही साबित करता है तो ऐसे में मजिस्ट्रेट को न्यायाधीश के रूप में मान सकते हैं।
धारा 20 क्या है
धारा 20 यह बताती है कि न्यायाधीश की शक्तियाँ कब और कहाँ मानी जाएंगी।
इस धारा के अनुसार कोई व्यक्ति तभी न्यायाधीश की शक्तियों का उपयोग कर सकता है जब वह न्यायालय में अपने पद पर बैठकर कार्यवाही कर रहा हो। न्यायालय के बाहर वह उन शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकता।
यानी पद और जगह दोनों का महत्व है।
धारा 21 क्या है
यह धारा लोक सेवक की परिभाषा देती है।
जो व्यक्ति बिना किसी निजी स्वार्थ के जनता की सेवा करता है उसे लोक सेवक कहते हैं। इस परिभाषा में शामिल हैं:
- सरकारी न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट
- सेना के अधिकारी और जवान
- सरकारी कर्मचारी और अधिकारी
- नगर पालिका और पंचायत के पदाधिकारी
- चुनाव कार्य में लगे अधिकारी
उदाहरण के रूप में, अगर कोई न्यायाधीश किसी ऐसे मामले में फैसला सुना रहा है जिसमें दोनों पक्षों से उसका कोई संबंध नहीं है और वह निष्पक्ष फैसला देता है, तो वह लोक सेवक है।
लोक सेवक के विरुद्ध अपराध करना, सामान्य नागरिक के विरुद्ध अपराध से ज़्यादा गंभीर माना जाता है।
For Example - मान लीजिए किसी हाई कोर्ट के न्यायाधीश के पास एक केस आता है यह केस दो लोगों के आपसी मारपीट का केस है ऐसे में न्यायाधीश सभी नियमों का पालन करते हुए सही फैसला सुनाता है तो उसे हम लोकसेवक बोल सकते हैं क्योंकि न्यायाधीश इन दोनों व्यक्तियों में ही किसी को भी नहीं जानता है और वह बिना किसी स्वार्थ के अपने फैसले को निसपक्ष सुनाता है तो इस तरह वह एक लोकसेवक हैं।
धारा 22 क्या है
यह धारा चल संपत्ति को परिभाषित करती है।
चल संपत्ति वह होती है जिसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके और जो भूमि से जुड़ी न हो। जैसे गाड़ी, सोना-चाँदी, घर का सामान, पशु आदि।
लेकिन जो चीज़ें भूमि से जुड़ी हैं, जैसे पेड़, कुआँ, मकान की नींव, वे चल संपत्ति नहीं मानी जातीं।
यह परिभाषा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि चोरी, डकैती जैसे अपराध केवल चल संपत्ति के मामले में लागू होते हैं।
For Example - इस धारा का मतलब है कि मान लीजिए आप अपने गांव में रहते हैं और शहर आना चाहते हैं तो ऐसे में आप अपनी अचल संपत्ति जैसे गाड़ी घर की चीजें को तो अपने साथ ले जा सकते हैं लेकिन चल अचल संपत्ति जो भूमि से जुड़ी हुई है जैसे पुराना पेड़ या जमीन या कुछ भी को विस्थापित नहीं कर सकते है।
धारा 23 क्या है
यह धारा गलत तरीके से नुकसान की अवधारणा को समझाती है।
अगर कोई व्यक्ति अपने नुकसान की भरपाई के लिए किसी गलत और गैरकानूनी तरीके का इस्तेमाल करता है तो यह इस धारा के अंतर्गत आता है।
मान लीजिए किसी ने आपको पैसे उधार दिए और आप नहीं लौटा रहे। तो वह व्यक्ति यह नहीं कर सकता कि आपका मोबाइल या कोई चीज़ बिना आपकी इजाज़त के उठा ले। ऐसा करने पर उस पर इसी धारा के तहत मामला बन सकता है।
नुकसान हुआ है इसका मतलब यह नहीं कि गलत रास्ता अपनाया जाए। कानून के रास्ते से ही राहत लेनी होगी।
For Example - मान लीजिए आप ने अपने किसी दोस्त को ₹10000 उधार दिए हैं अब मान लीजिए कि आपका दोस्त आपके उन पैसों को लौटा नहीं रहा है तो ऐसे में आप अपने दोस्त से मिलते हैं और अपने नुकसान को कवर करने के लिए उसके फोन को छीनकर अपने उन ₹10000 के बदले फोन को अपने पास रख लेते हैं तो ऐसे में वह व्यक्ति आपके ऊपर धारा 23 के अंतर्गत कार्रवाई करवा सकता है।
धारा 24 क्या है
इस धारा में बेईमानी से किए गए काम को परिभाषित किया गया है।
जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी ऐसे इरादे से कोई काम करता है जिससे किसी को गलत फायदा पहुँचे और किसी को नुकसान हो, तो वह बेईमानी से किया गया काम माना जाता है।
उदाहरण के लिए, अगर कोई किसान के खेत में खड़ी फसल जानबूझकर बर्बाद कर दे ताकि उस किसान को नुकसान हो, तो यह धारा 24 के अंतर्गत अपराध है।
यहाँ इरादा बहुत महत्वपूर्ण है। अनजाने में हुई गलती और जानबूझकर किए गए नुकसान में कानून फर्क करता है।
For Example - मान लीजिए आप एक छोटे किसानों है तथा आपके खेत में फसल लगी हुई है इसी वक्त कोई दूसरा व्यक्ति आपके ही सामने आपको नुकसान पहुंचाने के लिए आपकी फसल को गलत तरीके से बर्बाद कर देता है तो यह कार्य धारा 24 के अंतर्गत आता है जिस पर आईपीसी की धारा 24 के तहत कार्रवाई की जाती है।
धारा 25 क्या है
यह धारा कपटपूर्ण कार्य को परिभाषित करती है।
कपट का मतलब है धोखा। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से उसे धोखे में रखता है और उसके साथ छल करता है, तो वह कपटपूर्ण कार्य है।
एक आम उदाहरण, जब कोई व्यापारी अपने सामान की गुणवत्ता झूठी बताकर बेचता है और ग्राहक को घटिया सामान थमा देता है, तो यह इसी धारा के अंतर्गत आता है।
ध्यान दीजिए कि इस धारा में उद्देश्य महत्वपूर्ण है। अगर धोखा जानबूझकर और नुकसान पहुँचाने के इरादे से दिया गया हो तभी यह धारा लागू होती है।
For Example - आप लोगों ने बहुत बार देखा होगा कि बहुत सी ई-कॉमर्स कंपनियां या अन्य कोई कम्पनी के स्टोर पर जब हम किसी अच्छे विशेष क्वालिटी वाले प्रोडक्ट को आर्डर करके मंगवाते हैं तो डिलीवर होने वाले प्रोडक्ट की क्वालिटी खराब होती है और कभी - कभी प्रोडक्ट भी खराब होता है तो ऐसे में वह कंपनी अपने प्रोडक्ट को आप को दिखाकर धोखा देता है और उसके बाद आपको खराब प्रोडक्ट देकर आपका नुकसान करता है तो इस तरह वह कंपनी कपट पूर्वक कार्य करती है ऐसे में आप उस कंपनी पर आईपीसी की धारा 25 के तहत मुकदमा कर सकते हैं।
धारा 26 क्या है
इस धारा में विश्वास करने के उचित कारण की बात की गई है।
जब कोई व्यक्ति कोई काम करता है और उस काम के बारे में यह साबित नहीं कर पाता कि उसके पास उस काम को करने का उचित और ठोस कारण था, तो उसे इस धारा के अंतर्गत जवाबदेह ठहराया जाता है।
मान लीजिए कोई व्यक्ति जाली दस्तावेज़ बेचते हुए पकड़ा जाता है और कहता है कि उसने यह सरकारी कार्यालय से खरीदे थे। लेकिन इसका कोई सबूत नहीं देता। तो उसकी यह बात विश्वास करने योग्य नहीं मानी जाएगी और उस पर कार्रवाई होगी।
For Example - मान लीजिए न्यायालय का कोई एक स्टांप विक्रेता जो जाली स्टांप को बेचते हुए पकड़ा गया। और कार्रवाई होने के दौरान उसके द्वारा केवल यह कह देना कि उसने यह सभी स्टांप को कोषालय से खरीदा हुआ है यह विश्वास करने का कारण नहीं है मतलब बिना किसी साक्ष्य, और कागजी बिल या किसी तरह के वास्तविक सबूत को न दे पाने के कारण उसकी बात को सही नहीं माना जाएगा। अतः विश्वास न करने का कारण न दे पाने की वजह से इसे धारा 26 के अंतर्गत रखा जाता है।
धारा 27 क्या है
यह धारा किसी के कब्ज़े में रखी गई संपत्ति के बारे में है।
अगर कोई व्यक्ति अपनी गैरकानूनी चीज़ों को किसी दूसरे व्यक्ति के पास छुपाकर रखता है, चाहे वह नौकर हो, मित्र हो या रिश्तेदार हो, तो उन गैरकानूनी चीज़ों के मिलने पर मूल मालिक यानी जिसने रखवाई थीं, उस पर यह धारा लागू होती है।
यानी अगर आपने अपनी अवैध शराब या कोई भी गैरकानूनी चीज़ किसी के घर रखवा दी और पुलिस को वहाँ से मिली, तो जिम्मेदारी आपकी होगी, उस व्यक्ति की नहीं जिसके घर मिली।
For Example - मान लीजिए आपके पास कोई गैर कानूनी चीज जैसे अवैध शराब, या प्रापर्टी है और जिसे आपने अवैध रूप से अपने पास रखा है लेकिन किसी कारणवश आपने इन अवैध तथा गैर कानूनी चीजों को अपने नौकर या किसी अन्य करीबी के घर पर कुछ दिनों के लिए रखवा दिया। पुलिस कार्रवाई होने पर यह अवैध चीज आपके नौकर से बरामद की जाती है कार्रवाई जांच होने पर पता चलता है कि यह सभी चीजों को आपने रखवाया है तो इस गैरकानूनी काम के लिए आपको धारा 27 के अंतर्गत अपराधी मानकर सजा दी जाती है
धारा 28 क्या है
यह धारा कूटरचना यानी जाली दस्तावेज़ बनाने को परिभाषित करती है।
जब कोई व्यक्ति किसी असली दस्तावेज़ की नकल इस उद्देश्य से बनाता है कि किसी को धोखा दिया जा सके और उसका नुकसान किया जा सके, तो यह कूटरचना है।
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई आपकी ज़मीन के असली कागज़ों जैसी दिखने वाली नकली रजिस्ट्री बनाकर आपकी ज़मीन हड़पने की कोशिश करता है, तो यह धारा 28 के अंतर्गत गंभीर अपराध है।
आजकल जाली दस्तावेज़ों के मामले बहुत बढ़ गए हैं। इसीलिए यह धारा आज के समय में बहुत प्रासंगिक है।
For Example - मान लीजिए आपका कोई दोस्त आपके साथ धोखे के उद्देश से आपके किसी जमीन को छल कपट करके खुद का करने के लिए आप की जमीन के सही दस्तावेजों की तरह उससे मिलता- जुलता नकली दस्तावेज बनवा कर, धोखे से आपके साथ छल करता है तो वह इस धारा 28 के अंतर्गत अपराधी माना जाता है।
इन धाराओं का रोज़मर्रा की ज़िंदगी में महत्व
बहुत से लोग सोचते हैं कि यह सब केवल वकीलों और न्यायाधीशों के काम की चीज़ें हैं। लेकिन सच यह नहीं है।
आम नागरिक को इन धाराओं की जानकारी इसलिए होनी चाहिए:
- ताकि आप जान सकें कि आपके साथ हो रहा व्यवहार कानूनी है या नहीं
- ताकि आप किसी धोखे में न आएँ और धोखा होने पर सही धारा के तहत शिकायत कर सकें
- ताकि आप जान सकें कि कौन सा काम कानूनी रूप से सही है और कौन सा गलत
- ताकि आप अपनी संपत्ति, दस्तावेज़ और अधिकारों की सुरक्षा कर सकें
- ताकि कोई आपको गलत जानकारी देकर बरगला न सके
जानकारी ही सबसे बड़ी ताकत है। जो नागरिक अपने कानूनी अधिकार जानता है, उसे कोई आसानी से नहीं डरा सकता।
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Faqs
Q1 भारतीय दंड संहिता में धारा 18 से 28 क्यों महत्वपूर्ण हैं?
Q2 लोक सेवक कौन होता है और धारा 21 क्या कहती है?
Q3 चल संपत्ति और अचल संपत्ति में क्या फर्क है?
Q4 अगर कोई मेरे साथ जाली दस्तावेज़ से धोखा करे तो कौन सी धारा लगेगी?
Q5 अगर किसी ने मेरी गैरकानूनी चीज़ अपने घर रख ली तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी?
Q6 भारतीय दंड संहिता कब से लागू है और क्या यह अब भी वैसी ही है?
निष्कर्ष:
कानून को समझना हर नागरिक का अधिकार भी है और कर्तव्य भी। धारा 18 से 28 तक की यह परिभाषाएँ भले ही शुरुआत में उबाऊ लगें, लेकिन असल में यही वो नींव हैं जिन पर पूरी न्याय व्यवस्था खड़ी है।
न्यायाधीश कौन है, लोक सेवक कौन है, चल संपत्ति क्या है, कपट क्या है, बेईमानी क्या है... यह सब जानना आपको एक जागरूक नागरिक बनाता है।
और जागरूक नागरिक ही एक मज़बूत देश की पहचान होता है।
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