Ramesh Kumar
Ramesh Kumar· 5 years ago
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कन्यादान का मतलब क्या होता है ?

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Answered on01/14/22

* कन्यादान एक ऐसा दान होता है जो एक पिता अपनी बेटी की शादी के समय उसके पति के ऊपर उसका हाथ रखकर दान करता है ताकि उसका पति उसका हमेशा ख्याल रखें ! कन्यादान करना माता पिता के लिए एक सौभाग्य की बात होती है !यह दान सभी दानों से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ! हमारे हिंदू धर्म में रीति रिवाज के द्वारा जब बेटी की शादी होती है तब बेटी का कन्यादान करते हैं इसका मतलब यह होता है कि आज से उनकी बेटी किसी और की हो गई है !Article image

preeti  patel
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Answered on01/14/22

हिंदू धर्म में रीति रिवाजों के अनुसार हर पिता अपनी बेटी के शादी में कन्यादान करता है इसका मतलब यह होता है कि पिता जब कन्यादान लेते हैं तो अपने पुत्री का हाथ वर के हाथ में सौंप देते हैं ताकि उनकी बेटी का हाथ उनके पति कभी ना छोड़े हमेशा साथ दें। और कन्यादान करना हर माता-पिता के लिए सौभाग्य की बात होती है। कन्यादान की रस्म हर राज्य में अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से निभाई जाती है। और जो माता पिता अपनी बेटी का कन्यादान कर लेते हैं उनका पूरा जीवन सफल हो जाता है और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है.।Article image

Aanchal Singh
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Answered on01/13/22

हमारे हिंदू परंपरा में ऐसे कई रीति रिवाज होते हैं जो सदियों से चली आ रही है उन्हीं में से एक रिवाज है कन्यादान, कन्यादान एक महादान होता है हिंदू धर्म में की गई शादियों मे कन्यादान का बहुत बड़ा महत्व होता है बिना कन्यादान किए शादी पूर्ण नहीं होती है कन्यादान का मतलब होता है कन्या काम करना जब किसी लड़की की शादी होती है तो उसके पिता वर के हाथों में अपने कन्या का हाथ रखता है और उसे हमेशा के लिए अपनी कन्या को दान कर देता है कन्यादान करना हर माता-पिता का बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। कहते हैं जिस माता-पिता को कन्यादान करने को मिलता है उसे सीधा स्वर्ग मिलता है।कन्यादान की रस्म हर राज्यों में अलग अलग तरीके से की जाती है।

यह भी पढ़े- अक्ष से क्या अभिप्राय है?

Letsdiskuss

Krishna Patel
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Answered on09/26/21


हिन्दू परम्परा के अनुसार कन्यादान को महादान मानते है। हिन्दू धर्म मे ज़ब भी विवाह होता है,तो कन्यादान ऐसी रस्म होती है जिसके बिना शादी अधुरी मानी जाती है। कन्यादान का एक बहुत ही विशेष महत्व होता है, विवाह मे बहुत से रस्मे होती है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण रस्म कन्यादान की होती है। कन्यादान का अर्थ होता है कि विवाह के समय कन्या का दान करना। कन्या का दान सबसे बड़ा दान होता है।विवाह के समय ज़ब एक पिता अपनी बेटी का हाथ सारी रस्मे रीति -रिवाजो के साथ वर के हाथ मे सौपता है और हाथ जोड़ कर लडके से एक पिता से कहता है कि मैंने इतने सालो से अपनी बेटी को पाला उसकी सारी जिम्मेदारी निभाया और उसकी हर एक छोटी बड़ी ख़ुशी का ख्याल रखा उसको पढ़ाया लिखाया सब कुछ लेकिन आज अपने जीवन सबसे कीमती धन अपनी बेटी को आपको हाथ मे सौपने जा रहा हु,और हर एक पिता लडके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा रहता है ताकि उसकी बेटी कोई दुःख ना मिले उसके ससुराल मे लेकिन उस वक़्त हर एक लड़का यही वचन देता है कि पापा जी परेशान मत होये आपकी बेटी पूरा ख्याल रखूँगा लेकिन समय आने पर बदल जाते है।

हमारे देश विवाह के समय सात फेरे होते है उन मे से 4 फेरे मे लड़का आगे चलता है और हर एक फेरे मे अपनी पत्नी के साथ देने का वचन देता है और तीन फेरो मे लड़की पीछे रहती है और हर सुख दुःख मे अपने पति के साथ जीवन भर साथ देने और साथ रहने का वचन देती है।और सभी रीति -रिवाजो के साथ वर - वधु मांग सिंदूर भरता है तथा गले मे मंगलसूत्र बांधता है और पति - पत्नी के रूप मे एक -दूसरे को स्वीकार करते है। सभी बड़े के पैर छू कर आशीर्वाद लेते है।

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यह शादी लडके -लड़कियो के बीच नहीं होती है ,यह दो परिवरों के बीच प्रेम का अटूट रिश्ता होता है लेकिन आज के समय मे रिश्तो की कोई आहमियत नहीं होती सिर्फ लोग पैसे की आहमियत समझते है उनको सिर्फ पैसा से मतलब होता है।


क्योंकि आज समय मे शादी के समय उन सात फेरो और एक पिता को कन्यादान करते वक़्त दिए हुए वचन कोई क़ीमत नहीं होती है। क्योंकि पैसे सामने अंधे हो कर लड़का अपने माँ -बाप कहने पर अपनी पत्नी को दहेज़ के लिए उसके ऊपर शोषण जरूर करता है, क्योंकि वह अपने माँ -बाप किसी बात को इनकार नहीं कर सकता है। लेकिन कभी एक लड़का ये नहीं सोचता है वो भी किसी लड़की है शादी मे कन्यादान के समय उसके पिता वचन दिया था कि उसके आँखों कभी आंसू नहीं आने दूंगा सारी जिम्मेदारियां निभाऊँगा इस बात कैसे मुखर गया। मेरी भी बहन है कल के लिए उसके साथ भी उसके ससुराल मे यही अत्याचार होगा तब क्या होगा यदि हर एक लड़का यही सोचने लगे तो किसी भी लड़की के बाप को विवाह के सामने हाथ जोड़कर अपनी बेटी के लिए भीख ना मानना पड़े।

S
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Updated on05/20/26

हिन्दू धर्म में सभी ग्रहो को देव माना जाता है और सभी का अपना एक स्थान है | जितने भी ग्रह हिन्दू धर्म मे है उनका अपना अपना प्रकोप व फायदा है | ये ग्रह मानव जीवन मे उनके जन्म के साथ ही जुड़ जाते है | अब वो अच्छे है या बुरे ये उन ग्रहो की स्तिथि पर निर्भर होता है | आपके ग्रह व सितारे ही आपके वर्तमान व भविष्य तय करते है |

वैसे तो सभी ग्रह अपने आप मे महत्व रखते है परन्तु सबसे महत्वपूर्ण ग्रह शनि को माना जाता है | शनि का नाम आते ही लोगो के मन मे डर बैठ जाता है | पर उसके बाद भी लोग उसका उपाय नहीं करते वो अपनी लाइफ मे इतना व्यस्त होते है के उनको समय नहीं मिलता | परन्तु अगर उनकी लाइफ मे कुछ बुरा होता है तो वो भगवन को दोषी मानते है | शनि दोष भी कुंडली मिलाप में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह जन्म के समय शनि की स्थिति पर निर्भर करता है।

शनि के प्रकोप से कैसे बचे :-

1 . शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उनके इस श्लोक का जाप करे जिनमे उनके 10 नाम शामिल हो जाते है |

"कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।

सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।"

2 . सुबह सूर्योदय से पूर्व पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाए और सरसो के तेल का दिया लगाए |

3 . शाम सूर्य अस्त होने के बाद पीपल के पेड़ पर सरसो तेल का दिया जलाए |

4 . पुरुष वर्ग शनि देव के मंदिर जाकर उन पर सरसो तेल चढ़ा सकते है | परन्तु महिलाओ को ये अनुमति नहीं है |

5. शनिवार के दिन कुष्ट रोगियों को भोजन करवाए और काली दाल व सरसो तेल दान दे |

6. काले घोड़े की नाल की अंगूठी बना कर पहने |

7. मंगलवार हनुमान जी के सामने तिल के तेल का दिया जलने से भी शनि का प्रकोप काम होता है |

सावधानी :-

" एक बात का विशेष ध्यान दे शनि देव का पूजन केवल सूर्योदय से पहले और सूर्य अस्त के बाद ही करे ,ऐसा करने से शनि देव का प्रकोप आपकी राशि से कम हो जाएगा और आपको लाभ मिलेगा "

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Answered on09/25/21

हिंदू परंपरा में, कई रस्में और रीति-रिवाज हैं जो एक शादी में शामिल होते हैं। जहां दूल्हे को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, वहीं दुल्हन को धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इसलिए, बेटी को विदा करना (या कन्यादान) एक भारतीय शादी में दुल्हन के माता-पिता के लिए एक बहुत ही भावनात्मक और साथ ही धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण कार्य है।

यह हर शादी में एक ऐसा क्षण होता है जो भावनाओं से भरा होता है, क्योंकि पिता अपनी प्यारी बेटी को दूसरे पुरुष, उसके पति की देखभाल में जीवन भर के लिए त्याग कर अंतिम बलिदान देता है। पारंपरिक भारतीय विवाह के कन्यादान समारोह के पीछे भावनात्मक और धार्मिक महत्व की यात्रा पर ले जाते समय हमारे साथ आइए।

कन्यादान शब्द ही दो शब्दों का अर्थ है: कन्या जिसका अर्थ है बेटी और दान का अर्थ है दान या देना। इसका मतलब अपने आप में अपनी बेटी को देना है। ऐसा कहा जाता है कि वेदों में कन्यादान की अवधारणा का कोई उल्लेख नहीं है। वैदिक युग ने तर्क दिया कि जब शादी की बात आती है तो एक महिला की सहमति बहुत महत्वपूर्ण होती है और शादी का अंतिम निर्णय होने वाले दूल्हा और दुल्हन दोनों की अवधारणा के साथ आया।

हालाँकि, अनुष्ठानों का भी विकास होना शुरू हो गया और इस तरह कन्यादान की अवधारणा चलन में आने लगी। क्या आप जानते हैं, मनु स्मृति के अनुसार, कन्यादान सबसे बड़ा उपहार है, जिसे अक्सर किसी भी परिवार के व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा जाता है? अनुष्ठान एक भावनात्मक ओवरडोज में पैक होते हैं और अक्सर आंसुओं की भारी बारिश के साथ समाप्त होते हैं।

यह समझने के लिए कि कन्यादान भावनात्मक रूप से इतना आवेशित क्यों है, यह समझना महत्वपूर्ण है कि एक पिता अपनी बेटी के लिए कैसा महसूस करता है। यह कुछ ऐसा है जो भारत के लिए अद्वितीय नहीं है, क्योंकि यह एक वैश्विक भावना है कि पिता अपनी बेटियों के साथ एक विशेष बंधन साझा करते हैं जबकि माताओं और उनके बेटों के बीच घनिष्ठ संबंध होता है। यहां तक ​​​​कि सबसे अधिक स्वामित्व और कठोर पिता भी अपनी बेटी की प्यारी मुस्कान के नीचे पिघल जाने के लिए जाने जाते हैं। वही अनुभव करें?

पिता अपनी छोटी बच्चियों को अपनी सबसे बेशकीमती संपत्ति मानते हैं और उनकी परवरिश में बहुत ध्यान रखते हैं। वो भी तो हैं जो उसे जीवन भर लाड़-प्यार करते हैं, माँ की डाँट के बावजूद उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं! उनका बंधन इतना करीब है, कि उसे किसी और को सौंपने का विचार मात्र दिल दहला देने वाला हो सकता है। हालाँकि, यह जीवन का एक तथ्य है कि प्रत्येक भारतीय विवाह में कन्यादान अवश्य होता है।

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