कबीर दास के दोहे क्यों हो मशहूर हुए दरअसल कबीर दास के दोहे आमजन के दिल को छू जाती थी। अपने समय में आम जन के तकलीफों को समझने वाले कबीर के दोहे उनके लिए मरहम का कार्य करता था। सामाजिक अंधविश्वास और रूढ़ियों के खिलाफ उनका कविता लेखन आज के समाज में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। उनका प्रामाणिक ग्रंथ बीजक है जिसमें उनके कई ऐसी काव्य रचनाएं समाहित है जो आज के समय में मशहूर है उसके बारे में एक-एक करके मैं इस उत्तर में आपके समक्ष रखता हूं तब आप समझ पाएंगे कि निश्चित ही कबीर के दोहे आज भी क्यों प्रासंगिक है।
कबीर जी और उनकी प्रमुख रचनाओं पर एक विश्लेषण
हिंदी के महान कवियों में कबीर जी को भक्ति काल के ज्ञानमार्गी वर्ग के कवियों में रखा जाता है। कबीर दास का जन्म 1398 ईस्वी में काशी में माना जाता है। उन्होंने अपने युग में धार्मिक आडंबर, अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव के बारे में अपनी कविताओं के जरिए निंदा करते थे। समाज को नयी दिशा देने में कबीर जी का योगदान महान है। उनका मनना था कि सच्चा ज्ञान और प्रेम होना इंसान में होना जरूरी है। बीजक नाम के लिखे गए उनके ग्रंथ में यह बात सामने आती है।
आमजन की भाषा में वे बोलते थे और जन-जन की पहचान बन गए कबीर के दोहे
उनके बारे में कहा जाता है कि वह पढ़े लिखे नहीं थे उन्होंने खुद बताया है—"मसि कागद छूओ नहीं, कलम गही नहिं हाथ"।
आपको बता दे कि कबीर जी जब भी कुछ कविता के माध्यम से बोलते थे जन-जन को समझते थे तो उनके शिष्य संत धर्मदास उनकी दोहों को लिख लिया करते थे। इस तरह से धर्मदास द्वारा कबीर के कहे गए दोहे का संकलन बीजक कहलाता है। कबीर जी के विचारों पर चलने वालों के लिए पवित्र ग्रंथ हैं। कबीर जी का मानना है कि केवल शास्त्र पढ़ने से कोई ज्ञानी नहीं बनता। सच्चा ज्ञानी और पंडित वही है जो प्रेम, करुणा और आत्मीयता के वास्तविक अर्थ को समझता है।
सबद का उदाहरण (धार्मिक आडंबर का विरोध)
कबीर जी के एक इस दोहे से हम समझ सकते हैं कि वे मन की पवित्रता को बहुत महत्व देते थे।
"मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में। ना में देवल ना में मस्जिद, ना काबे कैलास में॥"
इसकी सरल व्याख्या यह है कि कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर किसी विशेष मंदिर, मस्जिद या तीर्थ स्थल में नहीं रहता, बल्कि वह तो हर जीव के हृदय में निवास करता है। उसे खोजने के लिए बाहरी दिखावे की जरूरत नहीं है। आज भी उनके ये दोहे लोगों में प्रचलित है।
रमैणी का उदाहरण (दार्शनिक सत्य)
"अंतरि राम राय सब काहू। जाके रूप न रेख न नाऊँ॥"
इस दोहे का मतलब यह है कि ईश्वर निराकार और निर्गुण है। उसका कोई भौतिक आकार, रूप या सीमा नहीं है, फिर भी वह सबमें होता है।
कबीर की जन जन की भाषा (साधुक्कड़ी / पंचमेल खिचड़ी)
कबीर जी ने अपनी वाणी को जन-जन तक पहुँचाने के लिए किसी एक शास्त्रीय भाषा के बजाय आम बोलचाल की भाषा को अपनाया। उनके कविता की भाषा आम लोग की भाषा होती थी। जो सबको समझ में आती थी। वे आम लोगों की भाषा में बात बताते और काव्य दोहा कहते थे।
उनकी सढुक्कड़ी भाषा के कारण लोग उनसे जुड़ते गए: उनकी भाषा में अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, पंजाबी, और अरबी-फारसी के शब्द मिले हुए हैं।
उलटबासियाँ: बीजक में कबीर की कुछ ऐसी उक्तियाँ भी मिलती हैं जो प्रथम दृष्टया विचित्र लगती है। जैसे "एक अम्भा देख्या अद्भुत भाई, पानी में आगि लगी", लेकिन उनके पीछे गहरा रहस्यवादी और दार्शनिक अर्थ छिपा होता है।
आज के समय में उनकी रचना 'बीजक' खास है। कबीर की वाणी 15वीं शताब्दी जितनी ही आज 21वीं सदी में भी लोग को भा रही है।
सांप्रदायिक सौहार्द: बीजक हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के कड़े आडंबरों पर समान रूप से प्रहार करता है और मानवीय एकता पर बल देता है।
जाति-पाति का खंडन: बीजक स्पष्ट घोषणा करता है कि "जाति पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।"
मानवतावाद: यह ग्रंथ कर्मकांडों से ऊपर उठकर सत्य, अहिंसा, दया और भाईचारे को सर्वोच्च धर्म मानता है।
निष्कर्ष
संत कबीरदास जी का 'बीजक' केवल एक धार्मिक या काव्य ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज का एक वैचारिक और सामाजिक क्रान्ति-पत्र है। यह ग्रंथ मनुष्य को बाहरी दिखावे से दूर कर अपने भीतर झाँकने और वास्तविक सत्य को पहचानने की प्रेरणा देता है।
13.9K@abhinavkumar4574
