राधा श्री कृष्ण की सबसे प्रिय हैं और सभी गोपियों में से प्रथम स्थान उनका है इसलिए राधा को आदि गोपी कहा जाता है। गर्ग संहिता में राधा शब्द के अर्थ की महता को प्रकट किया गया है। राधा और श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन सूरदास ने आधुनिक युग में बहुत बढ़िया किया है। बिहार और सच्चाई के दोहे में भी राधा और श्री कृष्ण के सिंगर प्रेम का अद्भुत वर्णन देखने को मिलता है। राधा नाम श्री कृष्ण जी को बहुत प्रिय है।
राधा नाम के वर्ण के अक्षर को अलग-अलग किया जाए तो इस तरह से बनता है - र+ आ+ध+ आ। आइए राधा नाम के इन अक्षरों के बारे में अद्भुत जानकारी प्राप्त करें।
‘र’ = रमा (लक्ष्मी)
‘आ’= आदि गोपीका** (मूल/प्रथम गोपी)
'ध’ = धरा (भूदेवी)
‘आ’ = विरजा नदी (यमुना)

इसी वजह से राधा नाम में आदि गोपी नाम समाहित होता है। इसके अलावा दूसरे धार्मिक साहित्यिक आधार को भी देखा जाए तो आदि गोपी के बारे में कहा जाता है कि राधा बृज की गोपियों में सबसे श्रेष्ठ और मुख्य थी इसलिए उन्हें आदि गोपी कहा जाता है। कृष्ण की परपरी और हृदय में बसने वाली राधा है इसलिए उन्हें आदि गोपी कहा जाता है। दूसरा कारण है कि राधा ही सभी गोपियों का विस्तार है इसलिए उन्हें आदि गोपी कहा जाता है। भागवत पुराण में भी राधा को आदि गोपी राधा के नाम से संकेत मिलता है।
राधा ब्रिज की प्रमुख गोपियों के रूप में मानी जाती हैं
राधा ब्रज की गोपियों में सर्वश्रेष्ठ और मुखिया मानी जाती हैं। वे कृष्ण की परम प्रिया, ह्लादिनी शक्ति (आनंद-शक्ति) और गोलोक-वृंदावन की रानी हैं।
इसके अलावा गौड़ीय वैष्णव परंपरा और ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि ग्रंथों में कहा गया है कि सभी गोपियाँ राधा से उत्पन्न है उनका विस्तार रूप है। राधा ही मूल रूप गोपियों का है।
जयदेव के गीत गोविंद और बाद में भक्ति साहित्य के परंपरा में मुख्य गोपी के रूप में राधा स्थापित हैं। सूरदास के साहित्य में राधा का नाम मुख्य गोपियों के रूप में आता है जबकि सतसई और बिहारी के दोहे में भी राधा का नाम मुख्य गोपियों के रूप में प्रस्तुत होता है।
अलग-अलग धार्मिक ग्रंथो और साहित्य में मुख्य गोपियों के रूप में राधा के नाम का वर्णन मिलता है। राधा श्री कृष्ण की प्रिया है और सभी गोपियों के आधार स्रोत के रूप में भी मानी जाती है। राधा बिना कृष्ण और कृष्णा बिना राधा अधूरी हैं। समस्त गोपियों के आधार के रूप में मुख्य तौर पर राधा का नाम आता है।



