मेरे हिसाब से, अगर दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को चुना होता और उनकी नारायणी सेना की बजाय खुद उनका साथ लिया होता, तब भी जीत पक्की नहीं थी—बल्कि शायद हालात ज़्यादा दिलचस्प हो जाते।
क्योंकि श्रीकृष्ण ने पहले ही साफ कहा था कि वो युद्ध में हथियार नहीं उठाएंगे। यानी दुर्योधन को उनकी सेना तो नहीं मिलती, और श्रीकृष्ण सिर्फ सलाहकार या सारथी के रूप में होते—जैसे वो अर्जुन के साथ थे।
अब असली बात ये है कि श्रीकृष्ण सिर्फ ताकत नहीं थे, बल्कि धर्म (सही पक्ष) के साथ खड़े थे। दुर्योधन का पक्ष अधर्म माना जाता है, इसलिए भले ही श्रीकृष्ण उसके साथ होते, वो उसे सही रास्ता अपनाने की सलाह देते—जैसे शांति या समझौता।
मुझे लगता है कि या तो दुर्योधन उनकी बात मानकर युद्ध टाल देता, या अगर नहीं मानता, तो श्रीकृष्ण उसके साथ रहते हुए भी उसे जीत दिलाने के लिए कोई “अधर्म वाला रास्ता” नहीं अपनाते।





