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Rohit Valiyan· 8 साल पहले
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क्या शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार है ?

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अपडेट किया गया10/23/26

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आंशिक रूप से, हाँ। शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी की अकेली वजह नहीं है, पर इसकी बड़ी हिस्सेदार जरूर है। डिग्री बाँटने की रफ्तार और उद्योग की जरूरत के बीच का फासला इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। दूसरा हिस्सा नौकरियों की कमी है, जिसे कोई पाठ्यक्रम ठीक नहीं कर सकता।

आज की तस्वीर: आंकड़े क्या कहते हैं

10 अगस्त 2026 को जारी PLFS की ताज़ा तिमाही रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल–जून 2026 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की कुल बेरोजगारी दर 5.4% रही, जबकि 15–29 वर्ष के युवाओं में यह दर 15.9% थी। यानी कुल दर देखकर चैन से बैठना गलत होगा। policyedge

पढ़ाई जितनी ज्यादा, बेरोजगारी का जोखिम उतना ज्यादा। ILO की इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 के अनुसार 2022 में स्नातक युवाओं की बेरोजगारी दर 29.1% थी, जबकि निरक्षर लोगों में यह सिर्फ 3.4% थी। इसी रिपोर्ट में दिखा कि बेरोजगार युवाओं में माध्यमिक या उससे ऊपर पढ़े लोगों का हिस्सा 2000 के 35.2% से बढ़कर 2022 में 65.7% हो गया। thewirepeoplematters

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की State of Working India 2026 के हवाले से एक रिपोर्ट बताती है कि 2023 में 20-29 साल के लगभग 6.3 करोड़ स्नातकों में से करीब 1.1 करोड़ बेरोजगार थे। उसी रिपोर्ट के अनुसार एक साल के भीतर 7% से कम पुरुष स्नातकों को स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। superkalamsuperkalam

शिक्षा प्रणाली की गलती कहाँ है

सीधी बात यह है कि कई कॉलेज परीक्षा पास कराना सिखाते हैं, काम करना नहीं। इसके तीन ठोस कारण हैं:

  • रटंत पर जोर। याद करके लिखने में नंबर मिलते हैं, पर समस्या सुलझाना, लिखकर समझाना और टीम में काम करना कम ही सिखाया जाता है।

  • पुराना पाठ्यक्रम। सिलेबस बदलने में सालों लगते हैं, जबकि उद्योग में टूल हर साल बदल जाते हैं।

  • प्रैक्टिकल अनुभव की कमी। इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और लाइव प्रोजेक्ट अब भी अपवाद हैं, नियम नहीं।

इसका असर स्ट्रीम-वार दिखता है। India Skills Report 2026 में कंप्यूटर साइंस और IT इंजीनियरों की रोजगार-योग्यता लगभग 80% रही, जबकि पॉलिटेक्निक डिप्लोमा धारकों की सिर्फ 32.92%। एक ही देश में इतना बड़ा अंतर बताता है कि समस्या "पढ़ाई" की नहीं, "कैसी पढ़ाई" की है। careers360

लेकिन पूरा दोष शिक्षा पर डालना भी गलत है

यही वह हिस्सा है जो ज्यादातर लेख छोड़ देते हैं। मान लीजिए हर स्नातक को सबसे अच्छी ट्रेनिंग मिल जाए, तब भी नौकरियाँ कहाँ हैं?

ILO रिपोर्ट के अनुसार लगभग 90% कामगार अनौपचारिक रोजगार में हैं। एक तरफ अच्छी तनख्वाह वाली औपचारिक नौकरियाँ सीमित हैं, दूसरी तरफ हर साल लाखों नए युवा बाजार में आते हैं। ऐसे में बेहतर कौशल वाला भी कतार में खड़ा रह सकता है। drishtiias

एक और बात। India Skills Report एक इंडस्ट्री-समर्थित टेस्ट पर आधारित है। इसमें रोजगार-योग्यता 2026 में 56.35% बताई गई। पर यह टेस्ट स्कोर है, बेरोजगारी दर नहीं। एक विश्लेषण ने भी यही फर्क रेखांकित किया कि रोजगार-योग्यता बढ़ने के बावजूद स्नातक बेरोजगारी बढ़ सकती है। दोनों अलग पैमाने हैं, इसलिए इन्हें मिलाकर नतीजा निकालना ठीक नहीं। affairscloudraysolute

एक आसान कसौटी: तीन सवालों का टेस्ट

किसी भी बेरोजगारी की वजह परखने के लिए मैं यह तीन-सवाल वाला तरीका सुझाता हूँ:

सवालअगर जवाब "नहीं" हैजिम्मेदार कौनक्या नौकरियाँ पर्याप्त हैं?नौकरी का संकटअर्थव्यवस्था और नीतिक्या उम्मीदवार के पास मांगा गया कौशल है?कौशल का संकटशिक्षा प्रणालीक्या उम्मीदवार को सही नौकरी की जानकारी और पहुँच है?मैचिंग का संकटप्लेसमेंट, नेटवर्क, सूचना

भारत में तीनों संकट साथ-साथ चल रहे हैं। इसीलिए "सिर्फ शिक्षा दोषी है" या "शिक्षा बिल्कुल दोषी नहीं" जैसे जवाब अधूरे हैं।

आप क्या कर सकते हैं (व्यावहारिक सुझाव)

अगर आप छात्र हैं या अभिभावक, तो सिस्टम बदलने का इंतज़ार किए बिना ये काम शुरू कर सकते हैं:

  1. डिग्री के साथ एक प्रमाणित कौशल जोड़ें। डेटा विश्लेषण, डिजिटल मार्केटिंग, अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर या कोई ट्रेड स्किल।

  2. पहले साल से इंटर्नशिप खोजें। छोटी और बिना वेतन वाली भी चलेगी। रिज्यूमे में असली काम की एक लाइन भी बहुत फर्क डालती है।

  3. प्रोजेक्ट बनाकर दिखाएँ। कोड, डिजाइन, रिपोर्ट या कोई छोटा बिजनेस। इंटरव्यू में सबूत डिग्री से ज्यादा बोलता है।

  4. कोर्स चुनने से पहले नौकरी के विज्ञापन पढ़ें। देखें कि कंपनियाँ असल में क्या माँग रही हैं।

  5. सरकारी तैयारी का बैकअप रखें। सिर्फ एक परीक्षा पर चार-पाँच साल लगाना जोखिम भरा है।

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ऊपर दिए गए सवाल का जवाब
जवाब दिया गया10/17/26

आज के समय में बेरोजगारी भारत की प्रमुख समस्याओं में से एक है। हर साल लाखों विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं, लेकिन उनमें से कई को अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार नहीं मिल पाता। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारी शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार है? इसका जवाब समझने के लिए शिक्षा व्यवस्था, रोजगार के अवसरों और युवाओं के कौशल पर ध्यान देना जरूरी है।

1. शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन और कामकाज के लिए तैयार करना भी है। लेकिन कई बार पढ़ाई में सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक ध्यान दिया जाता है और व्यावहारिक अनुभव को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। इसके कारण विद्यार्थी डिग्री तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन नौकरी में जरूरी कौशल की कमी महसूस करते हैं।

2. व्यावहारिक ज्ञान की कमी

आज कई क्षेत्रों में कंपनियाँ ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं, जिन्हें अपने विषय का ज्ञान होने के साथ-साथ उसे वास्तविक परिस्थितियों में लागू करना भी आता हो। इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट, तकनीकी प्रशिक्षण और कार्य अनुभव की कमी विद्यार्थियों के लिए नौकरी पाना कठिन बना सकती है।

यदि स्कूल और कॉलेज व्यावहारिक शिक्षा को अधिक महत्व दें, तो विद्यार्थियों को रोजगार के लिए बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकता है।

3. कौशल विकास पर कम ध्यान

बदलती तकनीक और आधुनिक उद्योगों के कारण रोजगार के लिए आवश्यक कौशल भी बदल रहे हैं। कंप्यूटर ज्ञान, संचार कौशल, समस्या समाधान, डिजिटल तकनीक और व्यावसायिक प्रशिक्षण कई नौकरियों में महत्वपूर्ण हैं।

यदि शिक्षा प्रणाली समय के साथ अपने पाठ्यक्रम को अपडेट नहीं करती, तो विद्यार्थियों के कौशल और बाजार की जरूरतों के बीच अंतर बढ़ सकता है।

4. केवल सरकारी नौकरी पर निर्भरता

कई युवा सरकारी नौकरी को ही सुरक्षित और बेहतर करियर का विकल्प मानते हैं। इसके कारण वे लंबे समय तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहते हैं और दूसरे क्षेत्रों में उपलब्ध अवसरों पर कम ध्यान देते हैं।

हालाँकि, सरकारी नौकरी की इच्छा रखना गलत नहीं है, लेकिन निजी क्षेत्र, स्वरोजगार, उद्यमिता और व्यावसायिक कार्यों जैसे विकल्पों के बारे में भी जागरूकता जरूरी है।

5. क्या केवल शिक्षा प्रणाली ही जिम्मेदार है?

बेरोजगारी के लिए केवल शिक्षा प्रणाली को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। इसके पीछे कई अन्य कारण भी हैं, जैसे:

  • रोजगार के अवसरों की कमी: सभी योग्य उम्मीदवारों के लिए पर्याप्त नौकरियाँ उपलब्ध नहीं होतीं।

  • जनसंख्या और श्रमबल में वृद्धि: नौकरी तलाशने वाले लोगों की संख्या बढ़ने से प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

  • आर्थिक परिस्थितियाँ: आर्थिक मंदी या उद्योगों में धीमी वृद्धि के कारण भर्ती कम हो सकती है।

  • क्षेत्रीय असमानता: कुछ क्षेत्रों में रोजगार के अवसर अधिक होते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में सीमित।

  • कौशल और उद्योग की जरूरतों में अंतर: उम्मीदवारों के कौशल हमेशा नियोक्ताओं की अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते।

इसलिए बेरोजगारी एक बहुआयामी समस्या है, जिसका समाधान केवल शिक्षा में बदलाव करके नहीं किया जा सकता।

6. बेरोजगारी कम करने के लिए क्या सुधार जरूरी हैं?

शिक्षा प्रणाली को रोजगार की जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं:

  1. व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देना: पढ़ाई के साथ प्रोजेक्ट, प्रयोग और वास्तविक समस्याओं पर काम करने के अवसर दिए जाएँ।

  2. व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना: विद्यार्थियों को तकनीकी और रोजगारपरक कौशल सिखाए जाएँ।

  3. इंटर्नशिप के अवसर बढ़ाना: स्कूल और कॉलेज उद्योगों के साथ मिलकर विद्यार्थियों को कार्य अनुभव दिलाने में मदद करें।

  4. करियर मार्गदर्शन देना: विद्यार्थियों को उनकी रुचि, क्षमता और रोजगार के विकल्पों के बारे में सही जानकारी मिले।

  5. उद्यमिता को प्रोत्साहित करना: युवाओं को व्यवसाय शुरू करने और स्वरोजगार के अवसरों को समझने में सहायता दी जाए।

  6. रोजगार के नए अवसर पैदा करना: सरकार और निजी क्षेत्र को उद्योगों, निवेश और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने की दिशा में काम करना चाहिए।

निष्कर्ष

यह कहना सही नहीं होगा कि शिक्षा प्रणाली ही बेरोजगारी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है, लेकिन इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है। यदि शिक्षा को व्यावहारिक ज्ञान, कौशल विकास और उद्योगों की जरूरतों से जोड़ा जाए, तो युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों का लाभ उठाना आसान हो सकता है।

यह भी पढ़ें: हमारे देश का नाम भारत कैसे पड़ा?

Tara Verma
Ten years in the classroom, shaping minds — bringing the same clarity and purpose to every piece she writes about education.
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Tara Verma is a practising teacher and education content writer with over 10 years of classroom experience across primary and secondary levels. She holds a Master's degree in Education (M.Ed.) from Delhi University and a Bachelor of Education (B.Ed.) from Jamia Millia Islamia — qualifications that ground her writing in both pedagogical theory and the day-to-day realities of teaching in India. Her content covers exam preparation strategies, learning methodologies, curriculum guidance, student mental health, career counselling for students, and the evolving state of school and higher education in India. Her work has appeared on platforms including TeacherVision India, Jagran Josh, and Careers360, where she writes for students, parents, and fellow educators who need content built on actual teaching experience — not theory alone. Over a decade of working directly with students across age groups and learning levels has given Tara a practical understanding of how education content should be written — clearly, accessibly, and with genuine awareness of the challenges students and teachers face on the ground. She has taught 1,000+ students, contributed to school curriculum development initiatives, and published 250+ articles on education across digital platforms. She is an active member of the National Council of Teachers of English (NCTE) India. Across all her writing, every recommendation is classroom-tested, every insight comes from direct teaching experience, and every article is held to the same standard she applies in her own classroom — accuracy, clarity, and genuine usefulness for the reader.

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अपडेट किया गया10/22/26

लेख की तस्वीर

आपने पूछा कि क्या शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार है तो इसका उत्तर यह है कि शिक्षा प्रणाली भी थोड़ा बहुत जिम्मेदार है और आज के समाज की सोच भी जिम्मेदार है।

दरअसल आज की शिक्षा प्रणाली में कौशल शिक्षा यानी स्किल वाली शिक्षा पर उतर ध्यान नहीं दिया जाता है जितना जरूरत है। लेकिन नई शिक्षा नीति में इसमें ध्यान देने की बात कही गई है। वहीं दूसरी बात बता दे कि आज सभी लोग पढ़ाई को ही महत्व देते हैं जबकि कोई काम सीखना या कुशलता पर उतना महत्व नहीं देते इस कारण से ही बेरोजगारी भी बड़ी है।

पढ़ाई के साथ-साथ स्किल सीखना भी जरूरी

पढ़ाई के साथ-साथ आधुनिक स्किल भी सिखाना जरूरी हो जाता है इसके साथ ही हमें ट्रेडिशनल स्किल भी सीखना चाहिए जिससे कि रोजगार मिलने की संभावना ज्यादा हो जाती है।

आज के समय में कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ज्ञान भी जरूरी है जिसके बल पर रोजगार पाना आसान हो जाता है।

परंपरागत स्किल्स (Traditional Skills)

  • ​हस्तशिल्प और कला: मिट्टी के बर्तन बनाना (पॉटरी), बुनाई (Weaving), कढ़ाई-बुनाई और ब्लॉक प्रिंटिंग।

  • ​लकड़ी और धातु का काम: बढ़ईगीरी (Carpentry), लोहारी और पारंपरिक आभूषण बनाना।

  • ​कृषि और बागवानी: पारंपरिक खेती के तरीके, पशुपालन और घरेलू उपचार (आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की समझ)।

  • ​पारंपरिक कलाएं: लोक नृत्य, शास्त्रीय संगीत, चित्रकला (जैसे मधुबनी, वर्ली) और पाककला (पारंपरिक व्यंजन बनाना)।

​आधुनिक स्किल्स (Modern Skills)

  • टेक्नोलॉजी और कोडिंग: पाइथन, जावा जैसी प्रोग्रामिंग भाषाएं, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और वेबसाइट डिजाइनिंग।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा: मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स और एआई टूल्स का उपयोग।

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स्वरोजगार पर ध्यान ना देना

अगर शुरू से स्वरोजगार की तरफ उन्हें प्रेरित किया जाए तो यही छात्र आगे चलकर कई लोगों को अपने नए स्टार्टअप में जॉब देने वाले बन सकते हैं।

कैसे हो सकता है सुधार

सबसे पहले बुनियादी शिक्षा में कुशलता वाली शिक्षा बच्चों में देना शुरू कर देना चाहिए। बच्चों को बागवानी, कार्पेंट्री, मशीन को बनाने और मरम्मत करने की ट्रेनिंग शुरुआत से देनी चाहिए। इसके साथ योग और खेल की शिक्षा भी उन्हें शुरू से देना चाहिए जिससे कि वह इसे करियर के तौर पर बना सके। कोई काम छोटा नहीं होता है। हाथ से किए जाने वाले काम भी बहुत जरूरी होता है।

मेरा मानना है कि आज के दौर में अच्छे प्लंबर, अच्छे मैकेनिक और अच्छे कारीगर मिलना बहुत मुश्किल है। इन कुशलताओं की ट्रेनिंग अगर स्कूलों में कौशल प्रशिक्षण के तौर पर दिया जाए तो यकीनन बेरोजगारी खत्म हो सकती है।

भारत सरकार की NEP pdf रिपोर्ट पढ़िए

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के आधिकारिक पीडीएफ (PDF) दस्तावेज में कारपेंट्री, पोट्री और अन्य व्यावसायिक कौशलों (Vocational Crafts) को मिडिल स्टेज (कक्षा 6 से 8) में शामिल किए जाने का उल्लेख पेज नंबर 23 (Chapter 4, Para 4.26) पर दिया गया है।

​

https://static.pib.gov.in/WriteReadData/userfiles/NEP_Final_English_0.pdf?hl=hi-IN

World Economic Forum (WEF) रिपोर्ट: भविष्य की नौकरियों और स्किल्स के विश्लेषण के लिए WEF Future of Jobs Report पढ़ें।

https://www.weforum.org/publications/the-future-of-jobs-report-2023/4-skills-outlook?hl=hi-IN

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Abhishek kant
knowledge education is most important for our life.
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Abhishek Kant Educator | Journalist | Writer About Me / परिचय Master of Journalism & Mass Communication (MJMC) degree holder with extensive experience in journalism, teaching, and content writing. Passionate about sharing knowledge, telling impactful stories, and inspiring others through meaningful content. मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री के साथ पत्रकारिता, अध्यापन और कंटेंट राइटिंग का समृद्ध अनुभव। अपने लेखन और शिक्षण के माध्यम से लोगों तक सही जानकारी और विचार साझा करना ही मेरी प्रेरणा है।

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जवाब दिया गया04/04/23

जी हाँ बिल्कुल शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार है क्योकि आज के समय शिक्षा एक तरह से व्यापार बनता जा रहा है, सरकारी स्कूलो मे बच्चो क़ो उचित शिक्षा नहीं दी जाती है शिक्षक स्कूल मे आते है और रजिस्टर मे उपस्थित होने की हज़ारी लगाकर स्टाप रूम मे बैठे रहते है, बच्चो क़ो पढ़ाने के लिए क्लास रुम नहीं जाते है, ऐसे मे बच्चो क़ो उचित शिक्षा नहीं मिल पाती है और बच्चो के अशिक्षित होने की वजह से उन्हें किसी तरह की कोई नौकरी नहीं मिलती है और वह बेरोजगार हो जाते है।Letsdiskuss

और पढ़े- बेरोजगारी की समस्या को कैसे ठीक करें?

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अपडेट किया गया12/23/25

डॉ.साराभाई का जन्म गुजरात राज्य के अहमदाबाद में सन 1919 ईस्वी में हुआ था | उनके

पिता का नाम अंबालाल साराभाई था | जो अपने युग के एक प्रमुख उद्योगपति माने जाते थे |

रचनात्मक शिक्षा पर बल देने वाले इस पिता द्वारा स्थापित विद्यालय में ही डॉक्टर विक्रम

साराभाई की आरंभिक शिक्षा हुई | मैट्रिक करने के बाद उच्च शिक्षा पाने इंग्लैंड चले गए, 1947

ईस्वी में कैंब्रिज से डाक्टरेट प्राप्त की । उन्होंने यह अनुसंधान कार्य ‘कॉस्मिक किरणें’ विषय

पर किया था | भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान का कार्यारम्भ डॉक्टर विक्रम साराभाई की

क्रियाशीलता का ही परिणाम माना जाता है।

भारतीय शिक्षा प्रणालीः

भारतीय शिक्षा प्रणाली को सार्थक बनाने के लिए डॉक्टर साराभाई के सुझावः

  • शिक्षा का आधार प्रयोग एवं अनुभव होना चाहिए।
  • गांधी जी के बताए बुनियादी शिक्षा को अपनाया जाए।
  • पारस्परिक सहयोग - वृत्ति को बढ़ावा दिया जाए।
  • सहकारी एवं संयुक्त प्रयोगशाला में स्थापित कर प्रयोग में लाई जाएं।
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जवाब दिया गया10/11/18

हम कह सकते हैं कि शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी के लिए ज़िम्मेदार है, परन्तु जब भारत में बेरोजगारी की बात आती है तो यह एकमात्र कारण नहीं है। भारत में बेरोजगारी के दो प्रमुख कारण हैं: 1) नौकरी तलाशने वालों में पर्याप्त गुण नहीं है 2) नौकरी तलाशने वालों की योग्यता से मेल खाने के लिए नौकरियों की कमी है |

जब पहला बिंदु पूर्व-प्रभावशाली होता है, तो यह हमारी शिक्षा प्रणाली की गलती है, लेकिन जब दूसरी बात अर्थव्यवस्था में हावी होती है, तो कई अन्य चीजें भी जिम्मेदार होती हैं। भारत में, हमें बीच में कहीं भी बसना है, क्योंकि दोनों कारण यहाँ प्रासंगिक हैं।
भारतीय शिक्षा प्रणाली, हम अच्छी तरह से जानते हैं, मुख्य रूप से कागज़- कलम ज्ञान उन्मुख है। शिक्षित लोगों को हमारे देश के मानव संसाधन के रूप में पैदा करने की प्रक्रिया में शिक्षा का असली अर्थ निश्चित रूप से खो गया है। भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यावहारिकता और रचनात्मकता की कमी है। जब राजनीति स्कूल में सिखाए गए पाठ्यक्रम को प्रभावित कर रही है तो इन दो चीजों को हासिल करना बहुत मुश्किल है।
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हमारी शिक्षा प्रणाली परंपरागत शैक्षणिक तरीकों में फंस गई है जिसके लिए हमें ऑलराउंडर होने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चाहे वह कोई अनुशासन या पेशेवर क्षेत्र हो, कंप्यूटर ज्ञान सबसे बुनियादी आवश्यकता है, जो एक कर्मचारी को भर्ती करने से पहले कंपनी की मांग होती है। फिर भी, हमारी शिक्षा प्रणाली में कंप्यूटर एक वैकल्पिक विषय के रूप में हैं, और अंग्रेजी, एक विदेशी भाषा, जिसका अध्ययन करने के लिए सब बाधित हैं।
इसके अलावा, मूल्यांकन की संरचना रचनात्मक और स्वतंत्र सोच के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती जो कि एक बड़ी कमी है, छात्रों को एक वांछनीय कर्मचारी बनने के लिए प्रतिबंधित किया जाता है |
वांछित कार्यबल योग्यता, रचनात्मकता और प्रतिभा है, जिसमे अक्सर अल्प भुगतान और पर्याप्त अवसरों की कमी होती है। यह शिक्षा प्रणाली की गलती नहीं है, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था की है। शोध से पता चलता है कि मैट्रिक उत्तीर्ण और स्नातक के मुकाबले स्नातकोत्तर में बेरोजगारी अधिक है। यह अधिक आबादी, बीमार बुनियादी ढांचे और अल्प भुगतान के कारण है। इससे हमारे देश में मस्तिष्क और बुद्धि की क्षति भी होती है।
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