हिन्दू धर्म मे मंदिरों का विशेष स्थान है | हर मंदिर कि एक कहानी है जो हमे सनातन धर्म से ओर जोड़ती है | माँ कामाख्या को देवी सती का ही एक रूप माना जाता है तथा उसकी पूजा कि जाती है | पौराणिक कथाओ के अनुसार कहा जाता है कि माता सती ने अपने आप को अग्नि मे देकर आत्मदाह कर दिया था ,जिसे जानकार शिव जी को आहात हुआ ओर माता सती के वियोग मे शिव जी ने क्रोधित होकर माता सती को अपनी गोद मे लेकर प्रलकारी तांडव करना प्रारंभ कर दिया | शिव जी ओर उनके द्वारा किए जा रहे तांडव से पृथ्वी कि अत्यंत दयनीय स्थिति देखकर विष्णु जी अत्यधिक चिंतित होने लगे | उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को काट दिया जिससे माता सती के शरीर के 51 हिस्से हो गए | जिसमे से माता के शरीर का निचला हिस्सा यानि उनकी योनि का भाग एक पहाड़ी पर जा गिरा जो आज असम कि गुहाहाटी कि नीलाचल पहाड़ी कहलाती है | यहाँ देवी के योनि अंग ओर एक जलकुंड कि पूजा कि जाती है | यहाँ देवी कि कोई मूर्ति नहीं है ,यहाँ एक शिला है जिसका आकार योनि जैसा है | यह सबसे शक्तिशाली शक्ति पीठों मे एक माना जाता है |
यह मंदिर तंत्र विद्या ओर साधना के लिए भी जाना जाता है | यहाँ प्रत्येक वर्ष के जून माह मे अंबुवाची मेला लगता है | इस मेले के समय माँ कामाख्या रजस्वला धर्म से होती है ओर मंदिर के पट 3 दिनों के लिए बंद हो जाते है | चौथे दिन पूजा ओर अनुष्ठान होने के बाद भक्तों को दर्शन करने दिए जाते है ओर प्रसाद मे उन्हे लाल रंग से भीगा हुआ कपड़ा दिया जाता है |
कामाख्या नाम - पौराणिक कथाओ के अनुसार कामदेव ने देवताओ के विशेष आग्रह पर शिव कि तपस्या भंग कि थी जिससे क्रोधित होकर शिव जी ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया था | माता रति जो कामदेव कि पत्नी थी उन्होंने भगवान शिव से कामदेव को जीवित करने कि प्रार्थना कि | शिव जी कामदेव को जीवित तो कर दिया परंतु उनका सौन्दर्य , पुरुषार्थ ,उनका तेज सब कुछ नष्ट हो चुका था जिसे पाने के लिए शिव जी ने उन्हे नीलाचल पहाड़ी पर स्थित माता के मंदिर मे तपस्या करने को कहा | कामदेव ने माता कि तपस्या करी ओर अपनी शक्ति पुनः प्राप्त कि | कहा जाता है कि कामदेव कि कहानी से जुड़े होने कि वजह से इस मंदिर का नाम कामाख्या पड़ा |



