
सुबह उठो, खिड़की खोलो और पहली सांस में ही धुएं की बू आए। यह आजकल की हकीकत है। खासकर अगर दिल्ली, मुंबई या कोलकाता जैसे शहरों में रहते हो। नल से पानी आता है, पर पीने से पहले सोचना पड़ता है। बच्चे बाहर खेलने जाते हैं तो गले में खराश लेकर लौटते हैं। यही है प्रदूषण की असली मार जो दिखती भी है और महसूस भी होती है।
अब यह कोई किताबी बात नहीं रही। प्रदूषण सच में जानें ले रहा है। हर साल लाखों लोग प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों से मरते हैं। और जो सबसे तकलीफदेह बात है: इसके जिम्मेदार हम खुद हैं। हाँ, हम।
तो चलो आज इसी पर बात करते हैं। खुलकर। बिना घुमाव-फेरव के।
पहले यह समझो: प्रदूषण है क्या?
बस एक लाइन में कहूँ तो जब हम प्रकृति के बनाए संतुलन को बिगाड़ देते हैं, तो प्रदूषण होता है। हवा में जहर घुल जाता है, पानी गंदा हो जाता है, मिट्टी खराब हो जाती है।
प्रकृति ने सब कुछ एक तरीके से बनाया था। पेड़ हवा साफ करते थे। नदियाँ पानी देती थीं। मिट्टी फसल उगाती थी। सब कुछ एक चक्र में चल रहा था। हमने उस चक्र को तोड़ा। और अब नतीजे भुगत रहे हैं।
दिल्ली को तो दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिना जाने लगा है। यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है। सर्दियों में इतना धुंध होता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है। बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता है। यह कोई अचानक नहीं हुआ। यह हमारी सालों की लापरवाही का नतीजा है।

प्रदूषण के प्रकार: सिर्फ धुआं नहीं होता
लोग सोचते हैं कि प्रदूषण मतलब बस गाड़ियों का धुआं। नहीं यार, यह बहुत बड़ा है। कई तरह का होता है।
वायु प्रदूषण: यह सबसे खतरनाक है। फैक्ट्रियां, गाड़ियां, खेतों में जलाई जाने वाली पराली, सब मिलकर हवा को जहरीला बना देते हैं। सांस लेना मुश्किल हो जाता है। अस्थमा, फेफड़ों की तकलीफ, यह सब इसी से आता है। दिल्ली में AQI जब 400-500 पार करता है तो डॉक्टर कहते हैं कि घर से मत निकलो।
जल प्रदूषण: गंगा को याद करो। कभी कितनी साफ थी। आज? फैक्ट्रियों का कचरा, घरों का गंदा पानी, प्लास्टिक, सब उसी में जा रहा है। यमुना की हालत तो और भी बुरी है। पीने का साफ पानी अब लग्जरी बन गया है।
भूमि प्रदूषण: जो कचरा न जलाया जाता है, न बहाया जाता है, वो ज़मीन पर पड़ा रहता है। उससे मिट्टी खराब होती है। खेती कम होती है। मच्छर-मक्खियां पनपती हैं। बीमारियां फैलती हैं। शहरों के बाहर जाओ तो कूड़े के पहाड़ दिखते हैं। वो देखकर दिल दुखता है।
ध्वनि प्रदूषण: हॉर्न, मशीनें, लाउडस्पीकर, पटाखे। दिमाग को चैन नहीं मिलता। रात को नींद नहीं आती। सिरदर्द रहता है। और धीरे-धीरे सुनाई भी कम देने लगता है। यह भी प्रदूषण है, बस दिखता नहीं है।
प्रकाश प्रदूषण: रात को भी शहरों में अंधेरा नहीं होता। इतनी लाइटें हैं कि नींद का चक्र बिगड़ जाता है। पक्षियों की दिनचर्या गड़बड़ा जाती है। बच्चों को तारे दिखने बंद हो गए हैं। इस बात पर शायद हम हंसते हैं, पर यह सच में एक संकेत है।
रेडियोएक्टिव प्रदूषण: परमाणु परीक्षण, खनन, इनसे निकलने वाले तत्व हवा में मिलते हैं। यह सबसे घातक है। भोपाल गैस त्रासदी याद है? उसका असर पीढ़ियों तक रहा। कैंसर जैसी बीमारियाँ इसी तरह के प्रदूषण से होती हैं।
थर्मल प्रदूषण: फैक्ट्रियां मशीनें ठंडी करने के लिए पानी इस्तेमाल करती हैं और गर्म पानी नदी में छोड़ देती हैं। नदी का तापमान बढ़ता है। मछलियाँ मर जाती हैं। जलीय जीवों की पूरी दुनिया बिगड़ जाती है।
दृश्य प्रदूषण: बड़े-बड़े होर्डिंग, तारों का जाल, कूड़े के ढेर, आंखों को अच्छे नहीं लगते। दिमाग थक जाता है। इसे हम आमतौर पर नजरअंदाज कर देते हैं, पर यह भी तनाव बढ़ाता है।
प्रदूषण के कारण: असल वजह क्या है?

- सच बात यह है कि हम खुद ही इसे बढ़ा रहे हैं। रोज।
- सड़कों पर लाखों गाड़ियां हैं और हर दिन बढ़ रही हैं। मेट्रो है, बस है, फिर भी हर घर में दो-तीन गाड़ियां हैं। फैक्ट्रियां धुआं और रासायनिक कचरा छोड़ती हैं बिना किसी परवाह के। नियम हैं, पर पालन कौन करता है?
- जंगल काटे जा रहे हैं सड़कें बनाने के लिए, इमारतें खड़ी करने के लिए। हर साल हजारों पेड़ जाते हैं। और बदले में कुछ नहीं लगाया जाता। जनसंख्या बढ़ रही है, उतना ही ज्यादा कचरा, उतनी ही ज्यादा मांग, उतना ही ज्यादा दबाव।
- प्लास्टिक हर जगह है। पानी की बोतल से लेकर चिप्स के पैकेट तक। और यह सैकड़ों साल तक गलती नहीं है। कचरा खुले में जलाया जाता है। नदियों में फेंका जाता है।
- गाँवों में किसान खेतों में इतने कीटनाशक डालते हैं कि जमीन और पानी दोनों जहरीले हो रहे हैं। और फिर अम्लीय वर्षा फैक्ट्रियों का धुआं बादलों में मिलता है, बारिश के रूप में वापस आता है और फसलें बर्बाद करता है।
प्रदूषण का परिणाम: यह सिर्फ हवा-पानी की बात नहीं
इंसानों पर: अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर। गंदे पानी से हैजा, टाइफाइड, पेचिश। त्वचा की बीमारियां। आंखों में जलन। बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों के फेफड़े गांव के बच्चों से कमजोर पाए गए हैं। यह कोई अफवाह नहीं, रिसर्च है।
पर्यावरण पर: ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ओजोन परत छीज रही है। बारिश कम हो रही है क्योंकि पेड़ नहीं बचे हैं। समुद्र का पानी बढ़ रहा है। तटीय शहरों के लिए खतरा है। मुंबई का कुछ हिस्सा आने वाले दशकों में पानी में डूब सकता है। यह डरावना है।
जानवरों पर: कई प्रजातियां खत्म होने वाली हैं। मछलियाँ प्रदूषित पानी में जी नहीं पाती हैं। पक्षियों के रहने की जगह खत्म हो रही है। जंगल कम हो रहे हैं, जानवर कहां जाएं?
अगर अभी नहीं रुके तो साफ हवा और पानी सिर्फ किताबों में रह जाएंगे।
क्या करें: कुछ आसान बातें
बदलाव मुश्किल नहीं है। बस शुरुआत करनी है।
- पेड़ लगाओ: एक कटे तो पाँच लगाओ।
- कारपूल करो: अकेले गाड़ी में क्यों जाना?
- प्लास्टिक बैग बंद करो: कपड़े की थैली रखो, हमेशा बैग में।
- पटाखे कम चलाओ: त्योहार मनाओ, पर जरा प्रकृति का ख्याल भी रखो।
- गीला-सूखा कचरा अलग करो।
- मेट्रो या बस लो जब हो सके।
- बिजली बचाओ: बिना मतलब के लाइट और पंखे मत चलाओ।
- बच्चों को भी यह सब सिखाओ, वो ही आगे जाएंगे।
- और हाँ: सरकार से भी मांगो कि कड़े नियम बनें।
- औद्योगिक कचरे का सही निपटान हो।
- जो फैक्ट्रियां नियम तोड़ें उन पर सख्त कार्रवाई हो।
- यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, हमारी भी है।
निष्कर्ष:
प्रदूषण अचानक नहीं आया। हमने धीरे-धीरे खुद बनाया है इसे। जंगल काटे, नदियां गंदी कीं, हवा में जहर घोला। और अब उसी हवा में रोज सांस लेते हैं।
पर अभी भी वक्त है। एक पेड़ लगाओ। एक प्लास्टिक कम इस्तेमाल करो। एक दिन साइकिल चलाओ। छोटी-छोटी बातें, पर मिलकर बड़ा फर्क पड़ता है। और अगर हम नहीं बदलते, तो आने वाली पीढ़ी को क्या देंगे? गंदी हवा? जहरीला पानी?
यह धरती हमारी है। इसे बचाना हमारा काम है, किसी और का नहीं।
पेड़ लगाओ, प्रदूषण भगाओ, अपने लिए नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए। प्रदूषण पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाने के लिए मनुष्य को वह सारे कार्य बंद करने होंगे जो प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। पृथ्वी और प्रकृति के हित के लिए प्रदूषण को नियंत्रित करने की आवश्यकता है।