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शिवलिंग का असली अर्थ: इतिहास, पुरातत्व औ...

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| Posted on April 12, 2020

शिवलिंग का असली अर्थ: इतिहास, पुरातत्व और हिंदू दर्शन

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शिवलिंग। यह शब्द सुनते ही करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में भक्ति का भाव उठता है। मंदिरों में जल चढ़ाना, बेलपत्र अर्पित करना, महाशिवरात्रि पर जागरण करना... यह सब भारतीय जीवन का हिस्सा है।

लेकिन साथ ही बहुत से लोगों के मन में यह जिज्ञासा भी होती है कि शिवलिंग का असली अर्थ क्या है? इसकी पूजा कब से शुरू हुई? इसके पीछे क्या दर्शन है? यह बिल्कुल स्वाभाविक जिज्ञासा है। और इसका जवाब खोजने के लिए हमें इतिहास, पुरातत्व और हिंदू दर्शन तीनों को एक साथ देखना होगा।

इस लेख में कोई पक्ष नहीं लिया गया है। न आस्था के विरुद्ध, न आस्था के समर्थन में। केवल वही बातें हैं जो इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और हिंदू शास्त्रों में मिलती हैं।

शिवलिंग शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

सबसे पहले शब्द को समझते हैं। “लिंग” संस्कृत का शब्द है। इसका अर्थ केवल शारीरिक अंग नहीं है। संस्कृत में “लिंग” का अर्थ होता है चिह्न, प्रतीक या निशान। जैसे व्याकरण में पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग का मतलब पहचान या वर्गीकरण है। अमरकोश, जो कि संस्कृत का एक प्राचीन कोश है, उसमें “लिंग” का अर्थ “चिह्न” या “पहचान” बताया गया है। तो शिवलिंग का सीधा अर्थ है शिव का प्रतीक, शिव का चिह्न। यानी वह आकृति जो शिव की उपस्थिति का बोध कराती है। शिव पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शिवलिंग ब्रह्मांड के अनंत स्तंभ का प्रतीक है। न आदि, न अंत। अनंत ऊर्जा का प्रतीक।

हड़प्पा सभ्यता और प्राचीन प्रतीक:

पुरातत्व की बात करें तो सिंधु-सरस्वती सभ्यता यानी हड़प्पा सभ्यता के स्थलों पर कुछ ऐसी आकृतियाँ मिली हैं जिन्हें कुछ विद्वान स्तंभाकार प्रतीक मानते हैं।

लेकिन यहाँ सावधान रहना ज़रूरी है। पुरातत्वविदों में इस बारे में अलग-अलग मत हैं।

  • कुछ विद्वानों का मानना है कि हड़प्पा से मिली आकृतियाँ प्रजनन शक्ति के प्रतीक थे जो उस समय की कृषि-आधारित सभ्यताओं में सामान्य थे
  • कुछ इतिहासकार इन्हें शिव-उपासना का प्रारंभिक रूप मानते हैं
  • कुछ शोधकर्ता इन्हें भंडारण या औज़ार जैसी वस्तु भी मानते हैं
  • हड़प्पा से एक मुहर मिली है जिसे “पशुपति मुहर” कहते हैं। उसमें एक योगी जैसी आकृति है जिसे कई विद्वान आद्य-शिव यानी शिव का आरंभिक रूप मानते हैं

यानी हड़प्पा काल में शिव-उपासना थी या नहीं, इस पर विद्वानों में अभी भी बहस जारी है। कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। 

वेदों और पुराणों में शिवलिंग:

ऋग्वेद में रुद्र का उल्लेख मिलता है जिन्हें शिव का वैदिक रूप माना जाता है। यह ऋग्वेद के मंडल 2 और मंडल 7 में मिलता है। रुद्र को तूफ़ान, शक्ति और वैद्यकीय ज्ञान का देवता कहा गया है।

यजुर्वेद में श्री रुद्राष्टाध्यायी और श्री रुद्रम् का उल्लेख है जो शिव की स्तुति में सबसे प्राचीन मंत्र माने जाते हैं। लिंग पुराण और शिव पुराण में शिवलिंग की उत्पत्ति की कथा विस्तार से मिलती है। इसमें शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग यानी प्रकाश के स्तंभ के रूप में वर्णित किया गया है।

शिव पुराण की कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। तब एक अनंत प्रकाश-स्तंभ प्रकट हुआ। दोनों ने उसका आदि और अंत खोजने की कोशिश की लेकिन नहीं मिला। तब उस अनंत ज्योति को शिव का रूप माना गया। यही शिवलिंग का दार्शनिक आधार है।

गुप्त काल और शिव उपासना का विस्तार:

इतिहासकारों के अनुसार गुप्त काल यानी लगभग चौथी से छठी शताब्दी के बीच का समय भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था।

इस काल में:

  • शैव धर्म यानी शिव उपासना बहुत व्यापक रूप से फैली
  • वैष्णव धर्म भी इसी काल में बहुत शक्तिशाली हुआ
  • पहले बड़े पाषाण मंदिरों का निर्माण इसी काल में हुआ
  • कुमारगुप्त प्रथम के सिक्कों पर शिव-पार्वती के चित्र मिलते हैं
  • पुराणों का संकलन और विस्तार भी मुख्यतः इसी काल में हुआ

यह सही है कि गुप्त काल में शिव उपासना का संस्थागत रूप बहुत विकसित हुआ। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शिव की अवधारणा पहले थी ही नहीं। ऋग्वेद के रुद्र से लेकर गुप्त काल तक एक लंबी परंपरा है जो विकसित होती रही। धर्म और उसके प्रतीक भी समय के साथ विकसित होते हैं। यह स्वाभाविक है और हर सभ्यता में ऐसा होता है।

शिवलिंग का दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ

हिंदू दर्शन में शिवलिंग को केवल एक मूर्ति नहीं माना जाता। इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है।

ब्रह्मांड का प्रतीक:

शिवलिंग की आकृति को ब्रह्मांड के अनंत विस्तार का प्रतीक माना जाता है। नीचे की गोलाकार आधार जिसे पीठ कहते हैं वह प्रकृति या सृष्टि का प्रतीक है और ऊपर का स्तंभ चेतना या पुरुष तत्व का।

शक्ति और शिव का समन्वय:

हिंदू दर्शन में शिव और शक्ति को एक दूसरे के पूरक माना गया है। शिव चेतना के प्रतीक हैं और शक्ति ऊर्जा की। शिवलिंग में ये दोनों तत्व एक साथ हैं। यह स्त्री और पुरुष, प्रकृति और पुरुष, चेतना और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक है।

निराकार ईश्वर का प्रतीक:

शैव दर्शन में शिव निराकार हैं। उनका कोई निश्चित रूप नहीं। शिवलिंग इसी निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। यही कारण है कि शिव की उपासना लिंग रूप में की जाती है न कि किसी मानवीय आकृति में।

बारह ज्योतिर्लिंग और उनका महत्व

भारत में बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंग हैं जो सबसे पवित्र शिव तीर्थ माने जाते हैं।

  1. सोमनाथ, गुजरात
  2. मल्लिकार्जुन, आंध्र प्रदेश
  3. महाकालेश्वर, उज्जैन
  4. ओंकारेश्वर, मध्य प्रदेश
  5. केदारनाथ, उत्तराखंड
  6. भीमाशंकर, महाराष्ट्र
  7. काशी विश्वनाथ, वाराणसी
  8. त्र्यंबकेश्वर, महाराष्ट्र
  9. वैद्यनाथ, झारखंड
  10. नागेश्वर, गुजरात
  11. रामेश्वरम्, तमिलनाडु
  12. घृष्णेश्वर, महाराष्ट्र

यह सभी स्थान सदियों से श्रद्धा के केंद्र रहे हैं और इनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व असंदिग्ध है।

विभिन्न विद्वानों के मत:

शिवलिंग के अर्थ और इतिहास पर भारतीय और विदेशी दोनों तरह के विद्वानों ने शोध किया है। उनके मत अलग-अलग हैं:

  • स्वामी विवेकानंद ने शिवलिंग को निराकार ब्रह्म का प्रतीक बताया था
  • पुरातत्वविद् मैके और मार्शल ने हड़प्पा की आकृतियों को प्रजनन शक्ति के प्रतीक माना
  • डॉ. आंबेडकर ने अपनी रचनाओं में शिवलिंग की पूजा को प्राचीन भारतीय परंपरा का हिस्सा माना
  • इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार गुप्त काल में शिव उपासना का संस्थागत रूप विकसित हुआ लेकिन इसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं

यानी, विद्वानों में भी इस विषय पर सहमति और असहमति दोनों हैं। कोई एक अंतिम सत्य अभी तक स्थापित नहीं हुआ है। 

Faqs

Q1 शिवलिंग का असली अर्थ क्या है?
संस्कृत में “लिंग” का अर्थ चिह्न या प्रतीक है। शिवलिंग का अर्थ है शिव का प्रतीक। हिंदू दर्शन में इसे निराकार ब्रह्म, अनंत ऊर्जा और ब्रह्मांड के उद्गम का प्रतीक माना जाता है। यह केवल शारीरिक अर्थ में नहीं समझा जाता।
Q2 हड़प्पा सभ्यता में क्या शिव की पूजा होती थी?
इस विषय पर विद्वानों में अलग-अलग मत हैं। हड़प्पा से मिली पशुपति मुहर को कुछ विद्वान आद्य-शिव का प्रमाण मानते हैं। कुछ इसे किसी अन्य देवता का रूप मानते हैं। कुछ स्तंभाकार आकृतियाँ भी मिली हैं जिनकी व्याख्या अलग-अलग की गई है। कोई एक निश्चित उत्तर अभी तक नहीं है।
Q3 शिवलिंग की पूजा कब से शुरू हुई?
वैदिक काल में रुद्र की उपासना के प्रमाण ऋग्वेद में मिलते हैं। लिंग पूजा का स्पष्ट उल्लेख पुराणों में मिलता है। गुप्त काल में मंदिरों का निर्माण और शिव उपासना का संस्थागत विकास हुआ। यह एक क्रमिक विकास की प्रक्रिया रही है।
Q4 क्या शिवलिंग को प्रजनन शक्ति का प्रतीक माना जाता है?
कुछ पश्चिमी और भारतीय विद्वान इसे प्रजनन शक्ति का प्रतीक मानते हैं। हिंदू दर्शन में इसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा और सृजन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। सृजन की अवधारणा और प्रजनन की अवधारणा में कुछ समानता है लेकिन हिंदू धर्म में शिवलिंग का दार्शनिक अर्थ बहुत गहरा और व्यापक है।
Q5 गुप्त काल में शिव उपासना का इतना विकास क्यों हुआ?
गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल में धर्म, कला, साहित्य और विज्ञान सबका विकास हुआ। गुप्त राजाओं ने शैव और वैष्णव दोनों धर्मों को संरक्षण दिया। इसी कारण इस काल में मंदिर बनाए गए, पुराणों का संकलन हुआ और शिव उपासना का संस्थागत रूप विकसित हुआ।
Q6 शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है?
हिंदू श्रद्धालु शिवलिंग की पूजा शिव को अनंत, निराकार और सर्वव्यापी मानकर करते हैं। शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग पर जल चढ़ाना, बेलपत्र अर्पित करना और ध्यान करना मन की शांति और आत्मिक उन्नति के लिए किया जाता है। यह एक गहरी आध्यात्मिक परंपरा है।

निष्कर्ष:

शिवलिंग का इतिहास और अर्थ बहुत गहरा और बहुआयामी है।

एक तरफ पुरातत्व है जो हमें हड़प्पा काल तक ले जाता है। दूसरी तरफ वेद और पुराण हैं जो शिव को अनंत और निराकार बताते हैं। तीसरी तरफ इतिहास है जो गुप्त काल में शैव धर्म के विकास की बात करता है।

इन सब को एक साथ देखें तो यह स्पष्ट होता है कि भारतीय धार्मिक परंपराएँ बहुत पुरानी हैं और उनका विकास एक लंबी यात्रा का परिणाम है। न कोई चीज़ अचानक प्रकट हुई, न किसी ने एक रात में सब बदल दिया। जिज्ञासा रखना अच्छी बात है। इतिहास जानना ज़रूरी है। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले सभी पक्षों के तथ्यों को ध्यान से देखना चाहिए। यह लेख शैक्षिक उद्देश्य से लिखा गया है। किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

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