सनातन हिंदू धर्म एक शाश्वत और प्राचीन धर्म है। यह एक वैज्ञानिक और विज्ञान आधारित धर्म होने के कारण निरंतर विकास कर रहा है। माना जाता है कि इसकी स्थापना ऋषियों और मुनियों ने की है। इसका मूल पूर्णतः वैज्ञानिक होने के कारण सदियां बीत जाने के बाद भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है।प्रारंभिक काल में हिंदू समाज में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के अनुसार शिक्षा दी जाती थी, जो वैज्ञानिक होने के कारण विकासोन्मुख थी । 16 संस्कारों को हिंदू धर्म की जड़ कहे तो गलत नहीं होगा।
इन्हीं 16 संस्कारों में इस धर्म की संस्कृति और परंपराएं निहित है जो निम्न है:-
गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमंतो नयन संस्कार, जात कर्म संस्कार, नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्य प्रशासन संस्कार, चूड़ा कर्म संस्कार, विद्यारंभ संस्कार, कर्णवेद संस्कार, यज्ञयोपवीत संस्कार, वेदांरम्भ संस्कार, केशांत संस्कार, समावर्तन संस्कार, विवाह संस्कार, अत्यनस्ती संस्कार।
गर्भाधान संस्कार - गर्भाधान संस्कार के माध्यम से हिंदू धर्म संदेश देता है कि स्त्री पुरुष संबंध पशुपत ना होकर केवल वंश वृद्धि के लिए होना चाहिए। मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होने मन प्रसन्न होने पर गर्भधारण करने से संतति स्वस्थ और बुद्धिमान होती है।
पुंसवन संस्कार - गर्भधारण के तीन मन है बाद गर्भ में जीव के संरक्षण और विकास के लिए यह आवश्यक है कि स्त्री अपने भोजन और जीवन शैली को नियम अनुसार करे। इस संस्कार का उद्देश्य स्वास्थ्य और उत्तम संतान की प्राप्ति है। यह तभी संभव है जब गर्भधारण विशेष तिथि और ग्रहों के आधार पर किया जाए।
सीमांतो नयन संस्कार- सीमंतो नयन संस्कार गर्भधारण करने के बाद छठे या आठवीं मास में गर्भपात होने की सबसे अधिक संभावनाएं होती हैं या इन्हीं महीना में प्रीमेच्योर डिलीवरी होने की सर्वाधिक संभावना होती है गर्भवती स्त्री के स्वभाव में परिवर्तन लाने, स्त्री के उठने बैठने,चलने, सोने आदि की विधि आती है। मेडिकल साइंस भी इन महीना में स्त्री को विशेष सावधानी रखने की सलाह देता है भ्रूण के विकास और स्वास्थ्य बालक के लिए यह आवश्यक है गर्भस्थ शिशु और माता की रक्षा करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है स्त्री का मन प्रसन्न करने के लिए यह संस्कार किया जाता है।
इसी प्रकार सभी संस्कारों का अलग-अलग महत्व होता है। अब आपको तो पता ही चल गया होगा कि 16 संस्कार कौन से होते हैं।







