जब यह सवाल सामने आता है, कि अगर मुस्लिम लव-ज़ेहाद कर सकते हैं तो हिंदू समुदाय के युवक उसी तर्ज़ पर प्रेम-युद्ध क्यों नहीं कर सकते, मुस्लिम लड़कियों से शादी करने का अभियान क्यों नहीं छेड़ सकते; तो एकबारगी यह बिलकुल वाज़िब सी बात लगती है। पर यह बहुत सतही सोच से निकला ज़वाब नज़र आता है।
आखिर जब हम ऐसा सवाल करते हैं तब ज़ाहिर तौर पर 'लव-ज़ेहाद' के प्रति एक शिकायती लहज़े से भरे होते हैं, और उसे सही नहीं मानते। फिर अगला प्रश्न ये भी आता है, कि हम जिस बात को गलत समझते हैं उसे अपनाकर क्या हासिल होने की उम्मीद कर सकते हैं। फिर हमारे और उनके बीच फ़र्क कहां रह जाता है! क्या यह उनका ही अनुकरण करना न होगा!
और फिर ज़ेहाद तो इस्लाम मज़हब में एक अवधारणा ज़ुरूर है, ठीक वैसे ही जैसे हिंदूधर्म में धर्म-युद्ध या ईसाइयों में क्रूसेड। पर 'लव-ज़ेहाद' की अवधारणा तो कुछ नये लोगों की देन ही है। यह कुत्सित मानसिकता की ईज़ाद है। लव अंग्रेजी भाषा का शब्द है जबकि ज़ेहाद अरबी भाषा का। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं। और इसका अर्थ निकलता है 'प्रेम-धर्म-युद्ध' जो कि साफ तौर पर बेहद अटपटा और अनुचित लगता है। और ऐसे ही कुछ 'प्रेम-युद्ध' शब्द भी है।

भारत में लव-ज़ेहाद शब्द करीब पांच-छ: साल पहले तब चर्चा में आया जब केरल हाईकोर्ट ने वहां के अखिला अशोकन और शफ़ीन नाम के एक मुस्लिम शख़्स की शादी इसलिये ख़ारिज कर दी क्योंकि अखिला के माता-पिता ने शिकायत दर्ज़ करायी कि उनकी बेटी को आईएस का फ़िदायीन बनाने को शफ़ीन ने उसे शादी के जाल में फंसाया है। गौरतलब है कि अखिला अशोकन ने इस शादी से पहले अपना नाम बदलकर हादिया कर लिया था। पर केरल हाईकोर्ट के इस फैसले को शफ़ीन ने शीर्ष-अदालत में चुनौती दी, जिसके बाद कोर्ट ने इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी 'एनआईए' को सौंप दी। इस वाकये के बाद से इस पर चर्चा का बाजार गर्म होता गया। हालांकि अब यूपी सरकार ने धर्मांतरण के लिये शादी को अवैध करार देते हुये इसके लिये दस सालों की सजा का प्रावधान कर दिया है। मध्य प्रदेश और हरियाणा में भी कुछ ऐसा ही कानून बनाया जा चुका है। और इसमें दो राय नहीं कि धर्मांतरण के लिये विवाह न केवल गलत है, बल्कि यह प्रेम का अपमान भी है।
क्या प्रेम और युद्ध जैसे शब्दों का आपस में कोई तालमेल दिखता है! बल्कि देखें तो ये आपस में एकदम विपरीत शब्द हैं। कहां प्रेम और कहां युद्ध! प्रेम ही तो मानव जीवन का मूल-तत्व है। और अगर ठीक से देखा जाये तो युद्ध एक पाशविक बात है। वह जो हम मनुष्यों के भीतर अभी कुछ पाशविक प्रवृत्तियां शेष हैं, युद्ध तो उसी वज़ह से है। प्रेम के साथ, अथवा प्रेम के नाम पर युद्ध एक शुद्ध विकृत सोच की देन है। पर यदि हिंदू भी उसी विकृति का शिकार हो गया, कुछेक गलत सोच वाले मुस्लिमों का अनुयायी हो गया, तब तो यह निहायत ही अश्लील बात होगी।

हां, यदि हम इस प्रेम-युद्ध शब्दावली से युद्ध को हटा दें, तो इसमें कोई बुराई नहीं है कि हिंदू-मुस्लिम आपस में विवाह-संबंध स्थापित करें। विशेषतः भारत के संदर्भ में महात्मा गांधी जैसे व्यक्तित्व का भी यही मानना था। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर भी अपने एक उपन्यास में एक पा के ज़रिये कहते हैं कि यदि मानव विविधताओं के बावज़ूद हमें आपस में जोड़ने वाला कोई सूत्र न मौज़ूद होता, तो दुनिया में प्रेम का अस्तित्व ही न होता। सो, प्रेम विभिन्नताओं को अंगीकार करता है और इसके लिये धर्मांतरण पर जोर देना गलत है। और इसलिये यहां 'लव-ज़ेहाद' और प्रेम-युद्ध में कोई फ़र्क नहीं..

