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Education

2 अक्टुबर लाल बहादुर शास्त्री जयंति

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| Posted on October 1, 2021

2 अक्टुबर लाल बहादुर शास्त्री जयंति

“हम रहे या ना रहें, लेकिन यह झंडा रहना चाहिए और देश रहना चाहिए। मुझे विश्वास है कि यह झंडा रहेगा। हम और आप रहें या ना रहें लेकिन भारत का सिर ऊंचा रहेगा”

यह उद्गार है प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जो उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से व्यक्त किए थे।

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 ई. को मुगलसराय (वाराणसी) के एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शारदा प्रसाद तथा माता का नाम रामदुलारी देवी था। अनेक सद्गुणों के कारण समाज में उनकी अच्छी प्रतिष्ठित थी।

बालक लाल बहादुर जब केवल डेढ़ वर्ष के थे, उनके पिता का देहांत हो गया। पिता का साया उठते ही परिवार का सारा भार माता पर आ पड़ा, किंतु उन्होंने अपना धैर्य न छोड़ा। अब वे बेटे तथा दो पुत्रियों के साथ अपने पुश्तैनी मकान रामनगर में आकर रहने लगे। मां की सारी आशाओं के केंद्र यही बच्चे थे। अनेक अभावों और कठिनाइयों को चीरते हुए उन्होंने इन बच्चों का पालन-पोषण किया।

शिक्षाः

अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर बालक लाल बहादुर शाह वाराणसी आ गए। पढ़ने लिखने में लाल बहादुर की विशेष रुचि थी। वह बहुत ही सीधे-सादे, शांत और मृदुल स्वभाव के बालक थे।

साथियों से सदा हिल-मिलकर रहते थे। छोटी-छोटी बातों पर झगड़ना उनके स्वभाव में नहीं था। स्वयं कष्ट सह लेते, पर किसी को कोई कष्ट न देते। सबसे प्रेमभाव रखते। यही कारण था कि वे सभी शिक्षकों और सहपाठियों के प्रिय बने हुए थे।

लाल बहादुर बनारस के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में पढ़ रहे थे। उस समय “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है”-- लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की वाणी पूरे देश में गूंज रही थी। इससे उन्हें देशभक्ति की प्रेरणा मिली। बनारस में ही उन्हें गांधी जी को पहली बार देखने का अवसर मिला। उनके भाषण से वे बहुत प्रभावित हुए। वह भाषण उनके लिए देश-प्रेम और देश- सेवा का मंत्र बन गया। अब वे अध्ययन के साथ स्वराज आंदोलन में भी समय-समय पर भाग लेने लगे।

सन 1921 में स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार के लिए बनारस में काशी विद्यापीठ की स्थापना हो चुकी थी। लाल बहादुर जी काशी विद्यापीठ में शिक्षा ग्रहण करने लगे। सन 1926 में उन्होंने शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की। अब वे लाल बहादुर से लाल बहादुर शास्त्री बन गए।

असहयोग आंदोलनः

गांधी जी का असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। लोग सरकारी नौकरी, स्कूल, कचहरी आदि छोड़कर आंदोलन में भाग लेने लगे। गांवों के किसान और मजदूर इस आंदोलन में शामिल होने लगे। लाल बहादुर शास्त्री भी पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। आजादी की लड़ाई में उन्हें कई बार जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं किंतु वे अपने लक्ष्य से नहीं डिगे।

देश सेवाः

अध्ययन समाप्त कर शास्त्री जी देश सेवा में सक्रिय हो गए। पहले वे प्रदेश कांग्रेस में मंत्री बने। फिर उत्तर प्रदेश व्यवस्थापिका के सदस्य चुने गए। इस बीच भी उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उन्हें जो भी काम दिए गए थे वह बड़ी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा एवं परिश्रम के साथ करते रहे।

इन गुणों से प्रभावित हो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें आनंद भवन में बुला लिया।

भारत छोड़ो आंदोलनः

सन 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्हें पुनः जेल जाना पड़ा। जेल जाने से शास्त्री जी के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई पर इससे वे घबराएं नहीं। सदैव अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहे।

देश स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्र भारत में अपनी सरकार बनी प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से रेलमंत्री बनाया। इस क्षेत्र में उन्होंने अनेक सुधार किए। उनके समय में एक बार भीषण रेल दुर्घटना हुई। इस दुर्घटना से दुःखी होकर शास्त्री जी ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। बाद में उन्हें उद्योग मंत्री तथा स्वराष्ट्र मंत्री का दायित्व दिया गया। उन्होंने सभी पदों पर बड़ी निष्ठा, तत्परता और ईमानदारी से कार्य किया।

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नाराः

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद शास्त्री जी सर्वसम्मति से भारत के प्रधानमंत्री बने। शास्त्री जी के सीधे-सादे व्यक्तित्व में अद्भुत दृढ़ता भरी हुई थी। प्रधानमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही भारत पर पाकिस्तान में आक्रमण कर दिया। देश उन दिनों अनेक समस्याओं से जूझ रहा था। अन्न की इतनी कमी थी कि अमेरिका से गेहूँ मँगाना पड़ता था। ऐसे समय में शास्त्री जी ने ‘जयजवान, जय किसान का नारा देकर देशवासियों को स्वाभिमान को जगाया। उन्होंने कहा - ‘पेट पर रस्सी बाँधो, साग-सब्जी अधिक खाओ। सप्ताह में एक बार उपवास रखो। हमें जीना है तो इज्जत से जियेंगे, वरना भूखे मर जायेगे। बेज्जती की रोटी से इज्जत की मौत अच्छी रहेगी।’ फिर हरित क्रांति प्रारंभ हुई जिस कारण भारत को आत्म-निर्भरता हासिल हुई।

भारत-पाक युद्ध में भारत विजय हुआ। इस विजय ने भारत का मस्तक ऊँचा कर दिया। युद्ध समाप्त होने के बाद रूस में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ।

उसी रात 10 जनवरी, 1966 को हृदय गति रुक जाने से ताशकंद में ही उनका निधन हो गया। सारा संसार शोक में डूब गया। भारत ने अपने इस महान लोकप्रिय नेता को सदा-सदा के लिए खो दिया।

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