इंकलाब जिंदाबाद। बस यह दो शब्द सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं ना? कुछ ऐसा है इस नारे में जो आज भी दिल को हिला देता है। सौ साल से भी पहले जब यह नारा पहली बार गूँजा था, तो अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिल गई थी।
आज भी जब कोई विरोध होता है, जब देश की बात आती है, तो यह नारा अपने आप होठों पर आ जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंकलाब जिंदाबाद का असली मतलब क्या है? किस भाषा का यह शब्द है? और सबसे पहले इसे किसने बोला था?
बहुत से लोग सोचते हैं कि यह नारा भगत सिंह ने दिया था। और यह गलत भी नहीं है, क्योंकि भगत सिंह ने इसे जितनी ताकत से बुलंद किया, उतना किसी और ने नहीं किया। लेकिन असली कहानी थोड़ी अलग है।
चलिए शुरू से समझते हैं।
इंकलाब जिंदाबाद का अर्थ क्या होता है?
पहले शब्द को तोड़कर देखते हैं।
“इंकलाब” यह शब्द अरबी भाषा से आया है। इसका मतलब होता है क्रांति। यानी व्यवस्था को पूरी तरह बदल देना। जब कोई पुरानी, जुल्मी व्यवस्था को उखाड़ फेंका जाए और नई व्यवस्था खड़ी की जाए, तो उसे इंकलाब कहते हैं।
“जिंदाबाद” यह फ़ारसी भाषा का शब्द है। इसका मतलब होता है “दीर्घायु हो”, यानी बहुत लंबे समय तक जीवित रहे, फले-फूले।
तो इंकलाब जिंदाबाद का पूरा अर्थ हुआ: क्रांति अमर रहे। क्रांति जिंदाबाद। यानी, यह जो बदलाव की लहर उठी है, यह हमेशा-हमेशा के लिए बनी रहे। यह पूरा नारा उर्दू भाषा में है। उर्दू जो अरबी, फ़ारसी और हिंदी का सुंदर मेल है।
इंकलाब जिंदाबाद नारा किसने दिया था सबसे पहले:
यह वह सवाल है जो बहुत से लोग गलत समझते हैं। सच यह है कि इंकलाब जिंदाबाद नारे का सबसे पहला प्रयोग उर्दू के महान कवि और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी ने किया था। यह सन 1921 की बात है। उस समय देश में असहयोग आंदोलन की आँधी चल रही थी।
मौलाना हसरत मोहानी उस दौर के बड़े विद्वान थे। उर्दू शायरी में उनका नाम बहुत ऊँचा था। लेकिन बस शायरी तक सीमित नहीं थे वो। देश की आज़ादी के लिए उनका दिल जलता था। उन्होंने कांग्रेस के मंच से यह नारा उछाला था। और यह नारा उस समय बहुत आगे की सोच था क्योंकि उस ज़माने में ज़्यादातर नेता बस कुछ सुधार चाहते थे, पूरी आज़ादी नहीं। लेकिन मौलाना हसरत मोहानी ने पूर्ण स्वराज की माँग पहले ही कर दी थी।
मौलाना हसरत मोहानी कौन थे?

थोड़ा इनके बारे में जान लेते हैं क्योंकि इनका नाम इतिहास में उतना नहीं आता जितना आना चाहिए।
- पूरा नाम था सय्यद फ़ज़्लुल हसन, उपनाम हसरत मोहानी
- जन्म हुआ था उन्नाव जिले के मोहान गाँव में, इसीलिए मोहानी कहलाए
- उर्दू के बड़े शायर थे, “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है” यह गजल उन्हीं की है
- सन 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया
- वह भारत में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग करने वाले पहले नेताओं में से थे
- अंग्रेज़ों ने उन्हें कई बार जेल में डाला, पर वो झुके नहीं
आज हम उन्हें उतना नहीं जानते जितना जानना चाहिए। यही हमारे इतिहास की त्रासदी है।
भगत सिंह और इंकलाब जिंदाबाद की कहानी
अब आते हैं उस घटना पर जिसने इस नारे को अमर बना दिया।
8 अप्रैल 1929 का दिन। दिल्ली में केंद्रीय विधान सभा का सत्र चल रहा था। अंग्रेज़ सरकार दो बहुत कड़े कानून पास करने वाली थी। एक था सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और दूसरा था व्यापार विवाद विधेयक। इन कानूनों से मज़दूरों और आम जनता का जीना और मुश्किल हो जाता है।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने उस दिन एक ऐसा काम किया जिसे दुनिया आज तक याद करती है। दर्शक दीर्घा से उन्होंने सभा के अंदर बम फेंके। लेकिन यह बम किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं था। यह सिर्फ धमाका करने के लिए था, सुनाने के लिए, जगाने के लिए। साथ में पर्चे उड़ाए जिन पर लिखा था “बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ चाहिए।”
और उस धुएँ और धमाके के बीच जो आवाज़ गूँजी वो थी: इंकलाब जिंदाबाद!
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहाँ से भागे नहीं। वो रुके। गिरफ्तार हुए। मुकदमा चला। और जब मुकदमे में भगत सिंह से पूछा गया कि तुमने यह क्यों किया, तो उनका जवाब पूरे देश की आवाज़ बन गया। इस घटना के बाद 'इंकलाब जिंदाबाद' बस एक नारा नहीं रहा। यह पूरी क्रांति का प्रतीक बन गया।
भगत सिंह के लिए इंकलाब का मतलब क्या था:
यह बहुत ज़रूरी बात है जो अक्सर लोग नहीं समझते। भगत सिंह के लिए इंकलाब का मतलब सिर्फ अंग्रेज़ों को भगाना नहीं था। वो चाहते थे कि पूरी व्यवस्था बदले। समाज में जो ऊँच-नीच है, गरीब-अमीर का भेद है, वो सब खत्म हो। उन्होंने खुद एक बार लिखा था कि इंकलाब का मतलब होता है मौजूदा समाज की बुनियाद को उलट देना। न सिर्फ राजनीतिक बदलाव, बल्कि आर्थिक और सामाजिक बदलाव भी।
वो समाजवादी विचारों से बहुत प्रभावित थे। उनका सपना था एक ऐसा भारत जहाँ हर इंसान बराबर हो। जहाँ भूख न हो, शोषण न हो। इसीलिए उनके 'इंकलाब जिंदाबाद' में इतनी गहराई थी। यह बस एक नारा नहीं था, यह एक पूरा दर्शन था।
उन नारों की सूची जो भारत की आज़ादी में गूँजे
इंकलाब जिंदाबाद के साथ-साथ उस दौर में और भी कई नारे थे जो भारतीयों के दिल में आग जलाते थे। ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते थे जिसमें हर कोई अपने आप को इस लड़ाई का हिस्सा महसूस करता था।
- भारत माता की जय, यह नारा माँ के रूप में देश से जोड़ता था
- वंदे मातरम, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास से निकला, जो क्रांति का गीत बन गया
- करो या मरो, महात्मा गाँधी ने भारत छोड़ो आंदोलन में दिया
- अंग्रेज़ों भारत छोड़ो, सन 1942 में पूरे देश की एक आवाज़ थी
- दिल्ली चलो, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी आज़ाद हिंद फौज को यह नारा दिया
- तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा, नेताजी का यह नारा आज भी रोंगटे खड़े कर देता है
इन सब नारों में अलग-अलग तरीके थे, लेकिन मंजिल एक ही थी। आज़ाद भारत।
इंकलाब जिंदाबाद आज भी क्यों प्रासंगिक है
यह सवाल कभी-कभी मन में आता है कि आज़ादी मिल गई, तो अब यह नारा क्यों? दरअसल इंकलाब जिंदाबाद सिर्फ अंग्रेज़ों के खिलाफ नहीं था। यह हर उस ज़ुल्म के खिलाफ था जो एक इंसान दूसरे इंसान पर करता है। जब भी कोई अन्याय होता है, जब भी कोई आवाज़ दबाई जाती है, जब भी किसी के हक पर डाका डाला जाता है, तब-तब यह नारा उठता है।
1947 में देश तो आज़ाद हो गया। लेकिन वो इंकलाब जो भगत सिंह चाहते थे, वो अभी पूरा नहीं हुआ। इसीलिए यह नारा आज भी ज़िंदा है।
जब भी कोई छात्र अपने अधिकार माँगता है, जब भी कोई मज़दूर अपनी मज़दूरी के लिए लड़ता है, जब भी कोई किसान अपनी ज़मीन बचाने के लिए खड़ा होता है: इंकलाब जिंदाबाद गूँजता है।
Faqs
Q1इंकलाब जिंदाबाद किस भाषा का नारा है?
Q2इंकलाब जिंदाबाद का हिंदी अर्थ क्या है?
Q3इंकलाब जिंदाबाद नारा सबसे पहले किसने और कब दिया?
Q4भगत सिंह ने इंकलाब जिंदाबाद का नारा कब लगाया था?
Q5मौलाना हसरत मोहानी कौन थे?
Q6क्या इंकलाब जिंदाबाद नारा आज भी प्रासंगिक है?
निष्कर्ष:
इंकलाब जिंदाबाद। यह सिर्फ दो शब्द नहीं हैं। इनमें पूरी एक पीढ़ी का दर्द है, सपना है, जुनून है। मौलाना हसरत मोहानी ने इसे जन्म दिया। भगत सिंह ने इसे अपने खून से सींचा। और लाखों नाम न जाने जाने वाले देशभक्तों ने इसे अपनी साँसों में जिया। जब भी यह नारा कहीं गूँजे, याद रखिए कि इसके पीछे सिर्फ एक नारा नहीं है। इसके पीछे है एक पूरी कहानी। एक पूरी कुर्बानी।
इंकलाब जिंदाबाद!





