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Updated on May 30, 2026astrology

संकट चतुर्थी व्रत क्यों जरुरी होता है और इसका क्या महत्व है ?

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Decoding the ancient language of the stars — with six years of practice, study,...
Updated on May 30, 2026

संकष्टी चतुर्थी हिंदू धर्म में एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जिसे हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है, जिन्हें विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता कहा जाता है। “संकष्टी” का अर्थ होता है संकटों से मुक्ति, यानी यह व्रत जीवन के कष्टों और बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाता है।

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य जीवन में आने वाली परेशानियों, बाधाओं और नकारात्मक परिस्थितियों से मुक्ति पाना है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति सच्चे मन से संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखता है और भगवान गणेश की पूजा करता है, उसके जीवन के सभी विघ्न दूर हो जाते हैं और उसे सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी है। इस दिन उपवास रखने से व्यक्ति में संयम, आत्म-नियंत्रण और भक्ति की भावना बढ़ती है। व्रत के दौरान भगवान गणेश की पूजा, मंत्र जाप और कथा श्रवण करने से मन को शांति मिलती है और तनाव कम होता है।

इस व्रत में विशेष रूप से चंद्रमा के दर्शन का भी महत्व होता है। रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को धैर्य और अनुशासन सिखाती है।

धार्मिक मान्यता यह भी है कि भगवान गणेश सभी देवताओं में सबसे पहले पूजे जाते हैं और वे सभी बाधाओं को दूर करने वाले हैं। इसलिए संकष्टी चतुर्थी के दिन उनकी पूजा करने से जीवन में सफलता के मार्ग खुलते हैं और कार्यों में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि संकष्टी चतुर्थी व्रत इसलिए जरूरी माना जाता है क्योंकि यह व्यक्ति के जीवन से संकटों को दूर करने, मानसिक शांति देने और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाने में मदद करता है। यह व्रत श्रद्धा, भक्ति और आत्म-नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जो जीवन को सकारात्मक दिशा देता है।

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ABOUT THE AUTHORMadhav Sharma

Madhav Sharma is a professional astrologer with over 6 years of practice in Vedic astrology. He holds a Jyotish Visharad certification from the Indian Council of Astrological Sciences (ICAS), New Delhi — one of India's most recognised credentials in the field — and has studied under senior practitioners with decades of lineage in classical Vedic traditions. His content covers Vedic astrology, birth chart analysis, planetary transits, kundli matching, horoscope predictions, and the practical application of astrological principles in daily life. His work has been published on platforms including AstroSage, GaneshaSpeaks, and Boldsky Astrology, where he writes for readers seeking guidance grounded in classical astrological texts and consistent interpretive practice. Over six years, Madhav has conducted 2,000+ individual consultations and published 200+ articles on astrology, covering everything from beginner guides to in-depth analyses of rare planetary combinations. He is a practising member of the Indian Astrology Federation and has been a featured voice at astrology conferences and spiritual wellness events across India. Across all his writing, his approach remains consistent — classical knowledge, disciplined interpretation, and content that respects both the tradition of Vedic astrology and the intelligence of the reader.

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Updated on May 27, 2026

हिन्दू धर्म में कई सारे भगवान हैं, जिनका अपना एक निश्चित दिन होता है । हिन्दू धर्म में भगवान गणेश ऐसे होते हैं जिनका पूजन सर्व प्रथम किया जाता है चाहे पूजा किसी भी भगवान की परन्तु गणेश जी सबसे पहले पूजा जाता है । आज हम बात कर रहे हैं संकट चतुर्थी व्रत की और इस व्रत के महत्व की ।

जैसा कि आपको तिथियों के बारें में पहले भी बताया गया है । हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से 15 दिन की तिथियां होती है, जिसके बाद पूर्णिमा और अमावश्या आती है और महीना बदल जाता है । तो भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि के देवता के रूप पूजा जाता है। इसलिए मान्यता कहती है कि प्रत्येक महीने में आने वाली चतुर्थी गणपति पूजन के लिए सही और उत्तम है। इस साल संकट चौथ 13 जनवरी 2020 को है । यह व्रत महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र की कामना के साथ रखती है । यह व्रत पूर्णतः निर्जला होता है और इस व्रत में भगवान गणेश जी का पूजन पूरे विधि विधान के साथ किया जाता है ।

पूजा विधि :-

संकट चौथ में गणेश जी का पूजन किया जाता है और इस तिथि में गणेश जी को भालचंद्र नाम से भी पूजा जाता है। इस दिन व्रत लेने के लिए महिलाओं को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना होता है और उसके बाद रोजाना की तरह पूजन और पूरा दिन भी बिना कुछ खाए और पीये रहना होता है । इसके बाद शाम के समय लकड़ी के पटरे पर लाल कपड़ा बिछाकर मिट्टी के गणेश एवं चौथ माता की तस्वीर लगाकर उनका पूजन करना होता है। रोली, मोली, अक्षत, फल, फूल से पूरी श्रद्धा और भावना के साथ पूजन करना होता है ।
 
अब इस व्रत में सबसे महत्वपूर्ण है भोग जो कि तिल और गुड़ से बने लड्डू होते हैं । गणेशजी एवं चौथ माता को इस व्रत में प्रसन्न करने के लिए तिल और गुड़ के लड्डू चढ़ाए जाते हैं और उसके बाद तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल चन्दन, कुश,फूल और अक्षत डाला जाता है और उसके बाद चन्द्रमा को वह जल चढ़ाया जाता है । उसके बाद घी का दिया जलाकर कथा पढ़ें , हवन और उसके बाद आरती करें । इस तरह पूजन को संपन्न करें ।
 
कथा :-
एक बार देवता कई सारी परेशानी में घिरे हुए थे। इसलिए वो मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस वक़्त शिव के साथ उनके दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने अपने दोनों पुत्रों से पूछा तुम दोनों में से कौन देवताओं के कष्टों को दूर कर सकता है । यह सुनकर कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने इस काम में खुद को सक्षम बताया। दोनों की बात सुनकर शिव ने उनकी परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा वो देवताओं की मदद करेगा । इतना सुनते ही कार्तिके अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने चले गए परन्तु गणेश कुछ विचार करने लगे और सोचा अगर मैं इस चूहे पर परिक्रमा करूँगा तो बहुत समय लग जाएगा ।
 
फिर गणेश जी को एक उपाय आया और वह अपने स्थान से उठे उठे और अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करके वापस बैठ गए। कार्तिके जी अब पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस लौटे तो खुद को विजय समझ कर कहा मैं जीत गया क्योकिं मैंने पृथ्वी के चक्कर लगा लिए हैं । अब शिवजी ने गणेशजी से पृथ्वी की परिक्रमा के स्थान पर उनके और पार्वती जी की परिक्रमा का कारण पूछा तो गणेश जी ने कहा -'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं । गणेश जी की इस बात पर शिव ने उन्हें विजय घोषित किया और उन्हें देवताओं की विपदा दूर करने का आदेश दिया ।
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