जब भी सोचती हूँ उस हादसे के बारे में, तो कुछ धुंधला सा याद आता है,
सांसे थम सी जाती है, और आँखों में पानी सा नज़र आता है.....
ऐसा ही एक हादसा हुआ जब मैं पाँचवी क्लास में थी | मेरे घर में मेरे भाई के एक दोस्त आया करते थे | उन्हें मैं भाई कहती थी | जब भी वो आते थे, उनका आना मुझे अच्छा लगता हैं, बड़ा ही मजाक का माहौल बना कर रखते थे वो मेरे घर में |
वो मेरे घर मेरे बचपन से आया करते थे | कभी ऐसा कुछ नहीं लगा कि ये इंसान ग़लत हो सकता है | 1998 का वो एक भयानक दिन था | मेरे भाई के दोस्त घर आये और उस दिन घर पर कोई नहीं था | मैं हमेशा की तरह उनसे वैसे ही बात करने लगी | उन्होंने पूछा कि सब लोग कहाँ हैं, मैंने कहा माँ-पापा किसी रिश्तेदार के घर गए हैं, और भाई कॉलेज गया है, पर आप क्यों नहीं गए भैया ?
फिर न जाने कुछ हुआ, ये बात न किसी से कह सकती थी, न छुपा सकती थी | जितना डर था मन में उससे कही ज्यादा दर्द था | आत्मा तार-तार हो गई | कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ, बस दर्द और असहनीय दर्द और कुछ नहीं | जब आँख खुली तो पता चला की मैं 5 दिन से बेहोश थी |
जब होश आया तो सब ऐसे देख रहे थे मुझे जैसे मैंने कोई ग़लती की हो | सबकी नज़रों में मेरे लिए सिर्फ हमदर्दी दिखाई दे रही थी और कुछ गुस्सा भी |
फिर मैं जब घर आई तो अक्सर माँ-पापा को बात करते सुनती थी, कि रिश्तेदारों तक ये बात पहुंची तो क्या होगा ? इसकी शादी करना मुश्किल हो जाएगा | मैं सहमी सी रहती थी, आँखों में आंसू भरे हुए बस सोचती रहती थी , कि आखिर ऐसा हुआ क्या है ? आखरी मैंने किया क्या है?
वो हादसा आज भी मेरी ज़िंदगी में एक नासूर बना हुआ है | जब भी किसी को देखती हूँ तो मन में एक डर बैठ जाता है, कि कहीं फिर ऐसा कोई दर्द तो नहीं मिलेगा | जिस दर्द के असर से आज तक गुज़र रही हूँ | इतना बड़ा हादसा मेरे साथ हुआ, पर मैं कुछ न कर सकी क्योंकि सबका एक ही सवाल था मेरे लिए " सबको पता चलेगा तो बदनामी होगी इससे कौन शादी करेगा " बस फिर कुछ नहीं, जी रही हूँ, यही सोच कर की जो हुआ वो क्यों हुआ ?