सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि PSLV-C39 मिशन फेल नहीं हुआ था, बल्कि यह एक सफल रॉकेट था जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने लॉन्च किया था। PSLV-C39 का मिशन 31 अगस्त 2017 को हुआ था, जिसका उद्देश्य IRNSS-1H (Navigation Satellite) को अंतरिक्ष में स्थापित करना था।
अब असली घटना क्या हुई थी, उसे सरल भाषा में समझते हैं। PSLV-C39 ने ठीक तरीके से लॉन्च किया और रॉकेट के चारों स्टेज भी सामान्य रूप से काम कर रहे थे। लेकिन जब सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा (orbit) में छोड़ने का समय आया, तब एक समस्या हो गई।
दरअसल, सैटेलाइट को एक सुरक्षा कवच (heat shield या payload fairing) के अंदर रखा जाता है ताकि लॉन्च के समय वह सुरक्षित रहे। जब रॉकेट अंतरिक्ष में पहुंच जाता है, तो यह कवच अलग हो जाता है ताकि सैटेलाइट बाहर आ सके और सही ऑर्बिट में स्थापित हो सके।
PSLV-C39 मिशन में यही प्रक्रिया सही तरीके से नहीं हुई। सैटेलाइट को कवर करने वाला हीट शील्ड (fairing) अलग नहीं हुआ। इसका मतलब यह हुआ कि सैटेलाइट उसी बंद ढांचे के अंदर रह गया और सही तरीके से अंतरिक्ष में रिलीज नहीं हो सका।
इस कारण IRNSS-1H सैटेलाइट अपने तय कक्षा में स्थापित नहीं हो पाया और मिशन असफल माना गया। हालांकि रॉकेट PSLV खुद पूरी तरह ठीक काम कर रहा था, समस्या केवल सैटेलाइट के रिलीज मैकेनिज्म में आई थी।
ISRO ने बाद में इस घटना का विश्लेषण किया और बताया कि यह एक तकनीकी गड़बड़ी (technical fault) थी, जिसमें separation mechanism ठीक से काम नहीं कर पाया। इसके बाद भविष्य के मिशनों में इस तरह की गलती दोबारा न हो, इसके लिए सिस्टम को और मजबूत किया गया।
निष्कर्ष यह है कि PSLV-C39 रॉकेट खुद फेल नहीं हुआ था, बल्कि सैटेलाइट को रिलीज करने में तकनीकी समस्या आई थी, जिसके कारण पूरा मिशन सफल नहीं हो सका।
