सवाल है कि यदि पति और पत्नी में शारीरिक संबंध न हों तो भी पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता यानी 'मेन्टेनेंस' देना होगा! इसका ज़वाब सबसे पहले तो इसी बात पर निर्भर करेगा कि पति और पत्नी आखिर साथ रह क्यों नहीं रहे हैं! इस संबंध विच्छेद में पति की क्या भूमिका है, और पत्नी की क्या!
फिर भी सामान्य तौर पर पति-पत्नी के संबंध-विच्छेद के मामलों में, पति द्वारा उसकी आय का एक हिस्सा पत्नी को गुजारा भत्ता के रूप में अदा करते रहना होता है। और इसके लिये दंडात्मक वैधानिक प्रावधान हैं। इसलिये यदि हमें यह समझना है कि एक स्त्री-पुरुष दंपति के संबंध-विच्छेद की स्थिति में कब पुरुष द्वारा गुजारा भत्ता देय नहीं होता, तो हमें उससे संबंधित प्रावधानों पर एक नज़र डालनी होगी। यह समझना होगा कि गुजारा भत्ता के नियमों का अभिप्राय क्या है!

गुजारा भत्ता हेतु कानूनी प्रावधान --
पहले केवल सिविल कोर्ट से गुजारा भत्ता संबंधी आदेश ज़ारी होते थे, पर अब यदि कोई व्यक्ति अपने परिजनों संबंधित किसी नैतिक जिम्मेदारी से बच रहा है, जैसे कि विकलांग माता-पिता, पत्नी, अज्ञानी अथवा विकलांग बच्चों की जिम्मेदारी से, तो इस मामले में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 से 128 तक ऐसे प्रावधान मौज़ूद हैं जिनके तहत प्रथम श्रेणी के 'न्यायिक दण्डाधिकारी' गुजारा भत्ता का आदेश दे सकते हैं।
इसके अलावा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम - 2005 के अंतर्गत, प्रथम श्रेणी के न्यायिक दण्डाधिकारी यानी 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट' की अदालत में धारा-12 के तहत गुजारा भत्ता हेतु महिला द्वारा आवेदन किया जा सकता है। इसमें महिला घरेलू सामान, गहने, शादी में आने वाला खर्च आदि की मांग भी कर सकती है।
गुजारा भत्ता देने के प्रावधान --
गुजारा भत्ता देने के कुछ नियम हैं, जो पत्नी के अलावा अज्ञानी व विकलांग बच्चों और माता-पिता के संबंध में भी लागू होते हैं। इसके संबंध में सबसे पहला नियम तो यही है कि गुजारा भत्ता पाने वाला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो। कहीं से कमाता न हो। फिर यदि बच्चे हैं तो वे अज्ञानी या शारीरिक रूप से स्वयं का समर्थन करने में असमर्थ हो सकते हैं। और यदि उनके माता-पिता हैं, तो वे भी स्वयं का समर्थन करने में असमर्थ होने चाहिये।
इस तरह जब दण्डाधिकारी या 'मजिस्ट्रेट' द्वारा गुजारा भत्ता का आदेश दिया जाता है तो उसकी एक निश्चित रकम भी तय कर दी जाती है। इस मामले की पूरी देखरेख 'मजिस्ट्रेट' के जिम्मे होती है। यदि जिस व्यक्ति के लिये आदेश ज़ारी किया गया है वह उसका अनुपालन करने में विफल रहता है, तो दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान भी हैं।
गुजारा भत्ता समाप्त होना --
अब तक हमने विशेषतः हिंदू विवाह अधिनियम के तहत गुजारा भत्ता देने के प्रावधान देखे। पर कुछ परिस्थितियां ऐसी भी हो सकती हैं जब स्त्री-पुरुष संबंध-विच्छेद की स्थिति में भी गुजारा भत्ता का न देना वैधानिक तौर पर मान्य हो जाता है।
ऐसी ही कुछ परिस्थितियां हैं -- जैसे कि यदि पत्नी व्यभिचारिणी हो; या वह बिना कोई वाज़िब कारण बताये पति के साथ रहने से इनकार करती हो। इसके अलावा यदि पति और पत्नी स्वेच्छा से अलग होते हैं, यानी तलाक लेते हैं, तो गुजारा भत्ता रद्द करने के ये कारण हो सकते हैं --
- यदि वह तलाकशुदा महिला 'पुनर्विवाह' कर लेती है, तो उसके गुजारा भत्ता का अधिकार ख़त्म हो जाता है।
- यदि किसी व्यक्तिगत कानून के मुताबिक गुजारा भत्ता संबंधी आदेश से पहले या बाद में कोई सार्थक राशि अदा की गई है।
- यदि गुजारा संबंधी आदेश एक निर्दिष्ट अवधि के लिये था, और वह ख़त्म हो चुकी है।
- उपरोक्त के सिवा यदि प्राप्तकर्ता द्वारा तलाक के वक़्त स्वयं ही अपना यह अधिकार त्याग दिया जाय, तो भी वह महिला पुरुष से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं रह जाती।

इस तरह हमने देखा कि किन मामलों में स्त्री पुरुष से संबंध न होते हुये भी गुजारा भत्ता पाने की हकदार होती है, और कब नहीं होती। ज़ाहिर है कि यह कहानी की दशा-दिशा और न्याय हेतु उसे संवैधानिक रूप से पेश कर पाने की कला, अर्थात् वकालत पर भी काफी-कुछ निर्भर करता है।
इसलिये एक स्त्री-पुरुष का कोई शारीरिक संपर्क न होने पर भी पुरुष द्वारा स्त्री को गुजारा भत्ता देय है, या नहीं, और किन परिस्थितियों में आज क्या प्रावधान लागू हैं, इसकी व्यावहारिक जानकारी के लिये हमें किसी अच्छे और जानकार वकील की सलाह ज़ुरूर ले लेनी चाहिये।
