पहले एक बात साफ़ कर दूँ: "भारतीयों को पता नहीं है" एक आम धारणा है, सबके लिए सच नहीं। यहाँ मैंने उन बुनियादी अधिकारों को चुना है जिनके बारे में अक्सर भ्रम रहता है। ध्यान रहे कि 1 जुलाई 2024 से CrPC की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू हो गई है, इसलिए पुरानी धाराओं के नंबर अब बदल चुके हैं।
1. ज़ीरो FIR: थाने का इलाका मायने नहीं रखता
कई लोग सुनते हैं कि "यह हमारे थाने का मामला नहीं है" और लौट आते हैं। ज़ीरो FIR के तहत आप किसी भी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करा सकते हैं। यह सुविधा सिर्फ़ संज्ञेय अपराधों पर लागू होती है, यानी जिनमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है। बाद में मामला संबंधित थाने को भेज दिया जाता है।
2. FIR की मुफ़्त कॉपी और ऑनलाइन शिकायत
BNSS की धारा 173(2) के अनुसार शिकायतकर्ता को दर्ज जानकारी की कॉपी मुफ़्त मिलनी चाहिए। इसी धारा में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जानकारी देने की भी गुंजाइश है। ऑनलाइन दी गई FIR को नियमित FIR मानने के लिए शिकायतकर्ता को तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर करने होते हैं।
3. गिरफ़्तारी के समय आपके अधिकार
बिना वारंट गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी को अपराध का ब्योरा या गिरफ़्तारी के आधार तुरंत बताने होते हैं।
गिरफ़्तार व्यक्ति अपनी पसंद के किसी इंसान को अपनी स्थिति बता सकता है।
गिरफ़्तारी के बाद मेडिकल जाँच होनी चाहिए।
4. महिलाओं से जुड़े प्रावधान
महिलाओं को रात में गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ असाधारण परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट की अनुमति से। महिलाओं की तलाशी भी महिला अधिकारी ही करेंगी। इसके अलावा महिलाओं, 15 साल से कम और 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों और विकलांग या गंभीर बीमार व्यक्तियों को पूछताछ के लिए थाने जाने से छूट मिलती है।
5. मुफ़्त कानूनी सहायता
संविधान का अनुच्छेद 39A मुफ़्त कानूनी मदद का अधिकार देता है। जो आरोपी वकील का खर्च नहीं उठा सकता, उसे मुफ़्त कानूनी सहायता का हक़ है। आप जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं।
अधिकार काग़ज़ पर और ज़मीन पर अलग हो सकते हैं। थाने में आपको ये बातें याद दिलानी पड़ सकती हैं। कोई अधिकारी FIR लिखने से मना करे, तो धारा 173(4) के तहत आप लिखित में पुलिस अधीक्षक के पास जा सकते हैं।
रात में महिला की गिरफ़्तारी वाला नियम सबसे ज़्यादा ग़लत समझा जाता है। यह पूर्ण रोक नहीं है, इसमें अपवाद हैं। मुझे सर्च में इसके बारे में परस्पर विरोधी वर्णन मिले, इसलिए सटीक शब्दावली के लिए BNSS का मूल पाठ देखिए।
सूचना का अधिकार (RTI) 2005 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 भी ऐसे कानून हैं जो आम लोगों के बहुत काम आते हैं। इन पर मैंने इस बार सर्च नहीं किया।
यह सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। असली मामले में किसी वकील या विधिक सेवा प्राधिकरण से बात कीजिए।

