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preeti  patel's avatar
Mar 7, 2026education

प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की विशेषताएं बताइए?

4 Answers
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@rajnipatel6804Nov 17, 2021

प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की विशेषताएं
1)स्वत :चलित नियम -'से ' के नियम की प्रथम विशेषता यह है कि पूर्ति स्वत :मांग की जननी है!अर्थात मांग व पूर्ति का स्वयं समायोजन हो जाता है!इसमें सरकार को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है!
2)सरकार को सुविधा -'से ' के अनुसार सरकार को आर्थिक कल्याण में बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए!कीमत,मजदूरी,ब्याज की दरों में पूर्ण छूट दे देनी चाहिये!
3)बचत व विनियोग का बराबर होना- बचत विनियोग के बराबर होती है और इन दोनों के बीच समायोजन ब्याज की दर के द्वारा होता है!Article image

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@preetipatel2612Nov 17, 2021

प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की विशेषताएं निम्नलिखित हैं -(1) उत्पादन के बराबर मांग होने के कारण मंदी व बेरोजगारी होने का प्रश्न नहीं होता!यदि किसी कारण में क्षणिक बेरोजगारी हो जाती है तो मजदूरी की दर कम करके अधिक मजदूरी को रोजगार दिलाया जा सकेगा और बेरोजगारी अथवा मंदी नहीं होगी!

(2) मान्यताएं-(a) पूर्ण रोजगार की अवस्था होती है, (b) बाजार स्वतंत्र होता है और इसमें पूर्ण प्रतियोगिता पाई जाती है, (c) सारी आए उपभोग अथवा निवेश पर व्यय कर दी जाती है और यही सिद्धांत की मान्यताएं हैं!Article image

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@abhinavkumar4574May 19, 2022

प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की विशेषताएं बताइए?

प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की विशेषता निम्नलिखित है। आपको बता दें कि इकोनॉमिक्स में रोजगार सिद्धांत यानी एंप्लॉयमेंट थ्योरी दो है जो बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। अर्थशास्त्री 'की' (key) का रोजगार सिद्धांत और पीगू' का रोजगार सिद्धांत, इसकी विशेषता पर चर्चा करेंगे। आपको बता दें दोनों प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं। इनके रोजगार सिद्धांत दुनिया भर में माने गए हैं। इसलिए प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत कहा जाता है।

महान अर्थशास्त्री कीन्स ने प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की व्याख्या अपनी एक पुस्तक ‘The General Theory of Employment, Interest and Money (1936) में किया था। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पूर्ण रोजगार की स्थिति पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में हो ही नहीं सकती है।

यानी हर अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की स्थिति पाई जाती है। यह इनके इस सिद्धांत की प्रमुख विशेषता है। आप समझ गए होंगे कि कीन्स के अनुसार बेरोजगारी स्थिति हर अर्थव्यवस्था में होती है। ऐसा मानना रोजगार सिद्धांत के जनक कीन्स का है।

उन्होंने इस सिद्धांत में बेरोजगारी की सबसे बड़ी वजह यह बताई कि अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी का असली कारण सही तरीके से अर्थव्यवस्था में मांग का नहीं होना होता है।

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रोजगार सिद्धांत के अनुसार सरकारी हस्तक्षेप जरूरी

किन्स ने अपने रोजगार सिद्धांत में सबसे बड़ी बात कही कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति नहीं मिल सकती है यानी सब को रोजगार नहीं मिल सकता है लेकिन सभी को रोजगार मिलने की पहल के लिए सरकार को व्यवस्था करनी होती है। अर्थात सरकार को भी इस अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी दूर करने के लिए हस्तक्षेप करना होता है।

आपको बता दें कि प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत में कींस का रोजगार सिद्धांत वास्तविक तौर पर हर समस्या का समाधान नहीं कर पाता है।

महान अर्थशास्त्री पीगू का प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत की विशेषता

महान अर्थशास्त्री पीगू ने अपना रोजगार सिद्धांत दिया जिसे प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत कहा जाता है। उनका कहना है कि अगर अर्थव्यवस्था में पूंजी से गति दिया जाए तो यानी अर्थव्यवस्था की चालकता बनी रहती है। रोजगार सभी को मिलता है और ऐसी स्थिति अपने आप बन जाती है।

पीगू के प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत के अनुसार

उनका कहने का मतलब है कि पूर्ण रोजगार की स्थिति अधिक मांग के कारण होती है। यानी कि रोजगार के बाद उत्पादन और उत्पादन बढ़ने से उसी के अनुसार मांग भी बढ़ जाती थी इस कारण से पूर्ण रोजगार की स्थिति अर्थव्यवस्था में दिखाई देती है। यहां पर अर्थशास्त्री पीगू चेतावनी देते हैं कि अगर ब्याज दर प्रभावित होकर कम या ज्यादा होता है तो समस्त मांग खत्म हो जाती जिससे बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

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@rameshkumar7346Mar 7, 2026

अर्थशास्त्र का प्रतिष्ठित रोजगार सिद्धांत (Classical Theory of Employment) मुख्य रूप से 'एडम स्मिथ' और 'जे.बी. से' के विचारों पर आधारित है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पूर्ण रोजगार: यह सिद्धांत मानता है कि अर्थव्यवस्था में हमेशा पूर्ण रोजगार की स्थिति बनी रहती है। यदि कभी बेरोजगारी होती भी है, तो वह अस्थायी होती है।
  • से का बाजार नियम: "पूर्ति अपनी मांग स्वयं पैदा करती है।" यानी जितना उत्पादन होगा, उतनी ही मांग बाजार में उत्पन्न हो जाएगी।
  • स्वतंत्र अर्थव्यवस्था: सरकार को आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। बाजार की शक्तियां (मांग और पूर्ति) स्वयं संतुलन बना लेती हैं।
  • मजदूरी-कीमत लचीलापन: मजदूरी और कीमतों में कटौती करके बेरोजगारी को दूर किया जा सकता है।
  • दीर्घकालीन दृष्टिकोण: यह सिद्धांत अल्पकाल के बजाय दीर्घकाल (Long Run) की स्थितियों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।

यह सिद्धांत पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में स्वतः संतुलन की अवधारणा को मजबूती से पेश करता है।

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