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Othersप्रार्थना समाज क्या है ?
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| Updated on April 1, 2024 | others

प्रार्थना समाज क्या है ?

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@abhishekgaur6728 | Posted on April 1, 2024

दोस्तों 19वीं सदीं में भारत के इतिहास में सामाजिक तथा धार्मिक सुधार के लिए कई आंदोलन का उद्भव हुआ। जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की धार्मिक स्थिति को सुधारना था। इसी आंदोलन में से एक आंदोलन प्रार्थना समाज था। प्रार्थना समाज की स्थापना 31 मार्च 1867 को आत्माराम पांडुरंग द्वारा की गई। आत्माराम पांडुरंग द्वारा प्रार्थना समाज की स्थापना सबसे पहले मुंबई में की गई थी जिसका नाम पहले बम्बई था। प्रार्थना समाज के सभी सदस्य हिंदू थे और अंत तक हिंदू ही रहे। प्रार्थना समाज का मुख्य उद्देश्य धर्म के नाम पर फैली कुरीतियों को दूर करना था। प्रार्थना समाज के लोग धर्म के खिलाफ बिल्कुल नहीं थे बल्कि वह धर्म के नाम पर हो रहे बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, विधवा दमन इत्यादि कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाते थे। ईश्वर एक है इस बात का प्रचार भी प्रार्थना समाज द्वारा ही किया गया। प्रार्थना समाज मूर्ति पूजा के विरोधी थे। उनका मानना था कि ईश्वर हर जगह व्याप्त है। हर मनुष्य के भीतर ईश्वर सम्मिलित है। ईश्वर को खोजने के लिए किसी मंदिर या किसी पूजा पाठ की आवश्यकता नहीं। ईश्वर हमें हमारे भीतर ही मिलेंगे इसीलिए प्रार्थना समाज मूर्ति पूजा के खिलाफ थे। इसके अलावा प्रार्थना समाज जात-पात के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने एक मुसलमान द्वारा लाया गया पानी और एक ईसाई द्वारा पकाई गई रोटी खाई तथा एक नीची जाति के रसोई द्वारा तैयार किया गया सामुदायिक भोजन भी किया। उनका मानना था कि ईश्वर एक है तथा एक ही ईश्वर ने सभी लोगों को बनाया है अगर एक ही ईश्वर ने सभी लोगों को बनाया है तो उनकी जाति अलग नहीं हो सकती। सभी जाति के लोग समान है तथा सभी लोगों के भीतर एक ही ईश्वर व्याप्त है। अतः हमें जात-पात से ऊपर उठकर इंसानियत के धर्म को मनाना चाहिए। आत्माराम पांडुरंग द्वारा जारी किया गया यह प्रार्थना समाज स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा चलाए गए आर्य समाज तथा बंगाल में चलाए गए ब्रह्म समाज से काफी प्रेरित था किंतु प्रार्थना समाज बाकी समाज से अलग था। प्रार्थना समाज ने कभी ईश्वर के होने या ना होने पर सवाल नहीं उठाया बल्कि उन्होंने प्रेम और श्रद्धा से किए गए ईश्वर की भक्ति को भी प्रेरित किया। इसने महिलाओं के शिक्षा पर भी काफी जोर दिया तथा विधवा पुनर्विवाह का प्रचार प्रसार भी किया। इसके अलावा कई स्कूल खोले जिसमे पश्चिमी शिक्षा पर जोर दिया जाता हो।

महादेव गोविंद रानाडे के प्रार्थना समाज में शामिल होने के बाद यह समाज काफी लोकप्रिय हो गया था तथा कुछ लेखकों द्वारा प्रार्थना समाज के विचारों को दक्षिणी भारत में भी फैलाया गया। प्रार्थना समाज का मूल ध्यान धार्मिक वाद विवादों से अलग हटकर केवल देश की सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार पर था। प्रार्थना समाज ने कभी भी ईश्वर की अवहेलना नहीं कि तथा किसी को भी मूर्ति पूजा करने से नहीं रोका बल्कि वह खुद ईश्वर के सच्चे उपासक थे। परंतु उनका कहना था कि वह एकमात्र सच्चे ईश्वर की पूजा करते हैं यानी वह ईश्वर जो हर जगह हर मनुष्य में व्याप्त है। प्रार्थना समाज ने कभी रूढ़िवादियों सोच को ठीक करने में अपना समय नष्ट नहीं किया बल्कि उनका मुख्य उद्देश्य देश की धार्मिक कुरीतियों को दूर करके संस्कृति को बढ़ावा देना रहा।

 

 

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