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Updated on Mar 5, 2026others

श्रृंगार रस का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है ?

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Answered on Mar 20, 2024

श्रृंगार रस के बारे में तो आप सभी ने पढ़ा ही होगा इसलिए आपको श्रृंगार रस के बारे में जानकारी तो होगी ही यदि आपको इसकी जानकारी है तो अच्छी बात है और यदि जिन लोगों को श्रृंगार रस की जानकारी नहीं है तो आज मैं उन लोगों को श्रृंगार रस की पूरी जानकारी देना चाहूंगी।

 

आप जानना चाहते हैं कि श्रृंगार रस का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है तो मैं आपको श्रृंगार रस का उदाहरण तो बताऊंगी ही लेकिन इससे पहले मैं आपको श्रृंगार रस की परिभाषा बताना चाहूंगी:-

 

 श्रृंगार रस की परिभाषा:-

जहां नायक और नायिका की अथवा महिला पुरुष के प्रेम पूर्वक श्रेष्ठाओं क्रियाकलापों का श्रेष्ठाक वर्णन होता है। तो वहां श्रृंगार रस होता है। जब विभाव अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग  से रति नामक स्थाई भाव रस रूप से परिणत  होता है। उसे ही श्रृंगार रस कहा जाता है। मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि श्रृंगार रस को रसराज यानी कि रसों का राजा भी कहा जाता है।

 

चलिए अब मैं आपको श्रृंगार रस का सबसे अच्छा उदाहरण बताती हूं:-

(1) मेरे तो गिरधर गोपाला, दूसरों ना कोई।

 जाके सिर मोर मुकुट,मेरो पति सोई।

(2) गोपी ग्वाल गाई गो  सुत सब,

अति ही दीन बिचारे।

 सूरदास प्रभु बिनु यौ देखियत,

चंद बिना ज्यों तारे।

 इस प्रकार मैंने आपको यहां पर श्रृंगार रस का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण दिया है। मुझे उम्मीद है कि मेरे द्वारा दी गई जानकारी आपको अवश्य पसंद आएगी।

 

चलिए अब मैं आपको श्रृंगार रस के प्रकार बताती हूं:-

 दोस्तों श्रृंगार रस दो तरह के होते हैं।

 

 पहला संयोग श्रृंगार रस

 दूसरा वियोग श्रृंगार रस।

 

 संयोग श्रृंगार रस की परिभाषा:-

मैं आपको बताना चाहूंगी कि संयोग काल में नायक और नायिका के बीच प्रेम और रति का मिलन ही संयोग श्रृंगार रस कहलाता है।

 

अब मैं आपको वियोग श्रृंगार रस की परिभाषा बताऊंगी :-

एक दूसरे के प्रेम में अनुरक्त नायक एवं नायिका के मिलन का अभाव वियोग श्रृंगार रस होता है।

 

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Answered on Mar 5, 2026

श्रृंगार रस को "रसराज" (रसों का राजा) कहा जाता है, और इसका सबसे सुंदर उदाहरण बिहारी लाल के दोहों या सूरदास के पदों में मिलता है। यहाँ एक प्रसिद्ध उदाहरण दिया गया है:

उदाहरण: "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाय।"

अर्थ: राधा जी, कृष्ण से बातें करने के लालच में उनकी मुरली छिपा देती हैं। जब कृष्ण मुरली मांगते हैं, तो वह कसम खाती हैं कि उनके पास नहीं है, लेकिन उनकी आँखों और भौंहों की मुस्कुराहट उनकी चोरी पकड़ लेती है। जब कृष्ण फिर से देने को कहते हैं, तो वह साफ़ मना कर देती हैं।

यहाँ नायक (कृष्ण) और नायिका (राधा) के बीच का प्रेम और मधुर छेड़छाड़ श्रृंगार रस (संयोग श्रृंगार) को जीवंत करती है।

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