DRS का फुल फॉर्म क्या है - letsdiskuss
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Sumil Yadav

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DRS का फुल फॉर्म क्या है


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चलिए जानते हैं डीआरएस का फुल फॉर्म क्या होता है। DRS का फुल फॉर्म डिसीजन रिव्यू सिस्टम होता है। इसके तहत अगर किसी टीम या खिलाड़ी को लगता है कि अंपायर का फैसला गलत है तो वह फील्डिंग के दौरान कप्तान और बल्लेबाजी के दौरान स्ट्राइकर छोड़ कर खड़ा बल्लेबाज हाथ से सिटी निशान बनाकर रिव्यू ले सकता है। इसके लिए 15 सेकंड का  समय दिया जाता है इसके बाद थर्ड अंपायर फिर से पड़ताल कर फैसला देते हैं। यदि मांग सही होती है तो थर्ड अंपायर ओं फील्ड अंपायर के निर्णय को बदल देते हैं। ऐसे में डीआरएस भी खत्म नहीं होता, लेकिन अगर खिलाड़ियों की मांग गलत साबित होती है तब DRS खर्च हो जाता है।

 

तो चलिए अब जानते हैं कि डीआरएस का नियम भी बदला -

आईपीएल के नए नियमों के मुताबिक अब एक टीम के पास चार DRS होते हैं। दो का इस्तेमाल बल्लेबाजी और दो डीआरएस का इस्तेमाल गेंदबाजी के दौरान किया जा सकता है। इसका मतलब है कि एक DRS बर्बाद होने पर भी टीमों के पास एक DRS बच्चा रहता है हालांकि पहले आईपीएल में एक टीम को सिर्फ दो DRS मिलते थे।

 

 तो चलिए आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि डीआरएस के लिए तीन तकनीको का सहारा लिया जाता है।

 

 हॉक आई तकनीक :- इस तकनीक का इस्तेमाल एलबीडब्ल्यू के डिसीजन पर किया जाता है। इसके जरिए यह अनुमान लगाया जाता है कि गेम पिच पर गिरने के बाद कहां जाती है। क्या इस गेम का संपर्क स्टंप से होता, से होता है या फिर नहीं इस तकनीकी में पहले दिखाया जाता है की गेंद कहां टप्पा खाई और इसके बाद कितना कांटा बदला। अगर यह गेद बल्लेबाज के पैर से नहीं टकराती तो इस एंगल के साथ गेंद कहां जाती है।

 

 हॉटस्पॉट तकनीक :- यह स-र की तरह आदमी होती है इसमें गेंद बल्लेबाज पर जहां टकराती वहां पर सफेद निशान बन जाता है।

अंपायर इस तकनीक का उपयोग यह देखने के लिए करते हैं कि क्या गेंद बल्ले के किनारे से लगकर गई है।

गेंद चाहे बल्ले से टकराए या किसी और चीज़ से, टकराने की जगह पर सफेद रंग का गोला नज़र आता है।

 

 अल्ट्राएज तकनीक :- इसमें अल्ट्राएज और वीडियो के माध्यम से यह देखा जाता है की गेंद बल्ले पर लगी है या नहीं अल्ट्राएज तकनीकी स्टंप माइक के जरिए आवाज सुनती है और एक कदम हल्की आवाज भी पकड़ लेती है। इसे मैं बल्ले का महीन किनारा लगने पर भी इस तकनीक के जरिए आउट या नॉट आउट का फैसला हो जाता है। कैच आउट के लिए यह पता करने के लिए की गेंद बल्ले से लगी है या नहीं इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

 

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