काल भैरव शिव का एक रूप माने जाते है। पुराने समय मे गाँव के हर स्थान पर काल भैरव की पूजा की जाती थी उनका मानना था की काल भैरव उनकी और उनके गाँव की रक्षा करते है। काल भैरव को सबसे बड़े लोक देवता का दर्जा प्राप्त है।
पुराणो के अनुसार भैरव की उत्पत्ति शिव के रक्त से हुई थी। भैरव के दो स्वरूप है - पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव।
काल भैरव का सबसे बड़ा मंदीर उज्जैन और काशी मे है और बटुक भैरव का मंदीर लखनऊ मे है।
धर्मग्रंथो के अनुसार, एक बार ब्रह्म, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर तर्क वितर्क हुआ। ऋषि मुनि ने भगवान भोलेनाथ को श्रेष्ठ बताया।
ब्रह्म जी को इस बात पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने भगवान भोलेनाथ को अपशब्द कहना प्रारंभ कर दिया। इससे भोलेनाथ को बहुत क्रोध आया और उसी क्रोध से काल भैरव का जन्म हुआ।
काल भैरव को माता वैष्णो देवी ने मारा था। भैरव यह जानते थे उनको मोक्ष माता के द्वारा ही मिलेगा।
उन्होंने कटरा के निकट स्थित एक गाँव मे माता के भक्त के यहाँ भंडारे मे माँस - मदिरा की इच्छा रखी ना कहने पर भैरव ने कन्या स्वरूप माता का पीछा किया।
माता काल भैरव से बचते हुए त्रिकुट पर्वत की गुफा मे चली गई और नौ महीने उसी गुफा के अंदर रही।
काल भैरव माता को ढूंढता हुआ त्रिकुट पर्वत पर जा पहुँचा। वहा उसने माता को आवाहन दिया और माता ने युध्य मे उसका सिर काट दिया।
सिर कट कर 8 किलो मीटर दूर घाटी पर जा गिरा । आज इस घाटी को भैरो घाटी के नाम से जाना जाता है।
अपने सिर कटने के पश्चात भैरो को अपनी भूल का आभास हुआ और उन्होंने माता रानी से क्षमा मांगी।
और माता रानी ने उन्हे वरदान दिया की उनकी पूजा तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक लोग उनके दर्शन और पूजा नही कर लेते।



