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Anushka

Updated on Feb 29, 2024others

काल भैरव कौन था और उसे किसने मारा था?

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Answered on Feb 23, 2024

काल भैरव शिव का एक रूप माने जाते है। पुराने समय मे गाँव के हर स्थान पर काल भैरव की पूजा की जाती थी उनका मानना था की काल भैरव उनकी और उनके गाँव की रक्षा करते है। काल भैरव को सबसे बड़े लोक देवता का दर्जा प्राप्त है। 

पुराणो के अनुसार भैरव की उत्पत्ति शिव के रक्त से हुई थी। भैरव के दो स्वरूप है - पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। 

काल भैरव का सबसे बड़ा मंदीर उज्जैन और काशी मे है और बटुक भैरव का मंदीर लखनऊ मे है।

धर्मग्रंथो के अनुसार, एक बार ब्रह्म, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर तर्क वितर्क हुआ। ऋषि मुनि ने भगवान भोलेनाथ को श्रेष्ठ बताया। 

ब्रह्म जी को इस  बात पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने भगवान भोलेनाथ को अपशब्द कहना प्रारंभ कर दिया। इससे भोलेनाथ को बहुत क्रोध आया और उसी क्रोध से काल भैरव का जन्म हुआ। 

काल भैरव को माता वैष्णो देवी ने मारा था। भैरव यह जानते थे उनको मोक्ष माता के द्वारा ही मिलेगा। 

उन्होंने कटरा के निकट स्थित एक गाँव मे माता के भक्त के यहाँ भंडारे मे माँस - मदिरा की इच्छा रखी ना कहने पर भैरव ने कन्या स्वरूप माता का पीछा किया। 

माता काल भैरव से बचते हुए त्रिकुट पर्वत की गुफा मे चली गई और नौ महीने उसी गुफा के अंदर रही। 

काल भैरव माता को ढूंढता हुआ त्रिकुट पर्वत पर जा पहुँचा। वहा उसने माता को आवाहन दिया और माता ने युध्य मे उसका सिर काट दिया। 

सिर कट कर 8 किलो मीटर दूर घाटी पर जा गिरा । आज इस घाटी को भैरो घाटी के नाम से जाना जाता है। 

अपने सिर कटने के पश्चात भैरो को अपनी भूल का आभास हुआ और उन्होंने माता रानी से क्षमा मांगी। 

और माता रानी ने उन्हे वरदान दिया की उनकी पूजा तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक लोग उनके दर्शन और पूजा नही कर लेते। 

 

 

Letsdiskuss

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Answered on Feb 24, 2024

बताया जाता है कि जो व्यक्ति काल भैरव की पूजा करता है उसे अकाल मृत्यु, रोग, दोष, आदि का कोई भय नहीं होता है। क्योंकि काल भैरव को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। और रुद्र अवतार भी कहे जाते हैं।

चलिए हम आपको बताते हैं कि कैसे हुई काल भैरव की उत्पत्ति:-

मैं आपको बता दूं कि शिव पुराण में काल भैरव को भगवान शंकर का रूप कहा गया था। क्योंकि रूद्र ही भैरव है। उनकी भैंस से तो यमराज तक काँपते हैं। यह काल से भी परे होने के कारण महाकाल भैरव कहलाते हैं। स्कंद पुराण में काल भैरव की उत्पत्ति की कथा बताई गई है।

 पौराणिक कथा के अनुसार एक बार त्रिदेव मे सर्वश्रेष्ठ को लेकर बहस होने लगी। हर कोई स्वयं को दूसरे से महान और श्रेष्ठ बताता था और जब तीनों में से कोई इस बात का निर्णय नहीं कर पाया की सर्वश्रेष्ठ कौन है तो इस कार्य को ऋषि मुनियों को सौंप दिया गया। और फिर उन सभी ने सोच विचार करने के बाद भगवान शिवजी को सबसे सर्वश्रेष्ठ बताया।

 तब ऋषि मुनियों की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी का सर क्रोध से जलने लगा। और फिर वह क्रोध में आकर भगवान शंकर का अपमान करने लगे। जिस भगवान शंकर भी बहुत ज्यादा क्रोधित होकर रौद्र के रूप में आ गए और उनसे ही उनके रौद्र स्वरूप काल भैरव की उत्पत्ति हुई। इसके बाद काल भैरव ने घमंड में आकर ब्रह्मा देव के जलते हुए सर को काट दिया। इससे उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया। तब भगवान शिव ने उनको सभी तीर्थ पर भ्रमण करने का सुझाव दिया। इसके बाद वहां से तीर्थ पर निकल गए। और जब पृथ्वी पर सभी तीर्थ का भ्रमण करने के बाद काल भैरव शिव की नगरी काशी में पहुंचे तो वहां पर ब्रह्म हत्या के दोस्त से मुक्त हो गए। और शिव की नगरी काशी काल भैरव को इतनी अच्छी लगी कि वह सदैव के लिए काशी मे ही बस गए। और तब से भगवान शंकर जी को काशी का राजा कहां जाने लगा और काल भैरव को काशी के कोतवाल यानी की संरक्षक माना जाता है। और आज भी काशी में काल भैरव का मंदिर है।

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Modern India Explorer
Answered on Feb 28, 2024

दोस्तों इस पोस्ट के जरिए मैं आपको बताना चाहती हूं की काल भैरव कौन था और उसे किसने मारा था।

काल भैरव कौन है- ऐसा माना जाता है की काल भैरव शिव के रूप मे जाने जाते हैं। मतलब काल भैरव शिव का एक रूप है। काल भैरव का जन्म शिव के रक्त से हुआ था।

 ऐसा पुराणों में लिखा गया है कि ब्रह्मा जी से किसी मुनि ने कहा था कि शिव अत्यंत सर्वश्रेष्ठ हैं।ऋषि की इस बातों को सुनकर ब्रह्मा जी क्रोध हो गए और शिव जी को बुरा -भला कहने लगे यानी की अपशब्द  कहने लगे थे।इन अपशब्द बातों को सुनकर शंकर जी क्रोध में आ गए और इतना क्रोध हुए कि वह अपने रौद्र रूप में आ गए शिव के इसी रूद्र रूप से काल भैरव का जन्म हुआ। तभी से  काल भैरव की पूजा की जाने लगी  है। काल भैरव का मंदिर उज्जैन में और काशी में है। इन सब बातों से पता चलता है की काल भैरव शिव का ही एक रूप है।

काल भैरव को किसने मारा था- काल भैरव मां दुर्गा के हाथों से मोच प्राप्त करना चाहता था। इसलिए वह माता के भंडार में ऋषि मुनि बनकर जाते हैं और वहां मांस मदिरा बनाने की जिद रखते हैं। लेकिन वहां ऐसा न करने पर वह  कन्या रूपी माता का पीछा करने लगता है कन्या रुपी माता के पीछे-पीछे बहुत दूरी तक जाता है। कन्या रूपी माता त्रिकूट पर्वत की गुफाओं में घुस जाती हैं और वहां 9 महीने तक छुपी रहती हैं।इतना कुछ करने के बाद भी काल भैरव ढूंढते -ढूंढते त्रिकूट पर्वत में घुस जाता है और माता को पा जाता है और उनका आवाहन करने लगता है इससे माता क्रोध में आ जाती हैंऔर काल भैरव का सिर काटकर दड़ से अलग कर देती हैं। माता काल भैरव का जब सर काटती हैं तो उसका सर लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर एक घाटी पर गिरता है। इसी के आधार पर उस घाटी को काल भैरव घाटी कहा जाता है। जब काल भैरव का सिर काटता है तो वह माता से क्षमा मांगता है और माता उसे क्षमा कर देती है और यह वरदान देती है कि तुम हमेशा पूजे जाओगे।Article image

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