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Anushka · 2 years ago
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काल भैरव कौन था और उसे किसने मारा था?

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Answered on02/23/24

काल भैरव शिव का एक रूप माने जाते है। पुराने समय मे गाँव के हर स्थान पर काल भैरव की पूजा की जाती थी उनका मानना था की काल भैरव उनकी और उनके गाँव की रक्षा करते है। काल भैरव को सबसे बड़े लोक देवता का दर्जा प्राप्त है। 

पुराणो के अनुसार भैरव की उत्पत्ति शिव के रक्त से हुई थी। भैरव के दो स्वरूप है - पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। 

काल भैरव का सबसे बड़ा मंदीर उज्जैन और काशी मे है और बटुक भैरव का मंदीर लखनऊ मे है।

धर्मग्रंथो के अनुसार, एक बार ब्रह्म, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर तर्क वितर्क हुआ। ऋषि मुनि ने भगवान भोलेनाथ को श्रेष्ठ बताया। 

ब्रह्म जी को इस  बात पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने भगवान भोलेनाथ को अपशब्द कहना प्रारंभ कर दिया। इससे भोलेनाथ को बहुत क्रोध आया और उसी क्रोध से काल भैरव का जन्म हुआ। 

काल भैरव को माता वैष्णो देवी ने मारा था। भैरव यह जानते थे उनको मोक्ष माता के द्वारा ही मिलेगा। 

उन्होंने कटरा के निकट स्थित एक गाँव मे माता के भक्त के यहाँ भंडारे मे माँस - मदिरा की इच्छा रखी ना कहने पर भैरव ने कन्या स्वरूप माता का पीछा किया। 

माता काल भैरव से बचते हुए त्रिकुट पर्वत की गुफा मे चली गई और नौ महीने उसी गुफा के अंदर रही। 

काल भैरव माता को ढूंढता हुआ त्रिकुट पर्वत पर जा पहुँचा। वहा उसने माता को आवाहन दिया और माता ने युध्य मे उसका सिर काट दिया। 

सिर कट कर 8 किलो मीटर दूर घाटी पर जा गिरा । आज इस घाटी को भैरो घाटी के नाम से जाना जाता है। 

अपने सिर कटने के पश्चात भैरो को अपनी भूल का आभास हुआ और उन्होंने माता रानी से क्षमा मांगी। 

और माता रानी ने उन्हे वरदान दिया की उनकी पूजा तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक लोग उनके दर्शन और पूजा नही कर लेते। 

 

 

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Answered on02/24/24

बताया जाता है कि जो व्यक्ति काल भैरव की पूजा करता है उसे अकाल मृत्यु, रोग, दोष, आदि का कोई भय नहीं होता है। क्योंकि काल भैरव को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। और रुद्र अवतार भी कहे जाते हैं।

चलिए हम आपको बताते हैं कि कैसे हुई काल भैरव की उत्पत्ति:-

मैं आपको बता दूं कि शिव पुराण में काल भैरव को भगवान शंकर का रूप कहा गया था। क्योंकि रूद्र ही भैरव है। उनकी भैंस से तो यमराज तक काँपते हैं। यह काल से भी परे होने के कारण महाकाल भैरव कहलाते हैं। स्कंद पुराण में काल भैरव की उत्पत्ति की कथा बताई गई है।

 पौराणिक कथा के अनुसार एक बार त्रिदेव मे सर्वश्रेष्ठ को लेकर बहस होने लगी। हर कोई स्वयं को दूसरे से महान और श्रेष्ठ बताता था और जब तीनों में से कोई इस बात का निर्णय नहीं कर पाया की सर्वश्रेष्ठ कौन है तो इस कार्य को ऋषि मुनियों को सौंप दिया गया। और फिर उन सभी ने सोच विचार करने के बाद भगवान शिवजी को सबसे सर्वश्रेष्ठ बताया।

 तब ऋषि मुनियों की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी का सर क्रोध से जलने लगा। और फिर वह क्रोध में आकर भगवान शंकर का अपमान करने लगे। जिस भगवान शंकर भी बहुत ज्यादा क्रोधित होकर रौद्र के रूप में आ गए और उनसे ही उनके रौद्र स्वरूप काल भैरव की उत्पत्ति हुई। इसके बाद काल भैरव ने घमंड में आकर ब्रह्मा देव के जलते हुए सर को काट दिया। इससे उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया। तब भगवान शिव ने उनको सभी तीर्थ पर भ्रमण करने का सुझाव दिया। इसके बाद वहां से तीर्थ पर निकल गए। और जब पृथ्वी पर सभी तीर्थ का भ्रमण करने के बाद काल भैरव शिव की नगरी काशी में पहुंचे तो वहां पर ब्रह्म हत्या के दोस्त से मुक्त हो गए। और शिव की नगरी काशी काल भैरव को इतनी अच्छी लगी कि वह सदैव के लिए काशी मे ही बस गए। और तब से भगवान शंकर जी को काशी का राजा कहां जाने लगा और काल भैरव को काशी के कोतवाल यानी की संरक्षक माना जाता है। और आज भी काशी में काल भैरव का मंदिर है।

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